<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726</id><updated>2012-02-06T08:18:30.722-06:00</updated><category term='maithili kawita'/><category term='विज्ञापन'/><category term='हरिमोहन झा'/><category term='दुरागमन'/><category term='प्रभात झा'/><category term='लघुकथा'/><category term='गजल'/><category term='संवेदना'/><category term='लहठी उद्योग'/><category term='मधुश्रावणी'/><category term='बिपिन बादल'/><category term='मैथिलि'/><category term='विपिन बादल'/><category term='नेपाल कें राष्ट्रपति  आ  नीतीश कुमार'/><category term='बिहारी'/><category term='कविता संग्रह'/><category term='नागार्जुन'/><category term='अपराध'/><category 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uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>136</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-4918731316235623577</id><published>2011-12-05T06:12:00.001-06:00</published><updated>2011-12-05T06:14:35.455-06:00</updated><title type='text'>द्वादश ज्योतिर्लिंग कथा</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(१) श्री सोमनाथ- गुजरात प्रान्तक काठियावाड़ मे समुद्रक तट पर अवस्थित एहि ज्योतिर्लिंगक कथा शिव पुराण मे एहि तरहे सँ वर्णित अछि :-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दक्ष प्रजापति केर ‘कन्या छलनि । हुनका सभक विवाह चन्द्रमाक संग कयने छलथिन्ह । परन्तु चन्द्रमा मात्र रोहिणीक अलावा किनको सँ अनुराग व सम्मान नहि करथिन्ह । एहि सँ क्रोधित भऽ प्रजापति दक्ष चन्द्रमा कें क्षय होयबाक शाप दए देलथिन्ह । एहि सँ चन्द्रमाक कान्ति तत्काल क्षीण भऽ गेलनि । ओ अपन श्राप सँ विमुक्‍ति हेबाक लेल ऋषि आओर देवता के संग कए ब्रह्मा जीक ओहिठाम गेला । ब्रह्माजी शाप विमोचन के लेल प्रभास क्षेत्र मे जाए कऽ भगवान शिवक आराधना करबा लेल कहलथिन्ह । ओ कठिन तपस्या करैत १० करोड़ मृत्युंजय मंत्रक सेहो जाप कएलनि । एहि पर भगवान शिव प्रसन्‍न भऽ अमर रहबाक वरदान दए शाप सँ मुक्‍ति होयबाक विषय मे कहलथिन :- जे अहाँ कृष्ण पक्ष मे एक-एक अंश क्षीण होइत जाएत और शुक्ल पक्ष मे ओहि तरहें एक-एक अंश बढ़ैत पुर्णिमा कऽ पूर्ण रूप प्राप्त होएत । आओर प्रजापति दक्षक वचनक रक्षा सेहो भए जेतनि । शाप सँ मुक्‍ति भेलाक पश्‍चात्‌ चन्द्रमा आओर सब देवता लोकनि भगवान शिव के माता पार्वती कें साथ सभ प्राणीक उद्धारार्थ एतय रहबाक प्रार्थना कएलनि । भगवान शिव प्रार्थना कें स्वीकार कऽ ज्योतिर्लिंग के रूप में माँ पार्वती के साथ ओहि दिन सँ एतय रहय लगलाह ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(२) श्री मल्लिकार्जुन :- आंध्रप्रदेश मे कृष्णा नदीक तटपर श्री शैलपर्वत स्थित ज्योतिर्लिंगक कथा पुराण मे एहि तरहक अछि ।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान शिवक दुनू पुत्र श्री गणेश आओर श्री कार्तिकेय मे सँ किनक विवाह सर्वप्रथम करायल जाय, एहि तरहक समस्याक समाधान हेतु शिवजी दुनू बालक कें पृथ्वीक परिक्रमाक आदेश दए कहलथिन्ह जे पहिने परिक्रमा कय आबि जायब तिनक विवाह सर्वप्रथम कराओल जाएत । श्री कार्तिकेय एहि बात कें सुनिते मयूर पर सवार भय पृथ्वीक परिक्रमा के लेल विदा भऽ गेलाह । श्री गणेश जी सोचय लगलाह जे हुनका मयूर सवारी छनि आ यथा शीघ्र परिक्रमा कय लेताह परन्तु हमरा मूसक सवारी अछि हमरा सँ पृथ्वी परिक्रमा असंभव अछि तथापि बुद्धि विवेकक सहारा लय अपन माता पिताक शरीर मे अखण्ड ब्रह्माण्ड कें समाहित देखि ओ हुनकहि प्रदक्षिणा कऽ हाथ जोड़ि माता पिताक सन्मुख ठाढ़ भय गेलाह । माता-पिता हुनक बुद्धि विवेक देखि हुनक वियाह सिद्धि आओर बुद्धि के साथ करबा देलनि । ओहि मे क्षेम तथा लाभ नामक दु पुत्र भेलनि । जखन कार्तिकेय पृथ्वीक परिक्रमा कऽ भगवान शंकर तथा पार्वतीक पास अयलाह तावत धरि श्री गणेश जीक विवाह भऽ गेल रहनि तथा दू पुत्रक प्राप्ति सेहो भऽ गेल छलनि । ई सभ बात देखि कार्तिकेय क्रोधित भय क्रौंच नामक पर्वत पर चलि गेलाह । माता पार्वती रुष्ट पुत्र के वापस लाबय लेल ओहि स्थान पर पहुँचलथि । पाछाँ सँ भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप मे प्रकट भऽ गेलाह, ताहि दिन सँ मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम सँ प्रख्यात भेलाह । एहि लिंगक पूजा अर्चना सर्वप्रथम मल्लिका पुष्प सँ कएल गेल छल ताहि हेतु मल्लिकार्जुन नाम सँ प्रसिद्ध छथि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(३) महाकालेश्‍वर :- मध्यप्रदेशक उज्जैन नगर मे अवस्थित एहि ज्योतिर्लिंगक कथा पुराण मे एहि प्रकार सँ अछि :-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन काल मे उज्जयिनी मे राजा चन्द्रसेन राज्य करैत छलाह । ओ परम शिव भक्‍त छलाह । राजाक शिव भक्‍ति सँ प्रभावित भऽ कऽ एक पाँच वर्षक ग्वालाक लड़का शिव भक्‍ति मे निमग्न भऽ गेल । भक्‍ति मे मगन ओ बालक खेनाई के सेहो बिसरि गेल छल । एहि पर कुपित भऽ माय ओहि शिव लिंग रूपी पत्थर के फेकि देलकनि । बालक भगवान शिव के नाम बजैत बेहोश भऽ खसि परल । किछु समय बाद होश एलाक बाद ओ सामने बहुत सुन्दर आओर बहुत विशाल सुवर्ण रत्‍न सँ जटित मन्दिर देखलनि । मन्दिर के भीतर प्रकाश पूर्ण, भास्वर तेजस्वी ज्योतिर्लिंग स्थापित छल । ताहि दिन सँ एहि ज्योतिर्लिंगक पूजा शुरू भेल । उज्जयिनी नाम सँ विख्यात ई नगर भारतक परम पवित्र सप्तपुरी मे एक अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(४) ॥श्री ओंकारेश्‍वर, श्री अमलेश्‍वर ॥&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्यप्रदेशक पवित्र नर्मदा नदीक तटपर अवस्थित एहि ज्योतिर्लिंगक कथा पुराण मे एहि तरहक अछि :-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन समय मे महाराज मांधाता एकटा पर्वत पर बैसि तपस्या सँ भगवान शिव के प्रसन्‍न केने छलाह, एहि सँ इ पर्वत मांधाताक नाम सँ विख्यात भेल । भगवान शिव ज्योतिर्लिंगक रूप मे एहि स्थान पर प्रकट भेलाह ताहि हेतु सम्पूर्ण मांधाता पहाड़ कें शिव के रूप मानल जाइत अछि । एहि ओंकारेश्‍वर ज्योतिर्लिंग कें दू रूप छनि, एहि के वर्णन निम्नलिखित अछि :- विंध्य पर्वत भगवान शिवक आराधना कयलनि । ओ प्रकट भऽ मनोवांछित वरदान देलथिन्ह । एहि अवसर पर आयल मुनि लोकनिक आग्रह पर अपन ओंकारेश्‍वर नामक लिंग के दू भाग मे कऽ देलनि । एक के नाम ओंकारेश्‍वर तथा दोसर के नाम अमलेश्‍वर भेलनि । दुनू लिंगक स्थान आओर मन्दिर अलग-अलग रहलौ पर दुनूक सत्ता-स्वरूप एक अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(५) श्री केदारनाथ :- उत्तराखण्ड प्रदेशक केदार नामक पर्वत पर अवस्थित एहि ज्योतिर्लिंगक कथा पुराण मे वर्णित एहि प्रकार सँ अछि :&lt;/span&gt;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिमालयक केदार नामक अत्यन्त शोभाशाली शिखर पर महा तपस्वी श्रीनर आओर नारायण भगवान शिव कें प्रसन्‍नता हेतु कठिन तपस्या कयलनि । तपस्या सँ खुश भऽ भगवान शिव प्रकट भऽ वर मांगय लेल कहलथिन्ह । श्रीनर आओर नारायण शिव सँ याचना कएलनि जे अपन भक्‍तक कल्याण के लेल सभ दिन एहि ठाम अपन स्वरूप कें स्थापित करबाक कृपा कयल जाय । मुनिक प्रार्थना सुनि भगवान शिव ज्योतिर्लिंगक रूप मे एहि स्थान पर रहब स्वीकार कयलनि । केदार नामक हिमालय शिखर पर अवस्थित होयबाक कारणे इ ज्योतिर्लिंग केदारेश्‍वर ज्योतिर्लिंग के नाम सँ प्रसिद्ध अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(६) श्री भीमेश्‍वर :- असम प्रदेशक गोहाटी के नजदीक ब्रह्मपुत्र पहाड़ पर अवस्थित एहि ज्योतिर्लिंगक कथा पुराण मे निम्न लिखित अछि :&lt;/span&gt;-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन समय मे भीम नामक एक महाप्रतापी राक्षस छल । ओ कठिन तपस्या कऽ ब्रह्माजी सँ त्रिलोक विजयी हेबाक वरदान प्राप्त कयलनि । त्रिलोक विजयी भीम कामरूपक परम शिव भक्‍त राजा सुदक्षिण पर आक्रमण कऽ हुनका बन्दी बना कारावास दऽ देलनि । राजा ओहि समय मे पार्थिव शिवलिंगक पूजा करैत छलाह । हुनका एहि तरहें पूजा करैत देखि क्रोधित भऽ भीम अपन तलवार सँ ओहि पार्थिव शिवलिंग पर प्रहार कऽ देलनि । तत्काल भगवान शिव प्रकट भऽ हुँकार मात्र सँ ओहि राक्षस केँ भस्म कऽ देलनि आओर सुदक्षिण व ऋषि मुनि सभ कें प्रार्थना स्वीकार कऽ भगवान शिव सभ दिन के लेल ज्योतिर्लिंग के रूप मे वास करए लगलाह । हुनक ओ ज्योतिर्लिंग भीमेश्‍वर नाम सँ विख्यात भेल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(७) श्री विश्‍वेश्‍वर :- उत्तर प्रदेशक प्रसिद्ध काशी मे स्थित एहि ज्योतिर्लिंगक कथा एहि प्रकारक अछि-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;भगवान शंकर पार्वती विवाह कऽ कैलाश पर्वत पर निवास करैत छलीह । परन्तु पिताक घर विवाहित जीवन बितेनाई बढ़ियाँ नहि बुझना गेलनि । एक दिन ओ भगवान शिव सँ कहलथिन कि आब अपना घर पर चलू । एहि ठाम रहनाइ हमरा बढ़िया नहि बुझना जाइत अछि । सब लड़की विवाह भेलाक बाद अपना पतिक घर जाइत अछि । परन्तु हमरा पिताक घर रहय पड़ैत अछि । भगवान शिव माता पार्वती कें साथ लऽ अपन पवित्र नगर काशी आबि गेलाह । ओतय ओ विश्‍वेश्‍वर ज्योतिर्लिंगके रूप मे स्थापित भऽ गेलाह । मत्स्यपुराण मे एहि नगरीक महत्व कहल गेल अछी जे ध्यान आओर ज्ञान रहित तथा दुःख सँ पीड़ित मनुष्य के लेल काशियेटा परमगतिक स्थान अछि । श्री विशेश्‍वर के आनन्द वन मे दशाश्‍वमेघ, लोलार्क, विन्दुमाधव, केशव आओर मणिकर्णिका ई पाँच प्रधान तीर्थ स्थली अछि, ताहि हेतु एहि स्थान केँ अविमुक्त क्षेत्र कहल जाइत अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(८) श्री त्र्यम्बकेश्‍वर :- महाराष्ट्र प्रान्तक नासिक लग अवस्थित एहि ज्योतिर्लिंगक कथा पुराण मे एहि तरहक अछि :-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;ब्राह्मण सभ श्री गणेश जी कें संग मीलि महर्षि गौतम जी पर छल सँ गोहत्याक दोष लगेलनि । महर्षि जी कें चारू दिस सँ बहिष्कृत कऽ देल गेलनि । ई देखि ओ भगवान शिव के कठोर तपस्या सँ प्रसन्‍न कऽ गोहत्याक पाप सँ मुक्‍ति होयबाक रास्ता जानय चाहलनि । भगवान शिव प्रकट भऽ कहलथिन्ह :- हे गौतम अहाँ सदैव सर्वथा निष्पाप छी । अहाँक ऊपर गोहत्याक पाप छलपूर्वक लगाओल गेल अछि । छलपूर्वक एहि तरहें करय वला ब्राह्मण अहाँक आश्रम मे छथि । हुनका सभ के हम दण्ड देबय चाहैत छी । गौतम जी उत्तर देलथि = हे प्रभू! एहि ब्राह्मण सभक निमित्तें अपने हमरा दर्शन देल ताहि हेतु एहि सँ हमर परम हित समझि कऽ हुनका लोकनि कें क्षमा कयल जाय । ऋषि-मुनि, देवता गण ओतय एकत्र भऽ गौतम जीक बात के अनुमोदन कयलनि तथा भगवान शिव कें सब दिन के लेल ओहिठाम निवास करय लेल प्रार्थना कयलन्हि । भगवान शिव हुनका लोकनिक प्रार्थना सुनि श्री त्र्यम्बकेश्‍वर ज्योतिर्लिंगक नाम सँ स्थित भऽ गेलाह । गौतम द्वारा आनल गेल गंगा एहि ठाम गोदावरी नाम सँ प्रवाहित होमय लागल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(९) श्री वैद्‌यनाथ :- झारखण्ड राज्य के संथाल परगना मे अवस्थित एहि ज्योतिर्लिंगक कथा एहि प्रकार सँ अछि :-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;राक्षस राजा रावण कठोर तपस्या कऽ भगवान शिव कें शिवलिंग रूप मे लंका मे अवस्थित होयबाक वरदान मंगलनि । भगवान शिव जी वरदान दैत कहलखिन जे अहाँ शिवलिंग लऽ जा सकैत छी, परन्तु एहि लिंग के रास्ता मे कतहु पृथ्वी पर राखब तऽ ओ अचल भऽ जायत आ अहाँ पुनः उठाकय नहि लऽ जा सकैत छी । रावण शिवलिंग उठा कऽ लंका विदा भेला कि किछु दूर गेलाक बाद हुनका लघुशंका करबाक इच्छा भेलनि । ओ शिवलिंग के एक बालक के हाथ मे दऽ लघुशंका के लेल गेलाह । रावण के अबय मे देरी देखि बालक ओहि लिंग के पृथ्वी पर राखि देलनि । ओ लघुशंका सँ निवृत्त भऽ शिवलिंग के उठावय के लेल बहुत प्रयत्‍न कयलनि परन्तु शिवलिंग नहि उठि सकलनि । अन्त मे हारि कय ओ एहि पवित्र शिवलिंग पर अंगुठाक निशान बना कऽ वापस लंका चलि गेलाह । बहुत दिनक बाद ओहि जंगल मे वैदू नामक गोप गाय चरबैत ओहि स्थान पर शिवलिंग देखि साफ सुथरा स्थान कऽ प्रथम पूजा कयलनि आ तें ओ ज्योतिर्लिंग वैद्यनाथ नाम सँ प्रख्यात छथि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(१०) श्री नागेश्‍वर :- गुजरातक द्वारिकापुरीक समीप अवस्थित एहि ज्योतिर्लिंगक कथा एहि तरह सँ वर्णित अछि :-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन समय मे सुप्रिय नामक एक बड़ धर्मात्मा आओर सदाचारी वैश्य़ छलाह । भगवान शिवक भक्‍त होयबाक कारणें दुष्ट राक्षस दारूक सुप्रिय आओर हुनक सहयोगी सभ कें कारावास मे राखि यातना देबय लगलाह । शिवक आराधना मे तल्लीन सुप्रिय कें मृत्यु दण्डक आदेश भेल । भगवान शिव प्रकट भऽ दर्शन दऽ हुनका अपन पासुपत अस्त्र प्रदान कयलनि, जाहि सँ सुप्रिय दारूक एवं हुनक सहयोगी सब कें वध कयलनि । भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप मे प्रकट भेल छलाह आ सुप्रियक आग्रह पर ओहि स्थान पर श्री नागेश्‍वर नाथ नाम सँ प्रख्यात भेलाह ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(११) श्री सेतुबन्ध रामेश्‍वर :- तमिलनाडुक हिन्दमहासागर तट पर अवस्थित एहि ज्योतिर्लिंगक कथा निम्न प्रकारक अछि :-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जखन भगवान श्री रामचन्द्रजी लंका पर चढ़ाई करबा लेल जा रहल छलाह ताहि समय ओ एहि समुद्रक तट पर बालू सँ शिवलिंग बनाकऽ हुनक पूजन कएने छलाह, पूजा सँ प्रसन्‍न भऽ भगवान शिव रावण पर विजय प्राप्त करबाक वरदान देने छलथिन्ह । श्री राम के अनुरोध पर भगवान शिव लोक कल्याणार्थ ज्योतिर्लिंग कें रूप मे ओहि स्थान पर निवास करबाक प्रार्थना स्वीकार कऽ लेलनि । ताहि दिन सँ ई ज्योतिर्लिंग एहि स्थान पर रामेश्वरक नाम सँ विराजमान छथि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;(१२) श्री घुश्मेश्‍वर :- महाराष्ट्रक वेरूल गाँवक पास अवस्थित एहि ज्योतिर्लिंगक कथा पुराण मे निम्न प्रकार सँ अछि-&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;प्राचीन समय मे देवगिरि पर्वत के समीप सुधर्मा नामक एक अत्यन्त तेजस्वी तपोनिष्ट ब्राह्मण रहैत छलाह । हुनक पत्‍नीक नाम सुदेहा छलनि । सन्तान नहि होमय के कारण सुदेहा सुधर्माक विवाह अपन छोट बहीन घुश्मा सँ करा देलथिन । शिव भक्‍त घुश्मा एक पुत्र के जन्म देलनि । किछु वर्षक बाद सुदेहा कें घुश्मा सँ ईर्ष्या होबय लगलनि । ओ घुश्माक जवान पुत्र के मारि कें पोखरि मे फेकि देलनि । एहि बात पर घर मे कोहराम मचि गेल । लेकिन घुश्मा प्रतिदिन जेना शिवक पूजा-अर्चना मे लीन रहथि । एहि सँ प्रसन्‍न भगवान शिव मारि देल गेल पुत्र के पुनः जीवन दान दऽ इच्छित वरदान माँगय के लेल कहलथिन्ह । घुश्मा कहलथिन्ह - ज्येष्ठ बहीन सुदेहा के माफ कऽ देल जाए आओर लोकक कल्याणक लेल अपने सदा सर्वदा के लेल एहि स्थान पर निवास कयल जाय । भगवान शिव हुनक दुनू बात के मानि ज्योतिर्लिंग के रूप मे प्रकट भऽ ओहि स्थान पर निवास करय लगलाह । सती शिवभक्‍त घुश्माक आराध्य देव होयबाक कारण ओ एहि स्थान पर घुश्मेश्‍वर महादेव के नाम सँ विख्यात भेलाह ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-4918731316235623577?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/4918731316235623577/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=4918731316235623577&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4918731316235623577'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4918731316235623577'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='द्वादश ज्योतिर्लिंग कथा'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-164129835598633777</id><published>2011-07-26T10:29:00.000-05:00</published><updated>2011-07-26T10:34:27.017-05:00</updated><title type='text'>विद्यापति</title><content type='html'>जनम होअए जनु,जआं पुनि होइ।&lt;br /&gt;जुबती भए जनमए जनु कोई।।&lt;br /&gt;होइए जुबती जनु हो रसमंति।&lt;br /&gt;रसओ बुझए जनु हो कुलमंति।।&lt;br /&gt;निधन मांगओं बिहि एक पए तोहि।&lt;br /&gt;थिरता दिहह अबसानहु मोहि।।&lt;br /&gt;मिलओ सामि नागर रसधार।&lt;br /&gt;परबस जन होअ हमर पिआर।।&lt;br /&gt;परबस होइअ बुझिह बिचारि।&lt;br /&gt;पाए बिचार हार कओन नारि।।&lt;br /&gt;भनइ विद्यापति अछ परकार।&lt;br /&gt;दंद-समुद होअ जिब दए पार।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-164129835598633777?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/164129835598633777/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=164129835598633777&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/164129835598633777'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/164129835598633777'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='विद्यापति'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-2179472363511177184</id><published>2011-04-02T23:34:00.002-05:00</published><updated>2011-04-02T23:36:46.384-05:00</updated><title type='text'>भारत के लेल यादगार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-RYJXPUyDXSY/TZf5NpkpxQI/AAAAAAAAAVc/AA82TgTQebk/s1600/131014.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 288px; height: 400px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-RYJXPUyDXSY/TZf5NpkpxQI/AAAAAAAAAVc/AA82TgTQebk/s400/131014.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5591211475296961794" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/-zyFddZru4IY/TZf5NWcSgHI/AAAAAAAAAVU/vXw3EVnfF-U/s1600/131005.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 310px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-zyFddZru4IY/TZf5NWcSgHI/AAAAAAAAAVU/vXw3EVnfF-U/s400/131005.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5591211470161608818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/-tpX00NTFcww/TZf5NGZ1aKI/AAAAAAAAAVM/f5_h5xhaws0/s1600/131012.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 301px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-tpX00NTFcww/TZf5NGZ1aKI/AAAAAAAAAVM/f5_h5xhaws0/s400/131012.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5591211465856346274" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/-WWH2clDRB3g/TZf5Mxi35GI/AAAAAAAAAVE/oenw0W5yBYs/s1600/131007.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 310px;" src="http://4.bp.blogspot.com/-WWH2clDRB3g/TZf5Mxi35GI/AAAAAAAAAVE/oenw0W5yBYs/s400/131007.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5591211460257113186" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-2179472363511177184?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/2179472363511177184/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=2179472363511177184&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2179472363511177184'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2179472363511177184'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='भारत के लेल यादगार'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-RYJXPUyDXSY/TZf5NpkpxQI/AAAAAAAAAVc/AA82TgTQebk/s72-c/131014.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-2185669405338496262</id><published>2011-02-14T07:07:00.000-06:00</published><updated>2011-02-14T07:08:45.813-06:00</updated><title type='text'>आउ हमर जिनगी मे</title><content type='html'>हवाक झोंक जेकाँ आउ हमर जिनगी मे। &lt;br /&gt;आउ निधोख अहाँ आउ हमर जिनगी मे।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बन्न कोठली / बिलैया हमर कल्पना&lt;br /&gt;ठेलि द्वार अहाँ आउ हमर जिनगी मे।&lt;br /&gt;मन-संसार बुझू जेठक दुपहरिया&lt;br /&gt;पहिल फुहार जेकाँ आउ हमर जिनगी मे।&lt;br /&gt;बबूर-काँट भरल बाट, हम हेरायल&lt;br /&gt;सिंगरहार जेकाँ आउ हमर जिनगी मे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इनार भुतहा गिडय़ ई अन्हरिया&lt;br /&gt;इजोत आँखिक दÓ आउ हमर जिनगी मे। &lt;br /&gt;जबदियाह बनल जिनगी ठमकि कÓ रूकल&lt;br /&gt;सुरक फाँक लÓ कÓ आउ हमर जिनगी मे।&lt;br /&gt;चिड़ैक पाँखि लÓ कÓ आउ हमर जिनगी मे&lt;br /&gt;इजोत आँखि लÓ कÓ आउ हमर जिनगी मे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहिल फुहार जेकाँ आउ हमर जिनगी मे।&lt;br /&gt;ठेलि कÓ द्वार अहाँ आउ हमर जिनगी मे।&lt;br /&gt;हवाक झोंक सन-सनाइत हमर जिनगी मे&lt;br /&gt;आउ निधोख गुनगुनाइत हमर जिनगी मे।&lt;br /&gt;आउ भरि पोख दनदनाइत हमर जिनगी मे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- कुमार मनीष अरविन्द&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-2185669405338496262?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/2185669405338496262/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=2185669405338496262&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2185669405338496262'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2185669405338496262'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/02/blog-post_14.html' title='आउ हमर जिनगी मे'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-7511214307744717587</id><published>2011-02-12T23:42:00.001-06:00</published><updated>2011-02-12T23:42:48.747-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>चिन्हार-अनचिन्हार</title><content type='html'>ओ &lt;br /&gt;नेने सँ परदेस बसनिहार&lt;br /&gt;पितियौत भाइक सार के चिन्है छथि&lt;br /&gt;ओ &lt;br /&gt;मसिया ससुरक &lt;br /&gt;पितियौत भाइ के चिन्है छथि&lt;br /&gt;ओ ओइ दिन&lt;br /&gt;आश्चर्य&lt;br /&gt;पितियौता पितियौतक साढ़ूक भाइ के&lt;br /&gt;सेहो खट् दÓ चीन्हि गेलाह&lt;br /&gt;मुदा, &lt;br /&gt;हमरा बेर मे&lt;br /&gt;भटकि गेलाह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुइए बरख भेल&lt;br /&gt;हम कोन पापे पंजाब गेलहुँ &lt;br /&gt;किछु पढ़ल रहितहुँ&lt;br /&gt;तÓ दिल्ली जइतहुँ &lt;br /&gt;पैंट&lt;br /&gt;एकटा टी शर्ट&lt;br /&gt;बस एतबे&lt;br /&gt;बस एतबे मे&lt;br /&gt;भटकै छथिन्ह बाबू&lt;br /&gt;हमरा कहै छथि-&lt;br /&gt;अहाँ के छी बाबू?&lt;br /&gt;अहाँ जयकान्त?&lt;br /&gt;न:&lt;br /&gt;श्रीधर यौ&lt;br /&gt;न: &lt;br /&gt;हमरा लागल&lt;br /&gt;बाबू एकदम्मे भटकि गेलाह। &lt;br /&gt;हम कहलियनि&lt;br /&gt;बाबू हम गुलेटन दास&lt;br /&gt;अहीं टोल मे तÓ रहै छी&lt;br /&gt;बहीर दासक बेटा&lt;br /&gt;मोन नै अछिï?&lt;br /&gt;भुतही गाछी मे हमही ने अहाँक सीसो पांगि दी&lt;br /&gt;छोटका बउआ के कान्ह पर रोज इसकूल हमही ने लÓ जइयैनि&lt;br /&gt;आÓ तेसरा दिन पर अहाँ के बंसीक माछ खोआबी&lt;br /&gt;हमर बाप-पित्ती&lt;br /&gt;अहीं सभक सेवा करैत जीवन गुजस्त कयलक&lt;br /&gt;सभटा बिसरि गेलियै बाबू?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हँ, हँ, चिन्हलियौ&lt;br /&gt;कह ने-&lt;br /&gt;गुलटेनमा !&lt;br /&gt;बहिराक बेटा ! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- राजकुमार मिश्र&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-7511214307744717587?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/7511214307744717587/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=7511214307744717587&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/7511214307744717587'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/7511214307744717587'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/02/blog-post_12.html' title='चिन्हार-अनचिन्हार'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-4135681498259913234</id><published>2011-02-10T00:24:00.000-06:00</published><updated>2011-02-10T00:27:57.145-06:00</updated><title type='text'>गजल</title><content type='html'>धरम-करम मे हेबनि मे विश्वास बढ़ल छै ठाकुर जी&lt;br /&gt;हमर कहब जे आर बहुत किछु खास बढ़ल छै ठाकुर जी! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पँच-पँच कोटिक वाहन चढ़ल, कुबेर लोकनि अवतरलाहए&lt;br /&gt;शहरक कात झोपड़पट्टी मे दास बढ़ल छै ठाकुर जी! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओमहर देखू लक्ष-लक्ष भगवाधारी कमरथुआ केँ&lt;br /&gt;एमहर रक्त गरम पीबक अभ्यास बढ़ल छै ठाकुर जी! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साँच भेल वनबासी राम, वहिष्कृत घट-घट जिनगी सँ&lt;br /&gt;चीर हरन आ दुर्योधन संग रास बढ़ल छै ठाकुर जी! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइ काल्हि ऋषि-मुनिक देशक मे, बाबा बहुत उखड़लाहए&lt;br /&gt;कपरकोट कल्याणक स्वार्थक चास बढ़ल छै ठाकुर जी! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यो माला क्यो छाप-तिलक, क्यो निज चरणामृत बेचैए&lt;br /&gt;लक्ष्मी-वाहन भीआइपी लै पास बढ़ल छै ठाकुर जी! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आस्था-क्षमा मूल धरमक-क ख ग सभ दिन रहलैए&lt;br /&gt;त्याग-तप उपकार शून्य, उपहास बढ़ल छै ठाकुर जी! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- सियाराम झा 'सरसÓ&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-4135681498259913234?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/4135681498259913234/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=4135681498259913234&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4135681498259913234'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4135681498259913234'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/02/blog-post_10.html' title='गजल'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-6471807690686794983</id><published>2011-02-09T00:04:00.000-06:00</published><updated>2011-02-09T00:05:17.749-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>हम मैथिल छी</title><content type='html'>&lt;span style="font-style:italic;"&gt;केओ अहाँ कें दरभंगिया कहत,&lt;br /&gt;केओ अहाँ कें बिहारी कहत, &lt;br /&gt;केओ अहाँ कें बाजर पर टोकत,&lt;br /&gt;केओ अहाँ कें पहिरन पर हँसत,&lt;br /&gt;मुदा ! अहाँ अपन काज बुझबै,&lt;br /&gt;अप्पन काज नीक सँ करबै,&lt;br /&gt;तखन, अहाँक परिश्रम&lt;br /&gt;आ अहाँक मेधा देखैत&lt;br /&gt;सब अहाँ कें मानत&lt;br /&gt;सब अहीं कें पूछत&lt;br /&gt;आ अहाँ कहबै जे हम मैथिल छी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;की दिल्ली, की पंजाब&lt;br /&gt;की मुंबई, की गुजरात&lt;br /&gt;कोलकाता सँ आसाम&lt;br /&gt;सैनिक रूपेँ देशक सिमान।&lt;br /&gt;सब ठाम अहाँ विराजमान।&lt;br /&gt;अप्पन काजक बलेँ छोड़ैत निशान।&lt;br /&gt;हे! अहाँ कहियो परिश्रम केर बाट&lt;br /&gt;नइँ छोड़ब।&lt;br /&gt;सब ठामक परिवेश सँ अपना कें जोड़ैत&lt;br /&gt;अहाँ कहबै जे हम मैथिल छी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहाँक संघर्ष,&lt;br /&gt;अहाँक सफलता, अहा...अहा...&lt;br /&gt;अहाँ सम्पन्न हैब,&lt;br /&gt;प्रतिष्ठित हैब, &lt;br /&gt;मुदा हे! अहाँ संघर्षक बाट&lt;br /&gt;नइँ छोड़ब,&lt;br /&gt;मोन पड़त अप्पन गाम&lt;br /&gt;ताहु लेल सोचब,&lt;br /&gt;अप्पन संस्कृति, अप्पन भाषा&lt;br /&gt;नइँ बिसरब।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;...आ जँ कहियो ईष्र्यावश कियो&lt;br /&gt;हिंसा पर उतरि जाय&lt;br /&gt;त पड़ायब नइँ।&lt;br /&gt;अप्पन गामक माटि केर सप्पत&lt;br /&gt;कहबै जे हम मैथिल छी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- आत्मेश्वर झा &lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-6471807690686794983?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/6471807690686794983/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=6471807690686794983&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6471807690686794983'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6471807690686794983'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/02/blog-post_09.html' title='हम मैथिल छी'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-8759884993229885296</id><published>2011-02-06T23:21:00.003-06:00</published><updated>2011-02-06T23:24:46.747-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रभात झा'/><title type='text'>मिथिला क प्रभात झा</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TU-BzfU0lMI/AAAAAAAAAT0/bFMpVOMlA4E/s1600/prabhat%2Bjha.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 269px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TU-BzfU0lMI/AAAAAAAAAT0/bFMpVOMlA4E/s400/prabhat%2Bjha.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5570813985662735554" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;प्रभात झा यानी भारतीय जनता पार्टी क ओ जानल पहचानल नाम जे कार्यकर्त्ता स लयक पार्टी के वरिष्ठ पधाधिकारी के जुवान पर अछि .पार्टी के जमीनी नेता आ समाज के हर बर्ग मे अपन संवाद स्थापित करै वाला प्रभात झा क ' ताल्लुकात ,मिथिला स रहलैंह अछि लेकिन ओ आई मध्य प्रदेश के लोकप्रिय नेता के रूप मे जानल जायत छैथ .भारतीय जनता पार्टी मे ई शायद पहिल राजनितिक प्रयोग होयत जे पार्टी कोनो राज्य मे दोसर राज्यक व्यक्ति के पार्टी अध्यक्ष नियुक्त केने हो . मध्य प्रदेश बीजेपी के कमान प्रभात झा के देल गेल अछि यानी बीजेपी शासित देश के प्रमुख राज्य मध्यप्रदेश मे पार्टी सञ्चालन आउर पार्टी क ' आधार मजबूत करबाक जिम्मेदारी प्रभात झा के देल गेलैंह अछि .मधुबनी निवासी राज कुमार झा कहैत छथि "स्वर्गीय ललित नारायण मिश्रा के बाद मिथिला मे कोनो कद्दावर नेता क आभाव रहल अछि जिनकर पहचान राष्ट्रीय स्तर पर हो ,प्रभात झा अहि परम्परा मे एकटा नव उम्मीद जगोलैंह अछि "&lt;br /&gt;स्वर्गीय परमेश्वर झा आ माता अमरावती क ' पुत्र प्रभात झा क ' जन्म ४जुन १९५७ मे दरभंगा के हरिहर पुर गाम मे भेल छलैन्ह लेकिन ओ अपन अध्यन अध्यापन मध्यप्रदेश मे पूरा केलैन्ह .राजनीती शास्त्र स एम् ए आउर क़ानून के डिग्री लेलक बाद श्री झा समाज सेवा के अपन ध्येय बनौलैंह आ राजनीती मे शुचिता आ समग्रता क आधार मजबूत करबा लेल निरंतर संघर्षशील रहलाह .बीजेपी मे शायद ई पहिल नेता छैथ जे अपन सम्पति क 'व्योरा हर साल प्रस्तुत करैत छैथ .&lt;br /&gt;२००८ मे पार्टी हुनकर राजनितिक दक्षता देखि आमजन क समर्पित कार्यकर्त्ता प्रभात झा के संसद मे अपन भूमिका निभेवाक मौका देल्कैंह .श्री झा राज्य सभा आउर ओकर महत्वपूर्ण कमिटी क सदस्यक रूप मे हरदम संसद के गरिमा आ आम जन के सवाल के लयक प्रयत्नशील रहलाह .&lt;br /&gt;बीजेपी के शीर्ष नेता क पदचिन्ह पर चलैत श्री झा अपन जीवन क मत्वपूर्ण हिस्सा समाज सेवा आउर पत्रकारिता मे लागोउलैंह.प्रभात झा बीजेपी के मुखपत्र कमल सन्देश क संपादक बनि पार्टी क निति आउर विचार के कार्यकर्ताक बीच पहुचाबैत रहलाह अछि .लेखक के रूप मे श्री झा जन गन मन आउर दीनदयाल उपाध्याय क जीवनी सहित कतेको महत्वपूर्ण पुस्तक लिखलैंह.संघ के समर्पित कार्यकर्त्ता प्रभात झा देश सेवा आ ईमानदारी के अपन पूजी मान्लैंह त राजनीती के साध्य .ओ राजनीती के साधन माने वाला के सामने एकटा मिसाल कायम केलैन्ह जे राजनीती मे आइओ ईमानदारी आउर निष्ठां के क़द्र छैक .आइओ समाजसेवा के मूल्य छैक .प्रभात झा स संपर्क अहि ई मेल स कयल जा सकैत अछि . prabhatjhabjp@gmail.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-8759884993229885296?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/8759884993229885296/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=8759884993229885296&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/8759884993229885296'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/8759884993229885296'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/02/blog-post_4980.html' title='मिथिला क प्रभात झा'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TU-BzfU0lMI/AAAAAAAAAT0/bFMpVOMlA4E/s72-c/prabhat%2Bjha.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-9156972571445593884</id><published>2011-02-06T23:19:00.001-06:00</published><updated>2011-02-06T23:19:49.791-06:00</updated><title type='text'>के बुझत मिथिलाक दर्द</title><content type='html'>गौरीशंकर राजहंस, वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सांसद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिथिलांचल के विषय मे लोक खूब सुनैत -सुनबैत अछि ,मुदा वास्तविक अनुभूति ओतहि जा क ' होयत छैक .कहियो मिथिला क ' भूमि अन्नक भंडार छल .सही अर्थ मे ओ सोना उगलैत छल ,आई सर्वत्र गरीबी पसरल छैक .यैह कारण जे मिथिलांचल सँ लाखोक संख्या मे लोक रोजी रोटी खोज मे दिल्ली ,मुंबई ,पंजाब आ दोसर शहर जा रहल अछि .पहिने लोक कलकत्ता जायत छल ,मुदा आई अहि दौर मे हरियाणा ,पंजाब ,दिल्ली मे मिथिलाक लोक संघर्ष क़' रहल अछि .मजदूरक टोली भोर होयते जखन काम काज पर जयबाक उपक्रम करैत छथि तं हुनक गप सुनी हमरा अपार आनंदक अनुभव होयत अछि .मिथिला सँ दूर होयतो ई वर्ग अपन भाषा नहि छोडलान्ही..सांच गप त ' ई अछि जे दुनिया में फ्रेंच भाषाक बाद मैथिली के नाम अबैत अछि .सबसँ मधुर भाषा के श्रेणी में .बंगला के नम्बर एकर बाद अबैत अछि ..चारि करोड़ मैथिल भाषी छी लेकिन मातृभाषा उपेक्षित भ ' रहल अछि .&lt;br /&gt;मिथिलाक सबसँ पैघ समस्या अछि प्रलयंकारी बाढी..हर साल ई मीडिया के लेल रिकॉर्ड तोड़े वाला होइत छैक .लेकिन ई सम स्या सँ निजात आई तक नहि भेट सकल .हम अनेक वर्ष धरी संसद मे अहि समस्या के तरफ सदन आ सरकार के आकर्षित कयलहूँ .समाधान के लेल रास्ता बतेलहूँ जे जातक नेपाल क 'नदी कें बानहल नहि जायत ,सालो साल भरि रहल बालूक सफाई आ पनिक निकासी के समुचित व्यवस्था नहि होयत .ता धरी मिथिलांचल क गरीबी आ बाढी क तबाही सँ उबरनाय मुश्किल .नेपाल के अगर अहि समस्या क समाधान लेल राजी कयल जाय त अहि क्षेत्र मे हजारों मेगावाट बिजली उत्पन्न भ ' सकैत अछि .ओही बिजली सँ नेपाल आ मिथिलांचल के कायाकल्प भ ' सकैत अछि .अहि सँ भरपूर ओद्योगीकरण हेते आ दुनु देश मे खुशहाली लौटत.यदि से भ' जय त मिथिलांचल सँ पलायन अपने आप रुकी जायत .हमरा सोझा मे भूटान उदाहरण अछि .भूटानक नदी सँ बिजली क ' जतेक उत्पादन होयत छैक तकर तीन चौथाय भाग भारत मे निर्यात होयत छैक ..भारतक जाही राज्य मे भूटान क 'चूका प्रोजेक्ट 'सँ बिजली अबैत अछि ओही राज्य में बिजली क स्थिति देश के अन्य राज्य के तुलना मे कही बेहतर अछि .जं भूटान सँ एहन समझौता भ' सकैत अछि त नेपाल सँ किएक नहि भ' सकैत अछि .&lt;br /&gt;हम देखलहु जे समस्त मिथिलांचल मे कोनो एहन अस्पताल नहि छैक जत' गरीब मरीज इलाज़ करबा सकैथ .लाचार मरीज के दिल्ली आने पडैत छैन्ह .दिल्ली मे एम्स के इलाज आ रहनाय सहनाय के दिक्कत के अंदाज लगा सकैत छी .की एहने अस्पताल मिथिलांचल मे नहि भ' सकैत अछि ? सबसँ दुखक बात ई जे मिथिलांचल मे 60 फिसद सँ ज्यादा घर मे कोनो शौचालय नहि छैक .अइयो अधिकाश स्त्रिगनसमाज के सांझ -भिनसर खाली सड़क के इंतजार करै पडे छैन्ह .राजनेता सभ मात्र अपन जेबी टा भडलैंह आ जातिक नामपर लोक के लड्बैत रहलाह .&lt;br /&gt;मिथिलांचल मे समस्या अनंत अछि .लेकिन कोनो एहन समस्या नहि अछि जकर निदान नहि छैक .आबश्यकता छैक लोक सबके जागरूक हेबाक .अबश्यक छैक नौजवान के आगा अयबाक .अन्यथा मिथिला के दर्द के केयो नहि बुझी सकत&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-9156972571445593884?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/9156972571445593884/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=9156972571445593884&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/9156972571445593884'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/9156972571445593884'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/02/blog-post_06.html' title='के बुझत मिथिलाक दर्द'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-9116523724954528798</id><published>2011-02-05T03:46:00.001-06:00</published><updated>2011-02-05T03:50:56.526-06:00</updated><title type='text'>मिथिलाक संगीत परंपरा</title><content type='html'>’सम’ एवं ’गीत’ दुनूक संयोग सँ संगीत शब्दक निर्माण भेल अछि । ’सम’ (सम्यक)क अर्थ नीक एवं सुंदर होइछ । वाद्य एवं नृत्य दुनूक मेल भेने गीत नीक आ सुंदर बनि जाइछ । गीत, वाद्य एवं नृत्य एहि तीनूक समन्वित स्वरूप केँ संगीत कहल गेल अछि । संगीत सँ आनंदक आविर्भाव होइछ । ज्ञान आ योगक सर्वश्रेष्ठ ज्ञानी याज्ञवल्क्यक कथन अछि -&lt;br /&gt;वीणा वदन तत्वज्ञ: श्रुति जाति विशारद:।&lt;br /&gt;तालज्ञश्चा प्रयासेन मोक्षमार्ग प्रयच्छति ।&lt;br /&gt;- याज्ञवल्क्य स्मृति&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(संगीत रूपी एकमात्र साधन सँ धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष चारू पुरुषार्थ भेटैत अछि ।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संगीत जगतक इतिहास अति प्राचीन अछि । हजारो-हजार वर्षक एहि इतिहास मे हमरा लोकनि कें ओकर क्रमिक विकास दृष्टिगोचर होइछ । विदित अछि जे भारत मे सर्वप्रथम साम गायनक प्रचलन छल । वेद परंपरा मे संगीतक उत्पत्ति सामवेद सँ मानल गेल अछि । तें कहल गेल अछि जे ’साम्वेदादिदं गीतं सज्जग्राह पितामह:’।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एहिना एक परंपराक पश्चात दोसर परंपरा आरंभ भेल । दोसर परंपराक रूप मे गाथा गायन, राग गायन एवं थाट गायनक विकास भेल । युग परिवर्तनक संग संगीत जगत मे सेहो परिवर्तन होइत गेल अछि । ई परिवर्तन मात्र गायन मे नहि, अपितु रागक स्वरूप मे सेहो होइत रहल अछि । सर्वप्रथम श्रुति, श्रुति सँ स्वर, स्वर सँ ग्राम, ग्राम सँ मूर्च्छना, मूर्च्छना सँ जाति, जाति सँ राग, राग सँ थाटक उत्पत्ति भेल अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संगीत शास्त्रक अवतरण मे अनेक परंपराक उत्पत्ति भेल अछि, यथा - वेद परंपरा, आगम एवं पुराणक परंपरा तथा ऋषि प्रोक्त परंपरा । उपर्युक्त तीनू परंपरा मे अनेकानेक महर्षिक प्रादुर्भाव भेल अछि जे अपन दिव्यज्ञान सँ संगीत जगत केँ आलोकित करैत संगीत शास्त्रक रचना कयलनि । एहि धारा मे क्रमश: नन्दिकेश्वर, नारद, स्वाति, तुम्बरू, भरत, दत्तिल, कोहल, विशाखिल, कश्यप, याष्टिक, आंजनेय, हनुमन्मत, शार्दूल, मतंग, सुधाकलश, अभिनवगुप्त, महाराज भोज, नान्य देव, सोमेश्वर, जगदेक मल्ल, शारदातनय, सोमराज, जयदेव, शारंगदेव, पं. दामोदर, पं, अहोवल एवं पं. लोचन झा आदि मुख्य छथि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय संगीत जगत विश्वक अन्य कोनो देशक संगीत सँ प्राचीन अछि । प्राचीन भारत मे गायनक एक्के पद्धति छल । संगहि एक्के प्रकारक संगीत विद्यमान छल । मुसलमान शासकक आक्रमण भारत मे भेलाक बाद एहिठाम आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक समस्त क्षेत्र मे आघात भेल । एहिठामक गायन परंपरा पर प्रहार भेल । तेँ परंपरा छिन्न-विछिन्न भ’ गेल । उपर्युक्त आक्रमण महमूद गजनबी द्वारा दशम शती ई.क अंतिम दशक मे भेल । अलबरूनी ई स्वीकार कयने छथि जे "हिन्दू विद्या ओतय चलि गेल जत’ हुनका लोकनिक पहुँच नहि छ्ल ।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महमूद गजनबीक कश्मीर पर आक्रमण १०१५ मे भेल । ओहि ठामक पंडित छल वा मूर्ख, गुणी छल वा गँवार सभ पर एकर व्यापक असरि पड़ल । एहि बात सँ पूर्ण भारतक राजा, विद्वान, कलाकार, धर्मनिष्ठ सभ जन मे भयावह स्थिति व्याप्त भ’ गेल । एहने विषम स्थिति मे पम्मार क्षत्रिय (कर्णाट देशीय) नान्यदेव मिथिला पर चढ़ाई क’ शासक बनि गेलाह । हिनक शासनकाल १०८९ मे स्थापित भेल । किछु दिन तँ निर्विघ्न बीतल, मुदा बाद मे बंग देशीय मुर्शिदाबाद जिलाक अंतर्गत कर्ण सुवर्ण राजा आदि शूर (विजसेन)क आज्ञानुसार हुनक पुत्र बल्लालसेन मिथिला पर आक्रमण कयल । नान्यदेव केँ परास्त क’ हुनका बंदी बनौलकनि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाराजा नान्यदेव संगीत शास्त्रक मूर्धन्य विद्वान छ्लाह । हुनक प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सरस्वती हृदयालंकार’ अछि, जकर दोसर नाम ’भरत भाष्य’ अछि । एहि ग्रंथ मे पूर्वर्ती विद्वानक यथा आपिशूल, पाणिनि, विशाखिल, कश्यप, मतंग, देवराज, शतातय तथा रत्नकोशक चर्चा अछि । महाराज नान्यदेव गांधार नगरक चर्चा करैत ओहि सँ उत्पन्न राग समूह केँ लौकिक व्यवहारक लेल उपयुक्त मानलनि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१४म शताब्दीक आरंभ सँ एहिठामक कला पुनर्जीवित भेल । कलाकार एवं शास्त्रकार पुन: अपन वृतिक प्रति जागरूक भेलाह । उत्तर भारत एवं दक्षिण भारतक बीच एक व्यवस्था पर सहमति बनल, जाहि सँ उत्तर भारत मे थाट आ दक्षिण भारत मे मेलक उत्थान भेल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय संगीतक परिप्रेक्ष्य मे जखन हम मिथिलाक संगीत परंपरा पर दृष्टिपात करैत छी तँ देखैत छी जे एकर अपन एक पृथक इतिहास अछि जाहि मे एकर प्राचीनता एवं परंपरा समटल अछि । संगीतक क्रमिक विकासक वास्तविक स्वरूप ’मिथिलाक संगीत परंपरा’ मे भेटैत अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिथिलाक संगीत परंपरा हेतु वैदिक युग पर दृष्टि देबय पड़त । ओहि युग मे संगीतक संपूर्ण थाती पुरहितक हाथ मे छल । संगीतक प्रचार-प्रसार मे पुरहितक अहम भूमिका रहल । पुरहित आन जातिक नहि मात्र ब्राह्मण होइत छ्लाह । यज्ञादि अवसर पर ब्राह्मण लोकनि सामवेदक ऋचा के सछंद आ सस्वर गबैत छ्लाह । एहि युगक संगीत अधिकांशतया यज्ञक अंगतम रूप मे बनल रहय । यज्ञ पूजादि मे सामगान अनिवार्य छन । शतपथ-ब्राह्मण मे तँ एहन कहल गेल अछि जे बिना सामगानक यज्ञ पूर्णे नहि होइत छल । एहि तरहें सामगान ब्राह्मणक एक विशेष अंग छ्ल । समाजक अन्य वर्ग कें ज्ञानदान करब, वैदिक रीति-रेवाज कें समाज द्वारा ग्रहण करायब तथा पूजा-पाठ, यज्ञ-याप आदि मे सामगान करब हुनक प्रधान कार्य छ्ल । ब्राह्मण परिवार मे सामवेदक ज्ञाता प्राय: सभ होइत छलाह जाहि कारणें हुनक संगीतज्ञ हैब स्वाभाविके छल । प्राचीन परिपाटीक प्रभाव आइयो संपूर्ण मिथिला मे देखल जाइत अछि । जन्म सँ ल’ यज्ञोपवीत आदि प्रत्येक अवसर पर कोनो ने कोनो रूपें सामगान होइतहि अछि । वर्तमानक ई प्रचलित रेवाज वैदिके युगक देन थिक । तें मिथिलाक संगीत परंपराक यात्रा वैदिक युग सँ आरंभ मानल गेल अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामगायनक परंपरा चलिते रहल कि एक टा दोसर धारा आरंभ भेल जे लोक वा लौकिक संगीत गायन परंपरा कहौलक । ओहि गान मे नियमक परिपालनक कोनो व्यवस्था नहि छल । जीवनक संपूर्ण गतिविधिक सजीव चित्रण ओहि गायन मे रहैत छल । जखन सामगान समाजक अन्य वर्गक हेतु दुरूह भ’ गेल, तँ वंचित जनमानस ओहि गानक नकल अपन-अपन घर मे आरंभ क’ देलक । एहि गान मे सामगानक नियम-बंधन कें सुविधानुसार तोड़ि-मरोड़ि देल गेल । ई लौकिक गान जातीय गान एवं ऋतु गानक रूप मे प्रकट भेल जाहि मे पारस्परिक रूढ़क जगह लोक जीवन लैत गेल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एहि तरहें देखबा मे अबैत अछि जे मिथिला मे कालक्रमे गानक दू स्रोत भ’ गेल । एक स्रोत मे सामगानक जे एक विशेष वर्गक अधीनस्थ रहल, दोसर ओ गान जे सर्वजन सुलभ-सरल भेल जाहि मे गानक स्वतंत्रता छल । स्वतंत्र गान मे लौकिक संगीत चलैत रहल एवं बंधन ओ नियमक आधार पर चलयवला सामगान मे जड़ता अबैत गेल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सामगायनक उपरांत गाथा गायनक परिपाटी आरंभ भेल । ऋग्वेदक अनेक मंत्र मे ’गाथा’ शब्दक उल्लेख अछि । ’गाथा’ शब्दक प्रयोग पद्य वा गीतक अर्थ मे प्राप्त होइत छल । गाथा गायन कर’ वला कें ’गाथिन’ कहल गेल अछि । ’ऐतरेय ब्राह्मण’ मे ऋक्‌ एवं गाथा मे अंतर देखाओल गेल अछि । ऋक्‌ दैवी अछि आ गाथा मानवी । ब्राह्मण ग्रंथ सँ ई प्रमाणित होइत अछि जे ऋक्‌ यजु: आ साम सँ पृथक होइत छल, ओकर प्रयोग मंत्रक रूप मे नहि कयल जाइत छल । कोनो राजाक सुकीर्ति कें लक्षित क’ लोकगीतक रूप मे ओकर उपस्थापन कयल जाइत छल । जन-समूह द्वारा ओ गीत गाओल जैत छल आ गाथाक नामे ओ प्रचलित छल । मिथिला मे लौकिक संगीत एहिना जनजीवनक संग चलैत रहल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिथिला मे लोरिक, सलहेस, दीना-भद्री, विहुला, नैका-बनिजारा आदि अनेक गीत अछि जे गाथा गीतक नामे जानल गेल । संभवत: सामगायनक दुरूहताक कारणे लोक ओहि सँ विमुख होइत गेल आ गाथा गायनक प्रति आकर्षित होइत गेल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एहि बीच छंद गायनक एकटा नवीन परंपरा आरंभ भ’ गेल । एहि परंपराक परिपोषक विद्वत्‌जन भेलाह । गाथा गायन उन्मुक्त एवं स्वच्छंद रूपें गाओल जाइत छल । कोनो तरहक प्रतिबंध एहि गायन मे नहि रहैत छल । एक व्यक्ति अनुकरण क’ अगिला पीढ़ी कें अनुकरण हेतु प्रेरित करैत छलाह एवं गाथा गायनक मौखिक शिक्षा दैत छलाह । ई परिपाटी सैकड़ो वर्ष धरि चलैत रहल आ औखन चलि रहल अछि । भारतीय भाषा मे सभ सँ प्राचीन छंद सभ वेद मे उपलब्ध अछि । वेदेक छंद सँ मैथिलीक छंद सभ विकसित भेल हो से संभव अछि । वेद मे गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, बृहती, पंक्तिक, त्रिष्टुप एवं जगती जे क्रमश: ८, १०, ११ वा १२ वर्णक चरण सभ सँ बनल । वैदिक कालीन परंपराक बाद जे कवि वा विद्वान भेलाह ओ अपन विवेकानुसार आकस्मिक लयक आ तालक वर्ण-विन्यास करैत रहलाह । कालक्रमे ई रचना सामान्य छंद सँ बेसी चमत्कारी आ कर्णप्रिय होमय लागल । काव्य मे छंदक विशेष स्थान छल । कालांतर मे वैह छंद तालक स्वरूप मे आबि गेल यथा - छओ मात्राक ताल-दादरा, खेमटा । सात मात्राक ताल - तिब्रा, रूपक एवं पश्तो । आठ मात्राक ताल - कहरबा एवं धुमाली, दस मात्राक ताल - झप्ताल एवं सूलताल । बारह मात्राक ताल - एकताल, चौताल । चौदह मात्राक ताल - दिपचंदी (चाँचर), झूमरा, धमार, गजझंपा आ आड़ा चौताल । सोलह मात्राक ताल - त्रिताल, यत एवं तिलवाड़ा अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साधारणतया मैथिली लोकगीत वर्णावृतक अपेक्षा मात्रिक छंद मे लिखल गेल । मात्रिक छंद मे मात्रा गनल जाइत छल आ तद्‌नुकूल ताल मे गाओल जाइत छल ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;छंद गायनक उपरांत गाथा गायनक परिपाटी आरंभ भेल । प्रबंध रचना संस्कृत मे होमय लागल । प्रसिद्ध भक्तकवि जयदेव रचित ’गीत गोविंद’ एकर उदाहरण अछि । प्रबंध गायन मे संस्कृत पद कें राग मे बान्हि उपस्थापन कयल जाइत छल । मिथिला मे ई गायन पद्धति कैएक सय वर्ष धरि रहल । ओहि गीत मे अनेक चरण होइत छल, जेना- उद्‌ग्राह, मेलापक, ध्रुव, अंतरा एवं आभोग । ई प्राय: सामगानक प्रस्ताव, उद्‌गीत, प्रतिहार, निधान, उपद्रव आदिक प्रतिरूप रहल हो से संभव । प्रबंध गीतक समस्त भेदक विषय मे उल्लेख करब उचित नहि, कारण एकर विशाल विवरण अछि । संक्षेप मे ई कहल जा सकैछ जे मिथिला मे एहि गीत गायनक परंपरा कें शास्त्रीय संगीत गायनक द्वारा जियाक’ रखलनि स्व. माँगन, स्व. रामचन्द्र झा, स्व. बालगोविन्द झा, स्व. रामचतुर मल्लिक आ स्व. दरबारी दास नटुआ ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रबन्ध गीतक तीन भेद मानल गेल अछि - क्रमश: सूड, आलि एवं विप्रकीर्ण । सूडक दू भेद अछि _ शुद्ध सूड एवं सालग सूड ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुद्ध सूडक भेद - एहि मे आठ भेद अछि - एला, करण, ढेंकी, वर्तनी, झोवड़, लंब, परास, एकताली ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सालग सूडक भेद - एहि मे सात भेद मानल गेल अछि जाहि मे ध्रुव, मंठ्‌य, प्रतिमंठ्‍य, निस्सारूक अड्‌ड, रास, एकताली । ध्रुव सँ ध्रुवा, ध्रुवा सँ ध्रुपद आधुनिक रूप अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिथिलाक संगीत परंपरा मे राजा नान्यदेवक बाद राजा हरिसिंहदेवक नाम अबैछ । ओ संगीतक पूर्ण ज्ञाता आ परिपोषक छलाह । हुनका विषय मे कहल गेल अछि -&lt;br /&gt;हरोवा हरिसिंहो वा गीत विद्या विशारदौ&lt;br /&gt;हरि(हर) सिंहे गते स्वर्गगीत विद्‌ केवलं हर:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजा हरिसिंह देव (१२९५ ई.) संगीत शास्त्रक महान विद्वान छ्लाह । कवि शेखराचार्य ज्योतिरीश्वर ठाकुर जे वर्णरत्नाकर ग्रंथक रचना कयलनि, हुनके दरबारक एक पंडित छलाह । ग्रंथ सात कल्लोल मे लिखल गेल अछि । हिनक अन्य दू ग्रंथ क्रमश: धूर्त समागम एवं पश्चायक अछि जे नाट्‌य प्रहसन अछि । मैथिली साहित्यक प्रथम गद्य ग्रंथ वर्णरत्नाकरक षष्ट कल्लोल मे गायन, वादन एवं नृत्यक पूर्ण विवरण अछि । सर्वप्रथम राग विन्यास एवं विभिन्न लोक गीतक चर्चा सेहो एहि ग्रंथ मे भेल अछि । संगीत जगतक हेतु मिथिलांचलक ई ग्रंथ अनुपम भेंट अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हरिसिंह देवक बाद राजा शिवसिंहक १४०२ ई. मे जन्म भेल । हिनके बालसखा महाकवि विद्यापति ठाकुर छलाह । महाकवि स्वयं राजा एवं राज्यक सर्वश्रेष्ठ एवं शुभचिंतक छलाह । महाकवि विद्यापति एक महान संगीत साधक एवं गायक छलाह । जयदेवक परिपाटीक अनुरूप रचना क’ ओहि पर राग करब हिनक एक महान कार्य कहल गेल अछि । जयदेवक रचना तँ संस्कृत मे अछि, मुदा महाकवि विद्यापति मैथिली गीताक रचना क’ ओहि पर रागोल्लेख क’ एक टा नव परंपराक जन्म देलनि, जे कवि हर्षनाथ झाक समय धरि रहल । महाकवि विद्यापति रचित गीत राजप्रासाद मे सुधीजनक बीच राग-रागिनी मे कत्थक कलाकार एवं मैथिली गायक द्वारा प्रदर्शित कयल जाइत छल । राजा शिवसिंहक शासन काल मे भारतक पश्चिमी क्षेत्र सँ कत्थक नर्तक लोकनि मिथिला आबि अपन कला प्रतिभा सँ राजा कें प्रसन्न क’ राजाश्रित भेलाह । कत्थक परंपरा मे सर्वप्रथम सुमतिक नाम अबैछ । सुमतिक बाद उदय, जयत आदिक नाम अबैछ जे महाकविक रचनाक आधार पर रंगमंच पर नृत्य प्रदर्शित क’ राजा एवं संपूर्ण सभासद कें मंत्रमुग्ध करैत छ्लाह । जयत गौड़ प्रचलित गान कें छंद एवं ताल मे निबद्ध क’ महारज शिवसिंहक समक्ष प्रस्तुत करैत छलाह । कत्थक परंपरा मे क्रमश: कृष्ण मल्लिक, हरिहर मल्लिक, खंग्राम, घनश्याम, कल्लीराम, लक्ष्मीराम, राघवराम तथा टीकारामक नाम अबैछ । गायनक संग-संग नृत्य सेहो होइत छल । कृष्ण एवं राधाक प्रणय लीलाक प्रसंग गीत एवं नृत्य मे रहैत छल । अन्य प्रकारक गायन सेहो होइत छल जे जीवनक विभिन्न अंग सँ जूड़ल छल । एहि मे सोहर, समदाउन, बटगमनी, लगनी, नचारी, महेशवाणी गीत आदि छल । लोक धुनक ई गीत पूर्ण आकर्षक छल । मिथिलाक संगीत परंपराक परिप्रेक्ष्य मे एक उदाहरण अछि जे महाकवि विद्यापति रचित पुस्तक पुरुष परीक्षाक गीतबद्ध कथा मे उल्लिखित अछि । शीर्षक मे मिथिलाक कलाकार ’कलानिधि’ नामक गवैयाक उल्लेख अछि । गायक तिरहुत राज्य सँ गोरखपुर राजधानी मे राजा उदय सिंहक दरबार मे आयोजित संगीत प्रतियोगिता मे भाग ल’ समस्त राज्याश्रित गायक कें परास्त कयलनि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाकवि विद्यापतिक समय धरि राग गायनक परंपरा आरंभ भ’ गेल छल । मध्ययुगक सभ सँ उत्कृष्ट संगीत ग्रंथ पं. लोचन झा रचित राग तरंगिणी अछि । एहि ग्रंथ मे तीन भाषाक समावेश अछि - संस्कृत, ब्रजभाषा एवं मैथिली । कवि लोचन संगीत शास्त्रक एक कुशल ज्ञाता एवं कलाकार छलाह । ई ’हनुमन्मत’ कें आधार मानि रागक विश्लेषण कयने छथि । ओ प्रसंगवश कहैत छथि _&lt;br /&gt;भैरव: कौशिकश्चैव हिन्दोलो दीपकस्था ।&lt;br /&gt;श्री रागो मेघरागश्च षड़ेते हनुमन्मता:॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रन्थ मे पाँच तरंग अछि । प्रथम तरंग मे पुरुष राग कथन आ द्वितीय मे राग-रागिणी कथन अछि । संपूर्ण ग्रंथ मे संगीतक पूर्ण विवरण अछि । तत्कालीन मिथिलाक प्रचलित देशी राग, देशी ताल तथा लय (सुर) पर ओ पूर्ण प्रकाश देलनि अछि । भारतीय संगीत ग्रंथक सूची मे ई ग्रंथ महानतम अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईस्ट इंडिया कंपनीक बाद भारत मे फिरंगी शासन भेल । भारतक कलाकार एक बेर फेर जान-माल एवं जाति-धर्मक सुरक्षा हेतु ओहि स्थान मे जाय लगलाह जे स्थान सुरक्षित छल । बहुत रास कलाकार मिथिला मे अयलाह वा नेपाल मे जा बसलाह । वर्तमान मे मिथिला मे एहन चारि संगीत घराना अछि जे अपन दू सय सँ अढ़ाइ सय वर्षक इतिहास रखने अछि । ओहि मे क्रमश: अमता, मधुबनी, पनिचोभ एवं पंचगछिया घराना अछि ।&lt;br /&gt;सभ घरानाक वर्णन कयल जाय तँ एक पृथक पुस्तक बनि सकैछ ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अमता घराना -&lt;br /&gt; एहि घरानाक स्थापना महाराज माधव सिंह द्वारा १७७५ ई. मे दरभंगा सँ बीस मीलक दूरी पर बहेड़ी थानान्तर्गत अमता गाम मे भेल । संगीत जगत मे एहि गामक वैह स्थान अछि जे मध्यप्रदेश मे ग्वालियरक । एहि घरानाक आदिपुरुष मे राधाकृष्णन एवं कर्तारामक नाम अबैछ । ध्रुपद गायन (गौड़वाणी) शैलीक ई भारतीय स्तरक कलाकार छलाह । हिनक संतान मे क्रमश: स्व. क्षितिजपाल मल्लिक, स्व. राजितराम शर्मा मल्लिक, स्व. पद्‌मश्री रामचतुर मल्लिक, स्व. नरसिंह मल्लिक, स्व. यदुवीर मल्लिक, स्व. महावीर मल्लिक, स्व. पद्‌मश्री सियाराम तिवारी, पं. विदुर मल्लिक, पं. अभयनारायण मल्लिक, रामकुमार मल्लिक, प्रेमकुमार मल्लिक आदिक नाम अबैछ । ई लोकनि चारू पट यथा ध्रुपद, खयाल, टप्पा, ठुमरी तँ गबितहि छलाह, महाकवि विद्यापति रचित गीत एवं लोकगीत सेहो गबैत छलाह ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मधुबनी घराना - &lt;br /&gt;ई घराना मधुबनीक राँटी-मंगरौनीक परिवार द्वारा बसाओल गेल । खयाल एवं ध्रुपद दुनू शैली मे गायन उपस्थापन करब हिनका परिवारक मुख्य गुण छल । स्व. मनसा मिश्र, स्व. डीही मिश्र, स्व. खरवान मिश्र, स्व. गुरे मिश्र, स्व. शिवलाल मिश्र, स्व. सित्तू मिश्र, स्व. हीरा मिश्र, स्व. झिंगुर मिश्र, स्व. भगत मिश्र, स्व. परमेश्वरी मिश्र, स्व. कमलेश्वरी मिश्र, स्व. आद्या मिश्र, स्व. रामजी मिश्र, लक्ष्मण मिश्र, ललन मिश्र आदिक नाम अबैछ ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पनिचोभ घराना - &lt;br /&gt;मिथिलान्तर्गत पनिचोभ घरानाक इतिहास सेहो पुरान अछि । एहि घरानाक प्रसिद्ध कलाकार मे स्व. रामचन्द्र झा, पं. दिनेश्वर झा, राजकुमार झा, मंगनू झा, दुर्गादत्त झा, जटाधर झा, रमाकान्त झा, नचारी चौधरी, ब्रजमोहन चौधरी आदिक नाम उल्लेखनीय अछि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पंचगछिया घराना - &lt;br /&gt;राय बहादुर बाबू लक्ष्मी नारायण सिंह एहि घरानाक संरक्षक एवं पोषक छलाह । एहि घरानाक मुख्य गायन शैली ख्याल एवं ठुमरीक संग पखावज वादन छल । एहि घरानाक दू विख्यात कलाकार भेलाह जाहि मे प्रथम मांगन एवं द्वितीय रघू झा छलाह । मांगन सँ शिक्षा ग्रहण कय हुनक शिष्य क्रमश: निम्नलिखित कलाकार छथि - बटुकजी झा, तिरो झा, शिवन झा, बाल गोविन्द झा, युगेश्वर झा, माधव झा, रामजी झा, धर्मदेव सिंह, राधो झा, पुनो पोद्दार, सुन्दर पोद्दार, गणेशकान्त ठाकुर, उपेन्द्र यादव, दुर्गादत्त झा, सत्य नारायण झा, परशुराम झा, बलराम झा आदि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपर्युक्त घर-घराना शिष्य तैयार क’ मिथिलाक संगीत परंपराक प्रचार-प्रसार संप्रति देश-विदेश मे क’ रहल छथि । थाट गायन परंपराक जनक स्व. विष्णुनारायण भातखंडेजी छथि । अध्ययन, चिंतन क’ ओ समस्त राग कें दश थाटक अंतर्गत राखि एक नवीन परंपरा कें जन्म देलनि अछि । मिथिलान्तर्गत शास्त्रीय संगीतक ज्ञान प्राप्त कयनिहार व्यक्ति कें राग एवं थाट पद्धतिक अनुसारे शिक्षा ग्रहण करय पड़ैत छनि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैदिक युग सँ वर्तमान समय धरि संगीतक परंपरा मे उतार-चढ़ाव होइत रहल, तथापि एहिठामक संगीत अपन प्रवाह कें बनौने रखलक । साम गायन, गाथा गायन, छंद गायन, प्रबंध गायन, राग गायन एवं थाट गायनक क्रमबद्ध परंपरा चलैत रहल, परंतु एहिठामक शास्त्रीय गायन वा लोकगायनक सेहो अपन परंपरा सँ चलैत रहल । मिथिलाक संगीतक क्रमबद्ध विकास पर ध्यान दी तँ औखन राग परंपरा विद्यमान भेटत । मात्र ओकर स्वरूप मे युगानुरूप परिवर्तन परिलक्षित हैत । जहिना व्यक्ति एवं समाजक रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार, रीति-नीति मे क्रमिक विकास भेल, तहिना प्राचीनता एवं नवीनता दुनू धारा एखनो क्रमश: शास्त्रीय धारा एवं लोक धाराक रूप मे सतत प्रवाहित अछि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-9116523724954528798?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/9116523724954528798/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=9116523724954528798&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/9116523724954528798'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/9116523724954528798'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/02/blog-post_1225.html' title='मिथिलाक संगीत परंपरा'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' 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/&gt;&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TU0b9dDwBYI/AAAAAAAAATk/PsPcqBB69N4/s1600/01.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 301px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TU0b9dDwBYI/AAAAAAAAATk/PsPcqBB69N4/s400/01.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5570139056713500034" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;लगैत अछि जे राज दरभंगाक ट्रस्टी जखन धरि मिथिला आ महाराज कामेश्वर सिंहक नामोनिशान नहि मिटा देताह, ताबत धरि चैन स नहि बैसताह। 1962 मे महाराजक विवादास्पद मौत क बाद हुनक संपत्ति कए जेना बेचल गेल ओ सबहक सामने अछि। इ लोकनि महाराजक डीह (रामबाग)तक बेच देलथि। ट्रस्टी क नजरि आब दू सौ साल तक मिथिलाक राजधानी रहल भौरा गढ़ी पर अछि। 16म शताब्दी मे खंडवाला राजवंशक संस्थापक महेश ठाुकरक पुत्र महाराजा शुभंकर ठाकुर भौरा गढ़ी कए अपन नूतन राजधानी बनेने छलाह। एहि ठाम स लगभग दू सौ साल तक मिथिला पर राज कैल गेल। 18म शताब्दी मे जा कर मिथिलाक राजधानी दरभंगा बनाउल गेल। एतिहासिक महत्व आ सौ साल स पूरान महल हेबाक बावजूद भौरा गढ़ीक संरक्षणक कोनो प्रयास सरकारक दिस स एखन धरि नहि भ सकल अछि। दोसर दिस एक-एक करि दरभंगा राजक सब किछु बेच देनिहार ट्रस्टीक नजरि आब भौरा गढ़ी जमीन पर टिकल अछि आ ओ एकरा बेचबा लेल आफन तोडऩे छथि। मिथिला राजक सबस पूरान एहि निशानी कए बचेबा स बचेबा लेल लोक सामने आबि रहल अछि। मिथिलाक इतिहास पर शोध करनिहार तेजकर झा क कहब अछि जे मिथिला मे धार्मिक महत्वक अनेक पूरान पीठ अछि, मुदा राजनीतिक महत्वक पूरान डीह कम अछि। एकर पाछु झा क कहब अछि जे मिथिलाक भौगोलिक कारक जिम्मेदार अछि। बाढ़ आ भूकंपक कारण स पूरान डीह पर बनल महल नहि बचल आ जे बचल से संरक्षणक अभाव मे नष्ट भ गेल। झाक कहब अछि जे भौरा डीह समस्त मैथिलक धरोहर छी आ एकरा बेचब या नष्ट करब मिथिलाक इतिहास कए खत्म करबाक समान अछि। ओ एकर तुलना बख्तियार क नालंदा विश्वविद्यालय कए नष्ट करबा स केलथि। दोसर दिस मधुबनी निवासी संजय कुमार आ श्वेता सिन्हा सन किछु आओर लोक केंद्र आ राज्य सरकार कए भौरा गढ़ी क जमीन बेचबा पर प्रतिबंध लगेबा लेल अनुरोध पत्र लिखलथि अछि। संगहि भारतीय पुरातत्व विभाग कए सेहो पत्र लिख इ मांग कैल गेल अछि जे एहि डीहक संरक्षण लेल कार्रवाई कैल जाए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाराज कामेश्वर सिंहक निधनक बाद दरभंगा राजक संपत्ति कए देख-रेखक जिम्मा एकटा ट्रस्ट कए सौंपल गेल। पटना हाइकोर्ट क सेवानिवृत मुख्य न्यायधीश एहि ट्रस्टक पहिल मुख्य ट्रस्टी छलाह। हुनक संग दू टा आओर ट्रस्टी छलाह। जेना-जेना हिनकर सबहक निधन भेल, दू टा मिल कए तेसर ट्रस्टीक चयन करैत गेलाह। जाहि स परिवारवाद कए बढ़ाबा भेटल। गिरिंद्र मोहन मिश्रक पुत्र मदनमोहन मिश्र ट्रस्टी बनि गेलाह। फेर महाराजक एकटा संबंधी पिछला दरबजा स ट्रस्टी बनि गेलाह। मुदा मदनमोहन मिश्रक निधनक बाद सबस छोट राजकुमार शुभेश्वर सिंहक ज्येष्ठ पुत्र राजेश्वर सिंह कए ट्रस्टी बना देल गेल। इ पहिल ट्रस्टी भेला जे महाराजक संतान छलाह। द्वारिका नाथ झाक निधनक बाद सबटा नियम कए शिथिल करि शुभेश्वर सिंहक दोसर पुत्र कपिलेश्व सिंह कए सेहो ट्रस्टी बना देल गेल। इ पहिल मौका छल जखन दूटा सहोदर भाई तीन सदस्यीय ट्रस्टीक सदस्य अछि। तेसर ट्रस्ट्री छोटी महारानीक क संबंधी उदयनाथ मिश्र छथि, जे महारानीक स्वार्थ देखबाक अलावा कोनो काज करबा मे कोनो रूचि नहि रखैत छथि।कुल मिला कए ट्रस्ट शुभेश्वर सिंहक परिवारक हाथ मे चल गेल अछि आ महारानीक हिस्सेदारी ट्रस्ट मे कम भ गेल अछि। राजपरिवारक एहि खानदानी झगड़ा मे मिथिलाक धरोहर पिछला पचास साल स एक-एक करि बिका रहल अछि। जे बचल अछि ओकरो बेचबाक प्रयास भ रहल अछि। अंतर एतबा अछि पहिने महाराजक परिचित, फेर संबंधी आ आब महाराजक संतान एहि काज मे लागल अछि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-1789832988459244941?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/1789832988459244941/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=1789832988459244941&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1789832988459244941'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1789832988459244941'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/02/blog-post_6284.html' title='मिथिला आ महाराज कामेश्वर सिंहक नामोनिशान नहि मिटा देताह'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TU0b9oZwkNI/AAAAAAAAATs/lANsCeLwxXk/s72-c/KameshwarSingh.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-4456806668854782065</id><published>2011-02-05T03:33:00.002-06:00</published><updated>2011-02-05T03:38:00.307-06:00</updated><title type='text'>मिथिलाक प्रसिद्ध गाम बनगाँव</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TU0achYqtzI/AAAAAAAAATc/ncqBK6kn3SY/s1600/01.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 320px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TU0achYqtzI/AAAAAAAAATc/ncqBK6kn3SY/s400/01.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5570137391427663666" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रसिद्ध गाम (बनगाँव) जिला - सहरसा के चर्चा करे चाहे छी ! जै गाम में बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई (बाबाजी) केँ विभुतिपाद के रश्मि विकसित भेल छलैन ! आयो ओय गाम काँ  बाबाजीक गाम कहल जैत अछि ! बनगाँव में बाबा अपन विराट कुटिया में आयो विराजमान छलाह ! मिथिलाक इ प्रसिद्ध गाम - बनगाँव, सहरसा जिला (मुख्यालय) सँ ८ की.मी पश्चिम में स्थित अछि ! बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई (बाबाजीक) महिमासँ सिचल एय गाम में दिन दूना, रैत चौगुना प्रगति भोs रहल अछि ! इ गाम  एक सँ बढ़ीकेँ एक आईआईटी, आईएएस, आईपीएस, अधिकारी मिथिलाकेँ प्रदान केना छले !  दार्शनिक स्थल में जते एय गाम के "बाबाजी कुटी" प्रसिद्ध अछि, ओते गाम में विराजमान एक सँ बैढ़केँ एक विराट मंदिर सभ गामवासी के श्रद्धा काँ अपन-आप में पिरोना छैन ! बनगाँव गाममें बाबाजी कुटी पर बाबा लक्ष्मीनाथक विराट मंदिर के संग अनेको विशाल मंदिर मौजूद अछि ! जेना की ठकुरवाड़ी, श्री कृष्ण मंदिर, महादेव - पार्वती मंदिर, हनुमान मंदिर .......बाबाजी कुटीसँ कनि पुरव गेला पर  माँ बिष्हरा मंदिर, बिष्हरा मंदिरसँ उत्तर दिसा में गेला पर माँ भगवती आर माँ काली के विराट मंदिर छैन ! ओय सँ आगा पुरव दिसा में (चौक) पर माँ सरस्वती विराजमान छली ! अई प्रकारे यदि देखल जायतँ पुरे बनगाँव गाम एक धर्म-स्थल के समान अछि ! हम सभ मिथिलावासी  बाबा लक्ष्मीनाथ गोसाई (बाबाजीसँ) निक जेका परिचित छी ! औजस्कल (पहलवानी) युग में परिब्राजक बाबा लक्ष्मीनाथ बनगाँव गाममें  पधारने रहथिन ! हुनकर गठित स्वास्थ्य देखकेँ की युवक की बुजुर्ग सभ हर्ष पूर्वक हुनकर बनगाँव गाम में स्वागत केलखिन ! स्वागत एय हेतु नै केना रहथिन की ओ (बाबा) महान साधू या योगी रहथिन स्वागत के पछा सभ ग्रामीण काँ अथाह विश्वास रहैन की यदि हुनका निक जेका खिलेल - पिलेल जेतैन तँ एक दिन ओ निक पहलवान बनता ! बाबा बहुत जल्दी सभ गामवासी के संग हिल - मिल गेलैथ ! बाबा चिक्कादरबर (कब्बडी), खोरी, चिक्का छुर-छुर देहाती खेलक निक खेलाड़ी मानल जैत रहैथ !  ओय समय बनगाँव गाम में दूध - दहीकेँ बाहुल्य छल ! एक धनी-मनी सज्जन हुनका दूध पिबई के लेल एक निक गो (गाय) द् देलखिन ! ओ सज्जन छलाह स्वर्गीय श्री कारी खाँ ! बाबा के लेल सभ गामवासी ठाकुरवाड़ी के प्रांगन में एक पर्ण कुटी बनेलैथ जे आयो आस्था आर धर्म स्थल के तौर पर प्रख्यात अछि ! बाबा ओनातँ परसरमा के रहिवासी रहैथ मुदा बेसी काल ओ बनगाँववे में रहैत रहैथ ! कारण बनगाँव के लोक बहुत सीधा - साधा आर महात्मा सभ में श्रद्धा राखे वला रहथिन ! बनगाँववे में हुनका "विभुतिपाद" के रश्मि विकसित भेलैन ! बनगाँववे में लगभग १८१९ ईo सँ बाबा ब्रजभाषा आर मैथिली में कविता लिखब सुरु केना छलाह जे आयो हमरा सभ के बिच गीतावलीकेँ रूप में मौजूद अछि ! बाबा द्वारा लिखल दोहा, चौपाई आर गीत अपने गीतावली में देख सकैत छलो ! बाबा योगी के अद्दभुत अवतार रहथिन ! आयो बनगाँव गाम में बाबा के कुतियाँ में रोगी आर बन्ध्याओ के ताँता देखल जे सकैत अछि ! लोग हुनकर मंदिर सँ प्राप्त नीर सँ लाभ उठबैत छैथ ! बाबा यथासाध्य सबहक दुःख दूर करै छथिन ! हम सब बनगाँव वासी के ह्रदय में बाबा आयो बसल छैथ ! संगे ओई पवित्र बाबा के भूमि में जन्म लकेँ  हम सब ग्रामवासी अपना आपकेँ गर्वान्वित महसूस करैत छलो ! प्रेम सँ कहू जाय बाबा लक्ष्मीनाथ, जाय बाबाजी..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-4456806668854782065?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/4456806668854782065/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=4456806668854782065&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4456806668854782065'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4456806668854782065'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/02/blog-post_5558.html' title='मिथिलाक प्रसिद्ध गाम बनगाँव'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TU0achYqtzI/AAAAAAAAATc/ncqBK6kn3SY/s72-c/01.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-395998018544326182</id><published>2011-02-05T03:31:00.000-06:00</published><updated>2011-02-05T03:32:52.266-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गोनू झा'/><title type='text'>गोनू झाक सपना</title><content type='html'>गोनू झा काली मायक बड्‌ड पैघ भक्त छलाह । ओना तँ संपूर्ण मिथिलांचल मे शक्तिपूजाक प्रधानता छैक, तथापि गोनू नित्य माताक पूजा करैत छलाह आ माताक प्रसादात्‌ ओ स्वस्थ आ प्रसन्नचित्त रहैत छलाह । हुनक बुद्धिमत्ताक लोहा नहि केवल गामे भरि मे वरन्‌ मिथिला राजदरबार सहित अन्यत्रो मानल जाईत छल । एकबेर स्वयं माता काली हुनक बुद्धिमत्ताक परीक्षा लेबाक निश्चय केलीह ।&lt;br /&gt;माता काली स्वप्न मे गोनूक समक्ष प्रकट भेलीह आ अपन रूप अति भयंकर बना लेलनि । हुनका मात्र दूटा हाथ छलनि आ हजार गोट मूँह । गोनू उठलाह आ माता कें साष्टांग प्रणाम केलनि । किन्तु तत्क्षण किछु सोचि कें हुनका हँसी लागि गेलनि । हुनक शांत मुद्रा आ पुन: हँसीक आवाज सुनि माता काली कें कने अचरज भेलनि । ओ पुछि देलथिन्ह जे की अहाँ कें हमरा सँ डर नहि भेल? संगहि माता इहो प्रश्न केलनि जे अहाँ के हँसी किएक लागल? उत्तर मे गोनू बजलाह जे बाघ करबो भयंकर रहय, ओकरा देखि कें ओकर बच्चा नहि डेराईत अछि । आ हमहूँ तँ अहाँक पुत्र थिकहुँ तें अहाँ सँ डर लागबाक कोनो प्रश्ने नहि अछि । पुन: हँसीक विषय मे उत्तर देबा सँ पूर्व गोनू माता सँ क्षमा याचना कयलनि । माता हुनका क्षमा दान देलनि । तखन गोनू कहलाह जे हमरा एहि बातक आशंका बेर-बेर भऽ रहल अछि जे हमरा एकटा नाक अछि आ दूटा हाथ आ तखन जुकाम भऽ गेला पर नाक पोछैत-पोछैत परेशान भऽ जाइत छी आ अहाँ केँ १००० नासिका मे मात्र दूटा हाथ अछि, तँ जुकाम भऽ गेला पर अहाँ दूटा हाथ सँ १००० नासिका कोना पोछैत होयब ।&lt;br /&gt;गोनूक ई उत्तर सूनि माता कें बड्‌ड हँसी लगलनि आ ओ बजलीह – गोनू अहाँ कें बुद्धिमत्ता आ वाकपटुता मे कियो नहि हरा सकत ई हमर आशीर्वाद अछि । ई कहि माता काली अदृश्य भऽ गेलीह&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-395998018544326182?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/395998018544326182/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=395998018544326182&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/395998018544326182'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/395998018544326182'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/02/blog-post_8882.html' title='गोनू झाक सपना'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-4994335664660531411</id><published>2011-02-05T03:29:00.001-06:00</published><updated>2011-02-05T03:31:32.147-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गोनू झा'/><title type='text'>गोनू झा के स्वर्ग बजाहट</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;गोनू झा एकटा राजाक दरबारी रहथि । ओ बहुत चतुर छलथि आओर राजाक राज-काज मे मदद करैत छलथि आओर हुनकर खूब मनोरंजन करैत छलथि ।&lt;br /&gt;राजा हुनका बहु मानैत छलथिन्ह संगहि आओर लोक सेहो खूब मानैत छलैन्ह । हुनक उन्नति देखि कऽ सभ दरबारी डाह करैत छल आओर हुनका मिटा देबाक उपाय सोचैत छल । ओहि मे एकटा हजमो छल । ओकरा अपना ज्ञानक घमण्ड रहै । ओ गोनू झा के मिटेबाक बीड़ा उठेलक ।&lt;br /&gt;गामक बाहर राजा के पिताक समाधि छल, राजा प्रतिदिन अपना पिताक समाधि पर फूल चढ़ावय जाय छलथि । पिता पर हुनकर अटूट श्रद्धा छल, हजमा जकर फायदा उठाबय चाहैत छल आओर एकटा चाल चलल ।&lt;br /&gt;एक दिन राजा जखन पिताक समाधि पर फूल चढ़ाबेय गेला तखन ओहि पर एकटा पुर्जा राखल भेटलैन्ह । पुर्जा मे लिखल रहैय-ब‍उआ अहाँ हमर बहुत भक्‍त छी हम अहाँ सँ अत्यन्त प्रसन्‍न छी । स्वर्ग मे हमरा पूजा-पाठ करबा मे बहुत दिक्‍कत होयत अछि ताहि लेल अहाँ शीघ्र गोनू झा के हमरा लग पठा दियऽ । गाम के पूरब मे जे श्मशानक मे ईंटक ढेरि अछि ओहि पर हुनका बैसा हुनका उपर दस पाँज पुआर राखि ओहि मे आगि लगा देबई तऽ ओ सीधे हमरा लग पहुँचि जैता । हम किछु दिनक बाद हुनका वापस भेज देब ।&lt;br /&gt;शुभाशीर्वाद&lt;br /&gt;अहाँक स्वर्गीय पिता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुर्जा पढ़िकय राजा चकरेला, एहन आश्‍चर्यक बात तऽ ओ कतहु देखने नहि छलथि । ओ मोने-मोने बहुत तर्क वितर्क करय लगला । गोनू झाक शत्रु के ई चाल अछि या पिता जीक आज्ञा निश्‍चय नई कय सकला । ओहि दिन दरबार मे आबि राजा पुर्जा के हाल सबके सुनेलनि, सभ दरबारी खुश भऽ गेल । कियो कहय लागल-गोनू झा बहुत भाग्यवान छथि ताहि लेल स्वर्ग मे महाराजा याद कैलथिन्ह । क्यो बाजय – गोनू झा कतेक बड़का पुण्यात्मा छथि जे जीवैत स्वर्ग जैता । कियो डाह करैत बाजल- हमरा सभक सौभाग्य कहाँ ! नहिं तऽ सहर्ष जैबाक लेल तैयार भऽ जैतहुँ ।&lt;br /&gt;एहि पर हजमा बाजल महाराज जिनक आदेश एलन्हि हुनके जैबाक चाही नई तऽ महाराज के मोन मे दुःख हेतैन्ह । साधारण लोक सँ काज नई हेत‍इ तें तऽ गोनू झा के बुलाहट भेलैन्ह । इमहर राजा बड़ सोच मे पड़ि गेला, कतऊ दुष्ट सभ मिलकय गोनू झा के मारबाक षड्‍यन्त्र तऽ नहि रचलक अछि या ठीके पिताजी ई पुर्जा भेजने छथि । ओना अक्षर पिताजीक लिखावट सँ मिलैत अछि । अन्त मे किंकर्तव्यबिमूढ़ भऽ ओ गोनू झा सँ विचार- विमर्श कयला ।&lt;br /&gt;गोनू झा एखन तक सब चुपचाप सुनि रहल छलथि । दरबारिक षडयन्त्रक अनुभव हुनका भऽ गेल छलैन्ह आ ओ एहि सँ बचबाक लेल सोचि रहल छला । हुनक कुशाग्र बुद्धि किछुये काल मे समाधान ढूंढि निकाललक । ओ कहलथिन्ह – महाराज हम स्वर्ग जैबाक लेल तैयार छी परन्च तीन शर्त अछि ।&lt;br /&gt;१. हमरा तीन मास के समय देल जाय ।&lt;br /&gt;२. जखन तक हम स्वर्ग सँ नहि घूमि कय आबी हमरा परिवार के सभ मास दस हजार टाका पारिश्रमिक के रूप मे देल जाय ।&lt;br /&gt;३. एहि समय हमरा पचास हजार टाका देल जाय, जाहि सँ घरक सभ इन्तजाम कय कऽ जाय ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजा चकित भय कहलखिन-की अहाँ स्वर्ग जायब? की अहाँ एहि बात के सत्य मानैत छी ?&lt;br /&gt;मोनू झा कहलखिन – महाराज हम सचमुच स्वर्ग जायब । अहाँ चिन्ता जुनि करी । उदास भाव सँ राजा गोनू झाक शर्त मानि लेलथिन । सभ दरबारी के आनन्द आओर आश्चर्य के भाव रहै । हजमा अपना जीत पर हँसि रहल छल । तीन मासक बाद राज्यक सभ लोक गांव के पुवारी कातक श्मशान पर पहुँचल जे आई गोनू झा स्वर्ग जैता । सब प्रजा दुःखी छल, राजा सेहो ओतय पहुँच कानि रहल छला । परन्च गोनू झा के मुख कनिको मलीन न‍ई भेल छल ओ हँसिते माँटिक ढेरि पर बैस गेला आओर पुआर सँ हुनका झाँपि देल गेल एवं आगि लगा देल गेल । ई देखि राजा आओर सभ दरबारी कानि रहल छलथि ओतहि हजमा प्रसन्‍न भऽ रहल छल । एहि घटनाक छः मास बीति गेल छल, गोनू झा एखन तक लौट कय घर नहि आयल छलथि । ई सोचि राजा बहुत दुःखी रहैत छलाह आओर गोनू झा बिना दरबारो मे मन न‍ई लगैत छलैन्ह ।&lt;br /&gt;एक दिन राजा दरबार मे गोनू झाक चर्च करैत रहथि तऽ ओतबहि मे एक दरबारी सूचना देलक जे गोनू झा आबि रहल छथि । लोक आश्‍चर्य सँ चकित रहथि जे एहि खबर के झूठ मानी वा सत्य । ओतबहि मे गोनू झा अबेत देखाय लगलाह । गोनू झा पहिने सँ बेसी मोटा गेल छलथि । किछु लोक हुनका भूत बूझि भागि रहल छल, लेकिन राजा स्तम्भित छलथि ।&lt;br /&gt;गोनू झा आबि राजा के प्रणाम केलखिन आओर एकटा पुर्जा राजा के दय देलखिन । किछु कालक बाद राजा कहलखिन- गोनू झा ! की अहाँ सचमुच जीवित छी?&lt;br /&gt;गोनू झा हँसिकय कहलखिन- महाराज एखन तक तऽ जीवित छी । ई देखि हजमाक प्राण सुखि गेल आओर ओ डरे पसीना सँ तर-बतर भऽ रहल छल ।&lt;br /&gt;गोनू झा कहलखिन- महाराज ! हम स्वर्ग सँ आबि रहल छी । अहाँक पिता ओतय बहुत खुश छथि । परंतु हुनका हजामत कराबय मे तकलीफ छैन्ह, केश-दाढ़ी सभ बढ़ि गेल छैन्ह, ताहि लेल ओ हजाम के भेजय वास्ते ई पुर्जा भेजने छथि । एहि पुर्जा मे एयह बात लीखि पठेने छथि ।&lt;br /&gt;गोनू झाक बात सुनतहि हजमा भागय लागल । लेकिन सिपाही ओकरा धऽ पकड़लक । आब तऽ हजमाक दशा बिगड़ि गेल, सब दरबारी आश्‍चर्य सँ अवाक्‌ छल । राजा कहलखिन- ओहि बेर जखन गोनू झा जाय छलथि तऽ तू बढ़ि- चढ़ि कय बाजेत छलें तऽ एखन डर किये होयत छ‍उ ?&lt;br /&gt;हजमा देखलक जे आब पोल खोलय पड़त, नहि तऽ मारल जायब । तें ओ थरथराईत बाजल-सरकार हमरा क्षमा करू । गोनू झा के स्वर्ग बजाबऽ वला पत्र हम लिखने छलहु ! स्वर्ग सँ कोनो पत्र नहि आयल छल ।&lt;br /&gt;गोनू झा कोनो जादू – टोना जनेत छथि तें आगि सँ बचि गेला, परंच हम तऽ जरि कय मरि जायब । आब तँ राजा आश्‍चर्य एवं क्रोध सँ लाल भय गेला आओर गोनू झा के पुछलखिन की बात अछि सच-सच कहू ।&lt;br /&gt;गोनू झा कहलखिन- महाराज ओहि पत्र के देखिते हम बूझि गेल छलहुँ जे हमरा संगे कियो चक्रचालि खेल रहल अछि । तें अपना बचय के उपाय सोचि स्वर्ग गेनाई स्वीकार केने छलहुँ ।&lt;br /&gt;तीन मासक समय लय कऽ हम ओहि माँटिक ढेरी सँ अपना घर तक सुरंग बना लेने छलहुँ आओर जखन हमरा पुआर सँ झाँपि देलक तऽ हम सुरंगक रस्ते अपना घर पहूँच गेलहुँ ।&lt;br /&gt;ओमहर सब बुझलक जे आब गोनू झा जरि कय मरि गेला आओर हमर दुश्मन सभ खुशी मनाबय लागल छल । एमहर हमरा गुप्त रूप सँ पता लागल जे ई सब पूरा हजमाक षडयंत्र छल ।&lt;br /&gt;ओना इ सब बिना प्रमाण के कहित‍उँ तऽ अहां लोकनि के फूसि लागैत तें प्रमाणक संग अहाँ सब के बतेलहुँ । राजा आओर सब दरबारी गोनू झा के बुद्धि पर दंग छलाह । ओतहि हजमा के कठोर दण्ड भेटल । संगहि गोनू झा के काफी इनाम भेटलैन्ह ....&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-4994335664660531411?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/4994335664660531411/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=4994335664660531411&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4994335664660531411'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4994335664660531411'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/02/blog-post_1116.html' title='गोनू झा के स्वर्ग बजाहट'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-1318149979891011833</id><published>2011-02-05T02:53:00.001-06:00</published><updated>2011-02-05T02:57:14.259-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नीतीश कुमार'/><title type='text'>नई दिल्ली में मीडिया स घिरल  बिहार कें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TU0Qr1Dn2fI/AAAAAAAAATU/CkCJA7IZZp4/s1600/DSC_7158.JPG"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 266px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TU0Qr1Dn2fI/AAAAAAAAATU/CkCJA7IZZp4/s400/DSC_7158.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5570126659289864690" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-1318149979891011833?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/1318149979891011833/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=1318149979891011833&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' 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/&gt;एकटा जलजला आयल आ छिडिय़ा गेल सपनाक माला&lt;br /&gt;छिडिय़ा गेल ओ मोती, जकरा हम बड जतन सँ चुनने रही...&lt;br /&gt;आइ फेर ओकरा पिरो रहल छी एहि आस मे&lt;br /&gt;काश ! &lt;br /&gt;घुरि आओत ओ पल...&lt;br /&gt;कि भरोस, काँचक घट अछि, कोनो दिन दरकि जायत&lt;br /&gt;एकटा अदना सन कहानी अछि, बीच्चहि छूटि जायत&lt;br /&gt;एकटा समझौता भेल छल रोशनी सँ टूटि जायत...&lt;br /&gt;तइयो मन मे अछि इएह प्रार्थना &lt;br /&gt;जे सोचने छी अहाँ, सबटा पाबि लेब। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जनैत छी अहाँके हमरा सँ घृणा अछि बड&lt;br /&gt;शाइत, कारण हमही होइहि&lt;br /&gt;मुदा जे छल, जेहन छल, राखि देलहुँ अहींक सोझाँ&lt;br /&gt;अपना दिलक हाल, बिना कोनो दुराव-छिपाव केँ &lt;br /&gt;तइयो कहब इएह घुरा दिअए वो पलछिन&lt;br /&gt;रूसब-मनायब त दुनियाक रीत अछि&lt;br /&gt;मनुहार पैघ नहि, पैघ अहाँक प्रीत अछि।&lt;br /&gt;फेरो अहाँ घुरि आयब, यह हृदय सँ हकार अछि&lt;br /&gt;केवल अनुग्रहक गप्प नहिं,&lt;br /&gt;मनक पुकार अछि&lt;br /&gt;जे सोचने छी अहाँ, सबटा पाबि लेब। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आइयो आँगुर मे होइछ जुम्बिश, मुदा सहमि जाइत छी&lt;br /&gt;शाइत, अहाँक घृणाक होइत आभास अछि&lt;br /&gt;डरैत छी, कहीं इहो अधिकार नहि हमरा सँ छीन ली...&lt;br /&gt;मुदा, अजुका दिन स्वीकारैत अछि सभ&lt;br /&gt;दुश्मन सँ सेहो शुभकामना&lt;br /&gt;दुश्मन बुझि स्वीकार करी हमरो शुभकामना&lt;br /&gt;अजुका दिन&lt;br /&gt;जे सोचने छी अहाँ, सबटा पाबि लेब। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहाँ मानी या नहि मानी&lt;br /&gt;इ दिन हमरा लेल सदिखन यादगार रहत&lt;br /&gt;जे हमरा हँसनाय सिखोलक&lt;br /&gt;ओहि पल संभारल, जहन लगैत छल जिनगी ठमकल&lt;br /&gt;आबि कय हमरा जिनगी सँवारल&lt;br /&gt;जाहि दिन एहि भूमि पर भेल हुनक पादुर्भाव&lt;br /&gt;ओ दिन हमरा वजूद सँ जुडि़ गेल&lt;br /&gt;ताहिं त मन मे इएह अछि प्रार्थना &lt;br /&gt;जे सोचने छी अहाँ, सबटा पाबि लेब। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुभकामना त बहुतो भेटल हएत ओहि दन&lt;br /&gt;अहाँ सफलता के उच्चतम शिखर धरि पहुँचि&lt;br /&gt;सफलता कें परचम लहराबी...&lt;br /&gt;मुदा, हम प्रार्थना करब एतबै&lt;br /&gt;जे सोचने छी अहाँ, सबटा पाबि लेब। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नञि जानि आई कियैक हृदय फेर सँ कहैत अछि&lt;br /&gt;एखनहुँ हाथ मे किछु समय बाँचल अछि&lt;br /&gt;बस, एक पल जीबय चाहैत छी&lt;br /&gt;समयक एहि शामियाना मे फेर एकटा &lt;br /&gt;नव सपना सँजोय ली हम&lt;br /&gt;घुरा दिअए ओ पल...घुरा दिअए ओ पल....&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;- दीप्ति अंगरीश&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-3413629625499208047?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/3413629625499208047/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=3413629625499208047&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/3413629625499208047'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/3413629625499208047'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_24.html' title='बस, अहींक लेल'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-3104874079432675222</id><published>2011-01-17T01:43:00.001-06:00</published><updated>2011-01-17T01:46:02.395-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विपिन बादल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गजल'/><title type='text'>अहाँ के शहरि मे</title><content type='html'>रहै छी सहमि-सहमि, अहाँ कें शहरि मे।&lt;br /&gt;चलै छी सम्हरि-सम्हरि, अहाँ कें शहरि मे।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लूटपाट आ छीना-झपटी, सौंदर्य अहि नगर कें।&lt;br /&gt;रोज शीलभंग होइए कतेको, अहाँ कें शहरि मे।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चोर मस्त कोतवाल पस्त, शासन पूरा भ्रष्टï यौ।&lt;br /&gt;जंगल के कानून चलैए, अहाँ कें शहरि मे।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जे प्रवासी रूप निखारल, ओकरे पर ईल्जाम यौ।&lt;br /&gt;ईनाम मे हाथ कटैए, अहाँ कें शहरि मे।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किसान के खेत बिकाओल, कंक्रीटक अछि जाल बिछाओल।&lt;br /&gt;यमुना के धार हराओल, अहाँ कें शहरि मे।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सड़क बनल समर भूमि, शोणित सँ हलकान यौ&lt;br /&gt;ब्लूलाइन सँ सब डेरायल , अहाँ कें शहरि मे।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-3104874079432675222?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/3104874079432675222/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=3104874079432675222&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/3104874079432675222'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/3104874079432675222'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_17.html' title='अहाँ के शहरि मे'/><author><name>बिपिन बादल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16014292250857946792</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_JuKwUmjXx6s/SXlaA2WUQvI/AAAAAAAAABM/QK4ZRAXuODU/S220/badal+ji.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-5322331336624412978</id><published>2011-01-08T04:26:00.002-06:00</published><updated>2011-01-08T04:29:38.085-06:00</updated><title type='text'>मिथिलाक धार्मिक यात्रा : अष्टयोगिनी मंदिर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg8iZ6QQJI/AAAAAAAAAS4/ew-S9mB9_uY/s1600/matsyagandha2.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 268px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg8iZ6QQJI/AAAAAAAAAS4/ew-S9mB9_uY/s400/matsyagandha2.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5559760301757317266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; इ हाल मे बनल सहरसाक बेहतरीन मंदिर मे सँ एक अछि । एकरा मत्स्यगंधा मंदिरक नाम सँ सेहो जानल जाइत अछि । इ सहरसा जिला मुख्यालयक नजदीक अछि । बिहार सरकार एकर निर्माण सहरसा मे पर्यटनक बढावा देबाक लेल कयलक अछि । इ मंदिर धार्मिक आ पर्यटन दुनू नजरि सँ नीक अछि । इ मंदिर माँ कालीक अछि । एकरा संगहि एहि मे चौसठ आन देवीक प्रतिमा सेहो लगाओल गेल अछि, जाहि कारण सँ एकरा चौसठ योगिनी मंदिरक नाम सँ सेहो जानल जाइत अछि । आइ ई बिहार सरकार द्वरा बनाओल गेल नीक पर्यटन भवनक रूप मे जानल जाइत अछि । बिहार सरकार के चाही जे एहन आर मंदिर बनाबय ताकि बिहार मे पर्यटन के बढावा भेटैक ।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-5322331336624412978?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/5322331336624412978/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=5322331336624412978&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/5322331336624412978'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/5322331336624412978'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_3230.html' title='मिथिलाक धार्मिक यात्रा : अष्टयोगिनी मंदिर'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg8iZ6QQJI/AAAAAAAAAS4/ew-S9mB9_uY/s72-c/matsyagandha2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-6002859030584476814</id><published>2011-01-08T04:24:00.001-06:00</published><updated>2011-01-08T04:26:16.652-06:00</updated><title type='text'>मिथिलाक धार्मिक यात्रा : उग्रतारा मंदिर, महिषी</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg7wV1LnXI/AAAAAAAAASw/7sZEfcDqABQ/s1600/ugratara.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 219px; height: 400px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg7wV1LnXI/AAAAAAAAASw/7sZEfcDqABQ/s400/ugratara.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5559759441668840818" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; ई मंदिर सहरसा जिला मुख्यालय सँ चौदह कि०मी० पश्चिम अछि । ई मंदिर अत्यंत पुरान अछि । अनेक शास्त्र मे सेहो एकर वर्णन भेटैत अछि । एतय देवीक भक्त समय-समय पर अबैत रहैत छथि । माँ ताराक मंदिर सँ सटले माँ सरस्वतीक मंदिर सेहो अछि , जाहि मे माताजीक भव्य मूर्ति लगाओल गेल अछि । एतय पहुँचबाक लेल सहरसा जिला मुख्यालय सँ बस सेवा उपलब्ध अछि । एहि स्थानक रख-रखाव सेहो नीक अछि । व्स्तुत: ई मंदिर मिथिलाक भव्य आ पवित्र स्थान मे सँ एक अछि ।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-6002859030584476814?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/6002859030584476814/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=6002859030584476814&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6002859030584476814'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6002859030584476814'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_8549.html' title='मिथिलाक धार्मिक यात्रा : उग्रतारा मंदिर, महिषी'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg7wV1LnXI/AAAAAAAAASw/7sZEfcDqABQ/s72-c/ugratara.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-5761080260987899521</id><published>2011-01-08T04:21:00.002-06:00</published><updated>2011-01-08T04:23:41.016-06:00</updated><title type='text'>मिथिलाक धार्मिक यात्रा : अहिल्या स्थान</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg7JYGxPyI/AAAAAAAAASo/knM2N7R17Do/s1600/ahilway.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg7JYGxPyI/AAAAAAAAASo/knM2N7R17Do/s400/ahilway.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5559758772264582946" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; अहिल्या स्थान दरभंगा जिलाक कमतौल थानाक अहियारी गाम मे स्थित अछि । एहि स्थान धरि पहुँचबाक लेल सब सँ नीक साधन रेल अछि । एतय जेबाक लेल दरभंगा सँ रेल सेवा उपलब्ध अछि । पुराणक अनुसार गौतम मुनिक निवास स्थान एतहि छल । एकटा पौराणिक कथाक अनुसार गौतम मुनिक पत्नी अहिल्या छलीह । एकबेर देवराज इंद्र गौतम मुनिक आश्रम मे अयलाह । ओ ओतय अहिल्या के देखलथि आ हुनकर दिव्य रूप पर मोहित भऽ गेलाह आ हुनका संग अभिगमन करबाक मोन बनेलनि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किछु दिनक बाद आधा राति मे इंद्र मुर्गाक आवाज दऽ कऽ गौतम के जगा देलनि । गौतम स्नान करबाक लेल चलि गेलथि । ओकर बाद इंद्र गौतम मुनिक रूप धऽ कऽ अहिल्याक घर मे प्रवेश कयलथि । ओमहर गौतम मुनि कें मध्य रातिक आभास भेलनि आ ओ वापस भऽ गेलाह ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घर आबि ओ इंद्र के अपन पत्नीक संग देखलथि तँ तमसा के शाप दऽ देलनि आ अहिल्या पाथरक भऽ गेलीह । अहिल्या द्वारा माफी मंगला पर गौतम मुनि कहलथि जे जहन भगवान विष्णु त्रेता युग मे धरती पर श्रीरामक रूप में अवतार लेताह तँ मिथिला जेबाक समय अपन चरण कमल सँ अहाँक उद्धार करताह । त्रेता युग मे जहन श्रीराम मिथिला अयलाह तँ ओ अहिल्या कें उद्धार केलनि । वाल्मिकी रामायण मे सेहो गौतम मुनिक निवास स्थान मिथिला कें मानल गेल अछि ।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-5761080260987899521?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/5761080260987899521/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=5761080260987899521&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/5761080260987899521'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/5761080260987899521'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_6382.html' title='मिथिलाक धार्मिक यात्रा : अहिल्या स्थान'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg7JYGxPyI/AAAAAAAAASo/knM2N7R17Do/s72-c/ahilway.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-4759871174611920396</id><published>2011-01-08T04:19:00.001-06:00</published><updated>2011-01-08T04:20:49.583-06:00</updated><title type='text'>मिथिलाक धार्मिक यात्रा : कपिलेश्वर स्थान</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg6dtC8RjI/AAAAAAAAASg/E0TaQADKfjE/s1600/kapileshwar.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 395px; height: 290px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg6dtC8RjI/AAAAAAAAASg/E0TaQADKfjE/s400/kapileshwar.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5559758021971428914" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; ई स्थान मधुबनी जिला मे अछि आ दरभंगा सँ २४ कि०मी० उत्तर आ मधुबनी सँ १२ कि०मी० पश्चिम अछि । ई मंदिर दरभंगा-जयनगर राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ैत अछि । मानल जाइत अछि जे कपिल मुनि द्वारा शिवलिंग स्थापनाक कारण एकर नाम कपिलेश्वर पड़ल । एतय हरदम भक्त लोकनि महादेवक दर्शनक लेल अबैत रहैत छथि । साओन आ शिवराति मे तँ एतय लाखों भक्त जल चढेबाक लेल अबैत छथि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किछु लोकक कहब छनि जे कपिल मुनिक निवास स्थान मधुबनी जिलाक बेनीपट्टी प्रमंडलक विशनपुर गाम मे छल । किंतु विष्णु पुराणक अनुसार हुनक निवास स्थान पाताल लोक मे छल, जतए इंद्र राजा सगरक अश्वमेघ घोड़ा कें चोरा कें बान्हि देने छलाह आ कपिल मुनिक शाप सँ सगरक पुत्र आ साठि हजार सैनिक कें नष्ट कऽ देलनि । एहि घटना सँ मुनि कपिल आ सगरक समकालीनता प्रमाणित होइत अछि । इतिहासकारक कहब छनि जे राजा सगर मनुक चालिसम पीढ़ी मे छलाह ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विभिन्न पुराणक अनुसार भागिरथी गंगा सागर नामक तीर्थ कोलकाता मे स्थित अछि, जतयक कथाक अनुसार राजा सगरक सैनिक जहन कपिल मुनिक कुटिया मे अश्व्मेघक घोड़ा कें बान्हल देखलथि तँ चोर बूझि हुनक अपमान केलक । एहि पर कपिल मुनि तमसा कें सगरक सैनिक कें नाश कऽ देलनि । एकर बाद कपिल मुनि कपिलेश्वर पहुँचलाह आ शिवलिंगक स्थापना कऽ तपस्या करय लगलाह ।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-4759871174611920396?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/4759871174611920396/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=4759871174611920396&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4759871174611920396'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4759871174611920396'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_4004.html' title='मिथिलाक धार्मिक यात्रा : कपिलेश्वर स्थान'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg6dtC8RjI/AAAAAAAAASg/E0TaQADKfjE/s72-c/kapileshwar.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-2933013335710765411</id><published>2011-01-08T04:10:00.001-06:00</published><updated>2011-01-08T04:18:52.357-06:00</updated><title type='text'>मिथिलाक धार्मिक यात्रा : जनकपुर</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg5_j6j_EI/AAAAAAAAASY/gILWqHiAJYA/s1600/janakpur.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 300px; height: 212px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg5_j6j_EI/AAAAAAAAASY/gILWqHiAJYA/s400/janakpur.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5559757504124288066" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; इ भारत देशक बिहार सीमा सँ सटल अछि आ नेपाल मे स्थित अछि । आमजनक अनुसार विदेह जनकक राजधानी एतहि छल । जनक परंपराक अनेको जनक मे एक्कैसम जनक सीरध्वज जनक सब सँ बेसी प्रसिद्ध भेलाह । ओ अयोध्या राजा दशरथक समकालीन छलाह । रामक पत्नी सीता सीरध्वज जनकक पुत्री छ्लीह । रामायण, महाभारत आदि प्राचीन ग्रंथ मे राजा जनकक राजधानी जनकपुर बताओल गेल अछि । राजा जनकक प्राचीन महल जनकपुर सँ सात कोस दूर छल । जनकपुरक प्रसिद्धिक कारण माता सीताक अयोध्याक राजा दशरथ सँ वियाह अछि । हिन्दू धर्म मे जनकपुरक बहुत महत्व अछि । रामनवमी आ विवाहपंचमीक समय मे आइयो लाखों लोक एतय अबैत अछि । आइयो एतय माता सीताक पावन मंदिर अछि आ रामजी द्वारा तोड़ल गेल धनुष सेहो अछि । एतय पहुँचबाक लेल भारतक दरभंगा सँ बस आ रेल अछि । नई दिल्ली सँ विमान सुविधा सेहो अछि ।&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-2933013335710765411?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/2933013335710765411/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=2933013335710765411&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2933013335710765411'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2933013335710765411'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_4244.html' title='मिथिलाक धार्मिक यात्रा : जनकपुर'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg5_j6j_EI/AAAAAAAAASY/gILWqHiAJYA/s72-c/janakpur.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-7002077809334620890</id><published>2011-01-08T04:05:00.002-06:00</published><updated>2011-01-08T04:10:20.937-06:00</updated><title type='text'>मिथिलाक धार्मिक यात्रा : उच्चैठ</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg3_Q6HKWI/AAAAAAAAASQ/dOczn5_80sY/s1600/uchhaith.jpg"&gt;&lt;img style="display:block; margin:0px auto 10px; text-align:center;cursor:pointer; cursor:hand;width: 400px; height: 300px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg3_Q6HKWI/AAAAAAAAASQ/dOczn5_80sY/s400/uchhaith.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5559755299998869858" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-weight:bold;"&gt; उच्चैठ मधुबनी जिलाक बेनीपट्टी थाना मे अछि । एतय देवी दुर्गाक एकटा पुरान आ पैघ मंदिर अछि । ई स्थान कमतौल रेलवे स्टेशन सँ २४ कि०मी० दक्षिण अछि आ दरभंगा सँ बस सँ सीधा जूडल अछि । एहि दुर्गा मंदिरक अपन खास ऐतिहासिक महत्व अछि । एकटा पौराणिक कथाक हिसाब सँ एतय कालीदास रहैत छलाह । कालीदास पहिने महामूर्ख छलाह ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओहि समय सदानंद नामक एकटा प्रसिद्ध राजा छलाह । हुनक बेटी विद्योतमा सुंदर आ गुणवती छ्लीह । विद्योतमा वियाहक लेल आयल अनेको राजा सँ वियाह करबा सँ मना दऽ देलनि आ प्रण केलनि जे ओ हुनके सँ वियाह करतीह जे हुनका सँ बेसी गुणवान हुअए । एहि सँ अपमानित भेल राजाक पंडित लोदनि बदला लेबाक लेल सोचलथि आ एकटा महामूर्खक खोज मे लागि गेलाह । एक दिन हुनका लोकनिक नजरि कालीदास पर पड़ल, जे एकटा गाछक डारि पर बैसल छलाह आ ओकरहि काटि रहल छलाह । विद्वान लभ सोचलाह जे एहि सँ पैघ मूर्ख कतय भेटत । ओ कालीदास कें राजा सदानंदक दरबार मे लऽ गेलाह आ विद्योत्मा सँ हुनक वियाहक प्रस्ताव केलनि । पंडित लोकनि इहो कहलाह जे एखन ई मौन व्रत धाराण केने छथि आ तें इशारा मे गप्प करैत छथि ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विद्योत्मा दरवार मे उपस्थित भेलीह आ मौन रूप सँ प्रश्न पूछैत एकटा आँगुर उठेलीह, जेकर अर्थ भेल - ईश्वर एक छथि । कालीदास सोचलाह जे ई हमर एकटा आँखि फोड़य चाहैत अछि तँ हम हिनक दुनू फोड़ि देब आ तें ओ अपन दूटा आँगुर उठा देलनि । विद्योत्मा बुझलीह जे ई ईश्वरक दू रूप बतबैत छथि आ तें दूटा आँगुर उठेलनि अछि । पुन: दोसर प्रश्न मे विद्योत्मा अपन पाँचो आँगुर उठेलनि जेकर अर्थ भेल _ मूल तत्व ५ अछि । कालीदास सोचलाह जे ई हमरा थापड़ मारत तँ हम एकरा मुक्का मारब आ ओ पाँचों आँगुर बान्हि मुक्का देखेलनि । विद्योत्मा सोचलीह जे हिनक आशय ५ तत्व सँ मीलि कें बनल शरीर सँ अछि आ विद्योत्मा हारि मानि लेलनि । एवं प्रकारे कालीदास आ विद्योत्माक वियाह भेल । परंतु बाद मे वास्तविक स्थितिक ज्ञान भेला पर विद्योत्मा कालीदास कें अपमानित कऽ घर सँ निकालि देलनि ।&lt;br /&gt;तत्पश्चात कालीदास विद्याध्ययनक लेल उच्चैठ पहुँचलाह आ एहिठाम रहि सभ शास्त्रक ज्ञाता भऽ गेलाह । आइयो लोक एहिठामक माँटि अपन घर लऽ जाईत अछि आ विश्वास करैत अछि जे दुर्गाक कृपा सँ हुनको घर मे कालीदास सदृश विद्वान हेताह &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-7002077809334620890?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/7002077809334620890/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=7002077809334620890&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/7002077809334620890'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/7002077809334620890'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_6682.html' title='मिथिलाक धार्मिक यात्रा : उच्चैठ'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TSg3_Q6HKWI/AAAAAAAAASQ/dOczn5_80sY/s72-c/uchhaith.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-2522437876419059907</id><published>2011-01-08T04:03:00.000-06:00</published><updated>2011-01-08T04:05:15.589-06:00</updated><title type='text'>मिथिलाक मीलक पाथर</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;१.गौरी-शंकर स्थान- मधुबनी जिलाक जमथरि गाम आऽ हैंठी बाली गामक बीच ई स्थान गौरी आऽ शङ्करक सम्मिलित मूर्त्ति आऽ एहि पर मिथिलाक्षरमे लिखल पालवंशीय अभिलेखक कारणसँ विशेष रूपसँ उल्लेखनीय अछि। ई स्थल एकमात्र पुरातन स्थल अछि जे पूर्ण रूपसँ गामक उत्साही कार्यकर्त्ता लोकनिक सहयोगसँ पूर्ण रूपसँ विकसित अछि। शिवरात्रिमे एहि स्थलक चुहचुही देखबा योग्य रहैत अछि। बिदेश्वरस्थानसँ २-३ किलोमीटर उत्तर दिशामे ई स्थान अछि।&lt;br /&gt;२.भीठ-भगवानपुर अभिलेख- राजा नान्यदेवक पुत्र मल्लदेवसँ संबंधित अभिलेख एतए अछि। मधुबनी जिलाक मधेपुर थानामे ई स्थल अछि।&lt;br /&gt;३.हुलासपट्टी- मधुबनी जिलाक फुलपरास थानाक जागेश्वर स्थान लग हुलासपट्टी गाम अछि। कारी पाथरक विष्णु भगवानक मूर्त्ति एतए अछि।&lt;br /&gt;४.पिपराही-लौकहा थानाक पिपराही गाममे विष्णुक मूर्त्तिक चारू हाथ भग्न भए गेल अछि।&lt;br /&gt;५.मधुबन- पिपराहीसँ १० किलोमीटर उत्तर नेपालक मधुबन गाममे चतुर्भुज विष्णुक मूर्त्ति अछि।&lt;br /&gt;६.अंधरा-ठाढ़ीक स्थानीय वाचस्पति संग्रहालय- गौड़ गामक यक्षिणीक भव्य मूर्त्ति एतए राखल अछि।&lt;br /&gt;७.कमलादित्य स्थान- अंधरा ठाढ़ी गामक लगमे कमलादित्य स्थनक विष्णु मंदिर कर्णाट राजा नान्यदेवक मंत्री श्रीधर दास द्वारा स्थापित भेल।&lt;br /&gt;८.झंझारपुर अनुमण्डलक रखबारी गाममे वृक्ष नीचाँ राखल विष्णु मूर्त्ति, गांधारशैली मे बनाओल गेल अछि।&lt;br /&gt;९.पजेबागढ़ वनही टोल- एतए एकटा बुद्ध मूर्त्ति भेटल छल, मुदा ओकर आब कोनो पता नहि अछि। ई स्थल सेहो रखबारी गाम लग अछि।&lt;br /&gt;१०.मुसहरनियां डीह- अंधरा ठाढ़ीसँ ३ किलोमीटर पश्चिम पस्टन गाम लग एकटा ऊंच डीह अछि।बुद्धकालीन एकजनियाँ कोठली, बौद्धकालीन मूर्त्ति, पाइ, बर्त्तनक टुकड़ी आऽ पजेबाक अवशेष एतए अछि।&lt;br /&gt;११.भगीरथपुर- पण्डौल लग भगीरथपुर गाममे अभिलेख अछि जाहिसँ ओइनवार वंशक अंतिम दुनू शासक रामभद्रदेव आऽ लक्ष्मीनाथक प्रशासनक विषयमे सूचना भेटैत अछि।&lt;br /&gt;१२.अकौर- मधुबनीसँ २० किलोमीटर पश्चिम आऽ उत्तरमे अकौर गाममे एकटा ऊँच डीह अछि, जतए बौद्धकालक मूर्त्ति अछि।&lt;br /&gt;१३.बलिराजपुर किला- मधुबनी जिलाक बाबूबरही प्रखण्डसँ ३ किलोमीटर पूब बलिराजपुर गाम अछि। एकर दक्षिण दिशामे एकटा पुरान किलाक अवशेष अछि। किला पौन किलोमीटर नमगर आऽ आध किलोमीटर चाकर अछि। दस फीटक मोट देबालसँ ई घेरल अछि।&lt;br /&gt;१४. असुरगढ़ किला- मिथिलाक दोसर किला मधुबनी जिलाक पूब आऽ उत्तर सीमा पर तिलयुगा धारक कातमे महादेव मठ लग ५० एकड़मे पसरल अछि।&lt;br /&gt;१५.जयनगर किला- मिथिलाक तेसर किला अछि भारत नेपाल सीमा पर प्राचीन जयपुर आऽ वर्त्तमान जयनगर नगर लग। दरभंगा लग पंचोभ गामसँ प्राप्त ताम्र अभिलेख पर जयपुर केर वर्णन अछि।&lt;br /&gt;१६.नन्दनगढ़- बेतियासँ १२ मील पश्चिम-उत्तरमे ई किला अछि। तीन पंक्त्तिमे १५ टा ऊँच डीह अछि।&lt;br /&gt;१७.लौरिया-नन्दनगढ़- नन्दनगढ़सँ उत्तर स्थित अछि, एतए अशोक स्तंभ आऽ बौद्ध स्तूप अछि।&lt;br /&gt;१८.देकुलीगढ़- शिवहर जिलासँ तीन किलोमीटर पूब हाइवे केर कातमे दू टा किलाक अवशेष अछि। चारू दिशि खाइ अछि।&lt;br /&gt;१९.कटरागढ़- मुजफ्फरपुरमे कटरा गाममे विशाल गढ़ अछि, देकुली गढ़ जेकाँ चारू कात खधाइ खुनल अछि।&lt;br /&gt;२०.नौलागढ़-बेगुसरायसँ २५ किलोमीटर उत्तर ३५० एकड़मे पसरल ई गढ़ अछि।&lt;br /&gt;२१.मंगलगढ़-बेगूसरायमे बरियारपुर थानामे काबर झीलक मध्य एकटा ऊँच डीह अछि। एतए ई गढ़ अछि।&lt;br /&gt;२२.अलौलीगढ़-खगड़ियासँ १५ किलोमीटर उत्तर अलौली गाम लग १०० एकड़मे पसरल ई गढ़ अछि।&lt;br /&gt;२३.कीचकगढ़-पूर्णिया जिलामे डेंगरघाटसँ १० किलोमीटर उत्तर महानन्दा नदीक पूबमे ई गढ़ अछि।&lt;br /&gt;२४.बेनूगढ़-टेढ़गछ थानामे कवल धारक कातमे ई गढ़ अछि।&lt;br /&gt;२५.वरिजनगढ़-बहादुरगंजसँ छह किलोमीटर दक्षिणमे लोनसवरी धारक कातमे ई गढ़ अछि।&lt;br /&gt;२६.गौतम तीर्थ- कमतौल स्टेशनसँ ६ किलोमीटर पश्चिम ब्रह्मपुर गाम लग एकटा गौतम कुण्ड पुष्करिणी अछि।&lt;br /&gt;२७.हलावर्त्त- जनकपुरसँ ३५ किलोमीटर दक्षिण पश्चिममे सीतामढ़ी नगरमे हलवेश्वर शिव मन्दिर आऽ जानकी मन्दिर अछि। एतएसँ देढ़ किलोमीटर पर पुण्डरीक क्षेत्रमे सीताकुण्ड अछि। हलावर्त्तमे जनक द्वार हर चलएबा काल सीता भेटलि छलीह। राम नवमी (चैत्र शुक्ल नवमी) आऽ जानकी नवमी (वैशाख शुक्ल नवमी) पर एतए मेला लगैत अछि।&lt;br /&gt;२८.फुलहर-मधुबनी जिलाक हरलाखी थानामे फुलहर गाममे जनकक पुष्पवाटिका छल जतए सीता फूल लोढ़ैत छलीह।&lt;br /&gt;२९.जनकपुर-बृहद् विष्णुपुराणमे मिथिलामाहात्म्यमे जनकपुर क्षेत्रक वर्णन अछि। सत्रहम शताब्दीमे संत सूर किशोरकेँ अयोध्यामे सरयू धारमे राम आऽ जानकीक दू टा भव्य मूर्त्ति भेटलन्हि, जकरा ओऽ जानकी मन्दिर, जनकपुरमे स्थापित कए देलन्हि। वर्त्तमान मन्दिरक स्थापना टीकमगढ़क महारानी द्वारा १९११ ई. मे भेल। नगरक चारूकात यमुनी, गेरुखा आऽ दुग्धवती धार अछि। राम नवमी (चैत्र शुक्ल नवमी),जानकी नवमी (वैशाख शुक्ल नवमी) आऽ विवाह पंचमी (अगहन शुक्ल पंचमी) पर एतए मेला लगैत अछि।&lt;br /&gt;३०.धनुषा- जनकपुरसँ १५ किलोमीटर उत्तर धनुषा स्थानमे पीपरक गाछक नीचाँ एकटा धनुषाकार खण्ड पड़ल अछि। रामक तोड़ल ई धनुष अछि। एहिसँ पूब वाणगंगा धार बहैत अछि जे लक्ष्मण द्वारा वाणसँ उद्घाटित भेल छल।&lt;br /&gt;३१.सुग्गा-जनकपुर लग जलेश्वर शिवधामक समीप सुग्गा ग्राममे शुकदेवजीक आश्रम अछि। शुकदेवजी जनकसँ शिक्षा लेबाक हेतु मिथिला आयल छ्लाह- एहि ठाम हुनकर ठहरेबाक व्यवस्था भेल छल।&lt;br /&gt;३२.सिंहेश्वर- मधेपुरासँ ५ किलोमीटर गौरीपुर गाम लग सिंहेश्वर शिवधाम अछि।&lt;br /&gt;३३.कपिलेश्वर-कपिल मुनि द्वार स्थापित महादेव मधुबनीसँ ६ किलोमीटर पश्चिमममे अछि।&lt;br /&gt;३४.कुशेश्वर- समस्तीपुरसँ उत्तर-पूब, लहेरियासरायसँ 60 किलोमीटर दक्षिण-पूब आऽ सहरसासँ २५ किलोमीटर पश्चिम ई एकटा प्रसिद्ध शिवस्थान अछि।&lt;br /&gt;३५.सिमरदह-थलवारा स्टेशन लग शिवसिंह द्वारा बसाओल शिवसिंहपुर गाम लग ई शिवमन्दिर अछि।&lt;br /&gt;३६.सोमनाथ- मधुबनी जिलाक सौराठ गाममे सभागाछी लग सोमदेव महादेव छथि।&lt;br /&gt;३७.मदनेश्वर- मधुबनी जिलाक अंधरा ठाढ़ीसँ ४ किलोमीटर पूब मदनेश्वर शिव स्थान अछि।&lt;br /&gt;३८.बसैटी अभिलेख- पूणियाँमे श्रीनगर लग मिथिलाक्षर ई अभिलेख मिथिलाक पहिल महिला शासक रानी इद्रावतीक राज्यकालक वर्णन करैत अछि। एकर आधार पर मदनेश्वर मिश्र ’एक छलीह महारानी’ उपन्यास सेहो लिखने छथि।&lt;br /&gt;३९.चण्डेश्वर- झंझारपुरमे हररी गाम लग चण्डेश्वर ठाकुर द्वारा स्थापितचण्डेश्वर शिवस्थान अछि।&lt;br /&gt;४०.बिदेश्वर-मधुबनी जिलामे लोहनारोड स्टेशन लग स्थित शिवधाम स्थापना महाराज माधवसिंह कएलन्हि। ताहि युगक मिथिलाक्षरमे अभिलेख सेहो एतए अछि।&lt;br /&gt;४१.शिलानाथ- जयनगर लग कमला धारक कातमे शिलानाथ महादेव छथि।&lt;br /&gt;४२.उग्रनाथ-मधुबनीसँ दक्षिण पण्डौल स्टेशन लग भवानीपुर गाममे उगना महादेवक शिवलिंग अछि। विद्यापतिकेँ प्यास लगलन्हि तँ उगनारूपी महादेव जटासँ गंगाजल निकालि जल पिएलखिन्ह। विद्यापतिक हठ कएला पर एहि स्थान पर गना हुनका अपन असल शिवरूपक दर्शन देलखिन्ह।&lt;br /&gt;४३.उच्चैठ छिन्नमस्तिका भगवती- कमतौल स्टेशनसँ १६ किलोमीटर पूर्वोत्तर उच्चैठमे कालिदास भगवतीक पूजा करैत छलाह। भगवतीक मौलिक मूर्त्ति मस्तक विहीन अछि।&lt;br /&gt;४४.उग्रतारा-मण्डन मिश्रक जन्मभूमि महिषीमे मण्डनक गोसाउनि उग्रतारा छथि।&lt;br /&gt;४५.भद्रकालिका- मधुबनी जिलाक कोइलख गाममे भद्रकालिका मंदिर अछि।&lt;br /&gt;४६.चामुण्डा-मुजफ्फर्पुर जिलामे कटरगढ़ लग लक्ष्मणा वा लखनदेइ धार लग दुर्गा द्वारा चण्ड-मुण्डक वध कएल गेल। ओहि स्थान पर ई मन्दिर अछि।&lt;br /&gt;४७.परसा सूर्य मन्दिर- झंझारपुरमे सग्रामसँ पाँच किलोमीटर पूर्व परसा गाममे सढ़े चारि फीटक भव्य सूर्य मूर्त्ति भेटल अछि।&lt;br /&gt;४८.बिसफी- मधुबनी जिलाक बेनीपट्टी थानामे कमतौल रेलवे स्टेशनसँ ६ किलोमीटर पूब आऽ कपिलेश्वर स्थानसँ ४ किलोमीटर पश्चिम बिसफी गाम अछि। विद्यापतिक जन्म-स्थान ई गाम अछि। एतए विद्यापतिक स्मारक सेहो अछि।&lt;br /&gt;४९.मंदार पर्वत-बांका स्थित स्थलमे मिथिलाक्षरक गुप्तवंशीय ७म् शताब्दीक अभिलेख अछि। समुद्र मंथनक हेतु मंदारक प्रयोग भेल छल।&lt;br /&gt;५०.विक्रमशिला-भागलपुरमे स्थित ई विश्वविद्यालय बौद्ध नालन्दा विश्वविद्यालयक विपरीत सनातन धर्मक शिक्षाक केन्द्र रहल। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-2522437876419059907?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/2522437876419059907/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=2522437876419059907&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2522437876419059907'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2522437876419059907'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_5301.html' title='मिथिलाक मीलक पाथर'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-8900838103503007289</id><published>2011-01-08T03:59:00.001-06:00</published><updated>2011-01-08T04:03:25.967-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सिद्ध पीठ'/><title type='text'>मिथिलाक बीस टा सिद्ध पीठ-</title><content type='html'>&lt;span style="font-weight:bold;"&gt;&lt;br /&gt;१.गिरिजास्थान(फुलहर,मधुबनी),&lt;br /&gt;२.दुर्गास्थान(उचैठ, मधुबनी),&lt;br /&gt;३.रहेश्वरी(दोखर,मधुबनी),&lt;br /&gt;४.भुवनेश्वरीस्थान(भगवतीपुर,मधुबनी),&lt;br /&gt;५.भद्रकालिका(कोइलख, मधुबनी),&lt;br /&gt;६.चमुण्डा स्थान(पचाही, मधुबनी),&lt;br /&gt;७.सोनामाइ(जनकपुर, नेपाल),&lt;br /&gt;८.योगनिद्रा(जनकपुर, नेपाल)&lt;br /&gt;९.कालिका स्थान(जनकपुर स्थान),&lt;br /&gt;१०.राजेश्वरी देवी(जनकपुर, नेपाल),&lt;br /&gt;११.छिनमस्ता देवी(उजान, मधुबनी),&lt;br /&gt;१२.बन दुर्गा(खररख, मधुबनी),&lt;br /&gt;१३.सिधेश्वरी देवी(सरिसव, मधुबनी),&lt;br /&gt;१४.देवी-स्थान(अंधरा ठाढ़ी,मधुबनी),&lt;br /&gt;१५.कंकाली देवी(भारत नेपाल सीमा आऽ रामबाग प्लेस, दरभंगा)&lt;br /&gt;१६.उग्रतारा(महिषी, सहरसा), &lt;br /&gt;१७.कात्यानी देवी(बदलाघाट, सहरसा),&lt;br /&gt;१८.पुरन देवी(पूर्णियाँ),&lt;br /&gt;१९.काली स्थान(दरभंगा),&lt;br /&gt;२०.जैमंगलास्थान(मुंगेर)। &lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-8900838103503007289?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/8900838103503007289/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=8900838103503007289&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/8900838103503007289'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/8900838103503007289'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_1014.html' title='मिथिलाक बीस टा सिद्ध पीठ-'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-5485219153027959921</id><published>2011-01-08T03:56:00.002-06:00</published><updated>2011-01-08T03:59:32.709-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विद्यापति'/><title type='text'>विद्यापति गीत</title><content type='html'>1&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सासु जरातुरि भेली। ननन्दि अछलि सेहो सासुर गेली।&lt;br /&gt;तैसन न देखिअ कोई। रयनि जगाए सम्भासन होई।&lt;br /&gt;एहि पुर एहे बेबहारे। काहुक केओ नहि करए पुछारे।&lt;br /&gt;मोरि पिअतमकाँ कहबा। हमे एकसरि धनि कत दिन रहबा।&lt;br /&gt;पथिक, कहब मोर कन्ता। हम सनि रमनि न तेज रसमन्ता।&lt;br /&gt;भनइ विद्यापति गाबे। भमि-भमि विरहिनि पथुक बुझाबे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2&lt;br /&gt;आसक लता लगाओल सजनी, नयनक नीर पटाय।&lt;br /&gt;से फल आब परिनत भेल मजनी, आँचर तर न समाय।।&lt;br /&gt;कांच सांच पहु देखि गेल सजनी, तसु मन भेल कुह भान।&lt;br /&gt;दिन-दिन फल परिनत भेल सजनी, अहुनख कर न गेआना।&lt;br /&gt;सबहक पहु परदेस बसु सजनी, आयल सुमिरि सिनेह।&lt;br /&gt;हमर एहन पति निरदय सजनी, नहि मन बाढय नहे।।&lt;br /&gt;भनइ विद्यापति गाओल सजनी, उचित आओत गुन साइ।&lt;br /&gt;उठि बधाव करु मन भरि सजनी, अब आओत घर नाह।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-5485219153027959921?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/5485219153027959921/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=5485219153027959921&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/5485219153027959921'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/5485219153027959921'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_08.html' title='विद्यापति गीत'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-2546930252823747878</id><published>2011-01-05T00:30:00.000-06:00</published><updated>2011-01-05T00:31:19.936-06:00</updated><title type='text'>हम कि जानि</title><content type='html'>एक-दोसर कियैक बनल अछि अनजान, हम कि जानि&lt;br /&gt;ककरा हमर हाल पता छै, हम कि जानि&lt;br /&gt;अधर पर मुस्की लय कय कियैक मिलैत अछि&lt;br /&gt;मन मे केहन गरल भरल छै, हम कि जानि&lt;br /&gt;भूखल पेट आई बनल अछि सिया-स्वयंवर&lt;br /&gt;राम एखन कियैक चुप छथि, हम कि जानि&lt;br /&gt;ककरा लागत नीक आ के कहत बेजाय&lt;br /&gt;नव समय के नव बसात छै, हम कि जानि&lt;br /&gt;सोचक सागर कें मंथन नहि भेल&lt;br /&gt;भगवान कतय नुकायल छथि, हम कि जानि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-2546930252823747878?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/2546930252823747878/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=2546930252823747878&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2546930252823747878'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2546930252823747878'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_05.html' title='हम कि जानि'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-1782852985608208028</id><published>2011-01-04T05:37:00.000-06:00</published><updated>2011-01-04T05:42:19.682-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हरिमोहन झा'/><title type='text'>हरिमोहन झाक पांच पत्र</title><content type='html'>पाँचपत्र (हरिमोहन झा)(१)दड़िभंगा१-१-१९प्रियतमेअहाँक लिखल चारि पाँती चारि सएबेर पढ़लहुँ तथापि तृप्ति नहि भेल. आचार्यक परीक्षा समीप अछि किन्तु ग्रन्थमे कनेको चित्त नहि लगैत अछि. सदिखन अहीँक मोहिनी मूर्ति आँखिमे नचैत रहैत अछि. राधा रानी मन होइत अछि जे अहाँक ग्राम वृन्दावन बनि जाइत, जाहिमे केवल अहाँ आ हम राधा-कृष्ण जकाँ अनन्त कालधरि विहार करैत रहितहुँ. परन्तु हमरा ओ अहाँक बीचमे भारी भदबा छथि. अहाँक बाप-पित्ती, जे दू मासक बाद फगुआमे हमरा आबक हेतु लिखैत छथि. साठि वर्षक बूढ़केँ की बूझि पड़तनि जे साठि दिनक विरह केहन होइत छैक !प्राणेश्वरी, अहाँ एक बात करू माघी अमावस्यामे सूर्यग्रहण लगैत छैक. ताहिमे अपना माइक संग सिमरियाघाट आउ. हम ओहिठाम पहुँचि अहाँकें जोहि लेब. हँ एकटा गुप्त बात लिखैत छी जखन स्त्रीगण ग्रहण-स्नान करऽ चलि जएतीह तखन अहाँ कोनो लाथ कऽकऽ बासापर रहि जाएब. हमर एकटा संगी फोटो खिचऽ जनैत अछि. तकरासँ अहाँक फोटो खिचबाएब देखब ई बात केओ बूझए नहि. नहि तँ अहाँक बाप-पित्ती जेहन छथि से जानले अछि.हृदयेश्वरी हम अहाँक फरमाइशी वस्तु (चन्द्रहार) कीनिकऽ रखने छी. सिमरिया में भेट भेलापर चूपचाप दऽ देब. मुदा केओ जानए नहि हमरा बापके पता लगतनि तँ खर्चा बन्द कऽ देताह. हँ एहि पत्रक जबाब फिरती डाकसँ देब. तें लिफाफक भीतर लिफाफ पठारहल छी. पत्रोत्तर पठएबामे एको दिनक विलम्ब नहि करब. हमरा एक-एक क्षण पहाड़सन बीतिरहल अछि. अहाँक प्रतीक्षा में आतुरपुनश्च : चिट्ठी दोसराके छोड़क हेतु नहि देबैक. अपने हाथसँ लगाएब रतिगरे आँचरमे नुकौने जाएब आओर जखन केओ नहि रहैक तँ लेटरबक्समे खसा देबैक.&lt;br /&gt;___________________________________________________&lt;br /&gt;(२)&lt;br /&gt;हथुआ संस्कृत विद्यालय१-१-२९प्रिय,बहुत दिनपर अहाँक पत्र पाबि आनन्द भेल. अहाँ लिखैत छी जे ननकिरबी आब तुसारी पूजत, से हम एकटा अठहत्थी नूआ शीघ्र पठा देबैक. बंगट आब स्कूल जाइत अछि कि नहि? बदमाशी तँ नहि करैत अछि? अहाँ लिखैत छी जे छोटकी बच्चीके दाँत उठि रहल छैक, से ओकर दबाइ वैद्यजीसँ मङबाकऽ दऽ देबैक. अहूके एहिबेर गामपर बहुत दुर्बल देखलहुँ जीरकादि पाक बनाकऽ सेवन करू. जड़कालामे देह नहि जुटत तँ दिन-दिन ह्रस्त भेल जाएब. ओहिठाम दूध उठौना करू. कमसँ कम पाओभरि नित्य पिउल करब. हम किछु दिनक हेतु अहाँकें एहिठाम मङा लितहुँ. परन्तु एहिठाम डेराक बड्ड असौकर्य. दोसर जे विद्यालयसँ कुल मिला साठि टका मात्र भेटैत अछि. ताहिमे एहिठाम पाँचगोटाक निर्वाह हएब कठिन. तेसर ई जे फेर बूढ़ीलग के रहतनि ! इएहसभ विचारिकऽ रहि जाइत छी. नहि तँ अहाँक एतऽ रहने हमरो नीक होइत. दुनू साँझ समयपर सिद्ध भोजन भेटैत बंगटो के पढ़बाक सुभीता होइतैक. छोटकी कनकिरबीसँ मन सेहो बहटैत. परन्तु कएल की जाए ! बड़की ननकिरबी किछु आओर छेटगर भऽ जाए तँ ओकरा बूढ़ीक परिचर्यामे राखि किछु दिनक हेतु अहाँ एतऽ आबि सकैत छी. परन्तु एखन तँ घर छोड़ब अहाँक हेतु सम्भव नहि. हम फगुआक छुट्टीमें गाम अएबाक यत्न करब. यदि नहि आबि सकब तँ मनीआर्डर द्वारा रुपैया पठा देब.अहींक कृष्णपुनश्च : चिट्ठी दोसराकें छोड़क हेतु नहि देबैक अपने हाथसँ लगाएब. रतिगरे आँचरमे नुकौने जाएब आओर जखन केओ नहि रहैक तँ लेटरबक्समे खसा देबैक.&lt;br /&gt;________________________________________________________________&lt;br /&gt;(३)&lt;br /&gt;हथुआ संस्कृत विद्यालय१-१-३९शुभाशीर्वाद अहाँक चिट्ठी पाबि हम अथाह चिन्तामे पड़ि गेलहुँ. एहिबेर धान नहि भेल तखन सालभरि कोना चलत. माएक श्राद्धमे पाँच सए कर्ज भेल तकर सूदि दिन-दिन बढ़ले जा रहल अछि. दू मासमे बंगटक इमतिहान हएतनि. करीब पचासो टका फीस लगतनि. जँ कदाचित पास कऽ गेलाह तँ पुस्तकोमे पचास टका लागिए जएतनि. हम ताही चिन्तामे पड़ल छी. एहिठाम एक मासक अगाउ दरमाहा लऽ लेने छियैक. तथापि उपरसँ नब्बे टका हथपैंच भऽ गेल अछि. एहना हालतिमे हम ६२ टका मालगुजारी हेतु कहाँसँ पठाउ? जँ भऽ सकए तँ तमाकू बेचिकऽ पछिला बकाया अदाय कऽ देबैक. भोलबा जे खेत बटाइ कएने अछि, ताहिमे एहिबेर केहन रब्बी छैक? कोठीमे एको मासक योगर चाउर नहि अछि. ताहिपर लिखैत छी जे ननकिरबी सासुरसँ दू मासक खातिर आबऽ चाहैत अछि. ई जानि हम किंकर्तव्यविमूढ़ भऽ गेल छी. ओ चिल्हकाउर अछि. दूटा नेना छैक. सभकेँ डेबब अहाँक बुते पार लागत? आब छोटकी बच्ची सेहो १० वर्षक भेल. तकर कन्यादानक चिन्ता अछि. भरि-भरि राति इएहसभ सोचैत रहैत छी, परन्तु अपन साध्ये की? देखा चाही भगवान कोन तरहें पार लगबै छथि!शुभाभिलाषीदेवकृष्णपुनश्च : जारनि निंघटि गेल अछि तँ उतरबरिया हत्ताक सीसो पंगबा लेब. हम किछु दिनक हेतु गाम अबितहुँ किन्तु जखन महिसिए बिसुकि गेल अछि तखन आबिकऽ की करब?अहाँक देवकृष्ण&lt;br /&gt;________________________________________________________&lt;br /&gt;(४)&lt;br /&gt;हथुआ संस्कृत विद्यालय&lt;br /&gt;१-१-४९&lt;br /&gt;आशीर्वाद&lt;br /&gt;हम दू माससँ बड्ड जोर दुखित छलहुँ तें चिट्ठी नहि दऽ सकलहुँ. अहाँ लिखैत छी जे बंगट बहुकें लऽकऽ कलकत्ता गेलाह. से आइकाल्हिक बेटा-पुतहु जेहन नालायक होइत छैक से तँ जानले अछि. हम हुनकाखातिर की-की नहि कएल! कोन तरहें बी.ए. पास करौलियनि से हमहीं जनैत छी. तकर आब प्रतिफल दऽरहल छथि. हम तँ ओही दिन हुनक आस छोड़ल, जहिया ओ हमरा जिबिते मोछ छँटाबऽ लगलाह. सासुक कहबमे पड़ि गोरलग्गीक रुपैया हमरालोकनिकेँ देखहु नहि देलनि. जँ जनितहुँ जे कनियाँ अबितहि एना करतीह तँ हम कथमपि दक्षिणभर विवाह नहि करबितियनि. १५०० गनाकऽ हम पाप कएल, तकर फल भोगिरहल छी. ओहिमेसँ आब पन्द्रहोटा कैँचा नहि रहल. तथापि बेटा बूझैत छथि जे बाबूजी तमघैल गाड़नहि छथि. ओ आब किछुटा नहि देताह आर ने पुतहु अहाँक कहलमे रहतीह. हुनका उचित छलनि जे अहाँक संग रहि भानस-भात करितथि, सेवा-शुश्रुषा करितथि. परञ्च ओ अहाँक इच्छाक विरुद्ध बंगटक संग लागलि कलकत्ता गेलीह. ओहिठाम बंगटकें १५० मे अपने खर्च चलब मोश्किल छनि कनियाँकें कहाँसँ खुऔथिन. जे हमरालोकनि ३० वर्षमे नहि कएल से ईलोकनि द्विरागमनसँ ३ मासक भीतर कऽ देखौलनि. अस्तु. की करब? एखन गदह-पचीसी छनि. जखन लोक होएताह तखन अपने सभटा सुझतनि. भगवान सुमति देथुन. विशेष की लिखू? कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति.&lt;br /&gt;देवकृष्ण&lt;br /&gt;पुनश्च: जँ खर्चक तकलीफ हो तँ छओ कट्ठा डीह जे अहाँक नामपर अछि से भरना धऽकऽ काज चलाएब. अहाँक हार जे बन्धक पड़ल अछि से जहिया भगवानक कृपा होएतनि तहिया छुटबे करत!&lt;br /&gt;____________________________________________________&lt;br /&gt;(५)&lt;br /&gt;काशीतः&lt;br /&gt;१-१-५९&lt;br /&gt;स्वस्ति श्री बंगटबाबूकें हमर शुभाशिषः सन्तु.&lt;br /&gt;अत्र कुशलं तत्रास्तु. आगाँ सुरति जे एहि जाड़मे हमर दम्मा पुनः उखरि गेल अछि. राति-रातिभरि बैसिकऽ उकासी करैत रहैत छी. आब काशी-विश्वनाथ कहिया उठबैत छथि से नहि जानि. संग्रहणी सेहो नहि छूटैत अछि. आब हमरालोकनिक दबाइए की? औषधं जाह्नवी तोयं वैद्यो नारायणो हरिः. एहिठाम सत्यदेव हमर बड्ड सेवा करैत छथि. अहाँक माएकें बातरस धएने छनि से जानिकऽ दुःख भेल परन्तु आब उपाये की? वृद्धावस्थाक कष्ट तँ भोगनहि कुशल! बूढ़ीकें चलि-फीरि होइत छनि कि नहि? हम आबिकऽ देखितियनि, परञ्च अएबा जएबामे तीस चालीस टका खर्च भऽ जाएत दोसर जे आब हमरो यात्रा में परम क्लेश होइत अछि. अहाँ लिखैत छी जे ओहो काशीवास करऽ चाहैत छथि. परन्तु एहिठाम बूढ़ीके बड्ड तकलीफ होएतनि. अपन परिचर्या करबा योग्य त छथिए नहि, हमर सेवा की करतीह? दोसर जे जखन अहाँ लोकनि सन सुयोग्य बेटा-पुतहु छथिन तखन घर छोड़ि एतऽ की करऽ औतीह? मन चंगा तँ कठौतीमें गंगा! ओहिठाम पोता-पोतीके देखैत रहैत छथि. पौत्रसभके देखबाक हेतु हमरो मन लागल रहैत अछि. परञ्च साध्य की? उपनयनधरि जीबैत रहब तँ आबिकऽ आशीर्वाद देबनि. अहाँक पठाओल ३० टका पहुँचल एहिसँ च्यवनप्राश कीनिकऽ खा-रहल छी. भगवान अहाँके निकें राखथु. चि. पुतहुके हमर शुभाशीर्वाद कहि देबनि. ओ गृहलक्ष्मी थिकीह. अहाँक माए जे हुनकासँ झगड़ा करैत छथिन से परम अनर्गल करैत छथि. परन्तु अहाँकेँ तँ बूढ़ीक स्वभाव जानले अछि. ओ भरिजन्म हमरा दुखे दैत रहलीह. अस्तु कुमाता जायेत क्वचिदपि कुपुत्रो न भवति, एहि उक्ति के अहाँ चरितार्थ करब.&lt;br /&gt;इति देवकृष्णस्य&lt;br /&gt;पुनश्च : यदि कोनो दिन बूढ़ीके किछु भऽ जाइन तँ अहाँलोकनिक बदौलति सद् गति होएबे करतनि जाहि दिन ई सौभाग्य होइन ताहि दिन एक काठी हमरोदिस सँ धऽ देबनि.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-1782852985608208028?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/1782852985608208028/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=1782852985608208028&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1782852985608208028'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1782852985608208028'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_9800.html' title='हरिमोहन झाक पांच पत्र'/><author><name>बिपिन बादल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16014292250857946792</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_JuKwUmjXx6s/SXlaA2WUQvI/AAAAAAAAABM/QK4ZRAXuODU/S220/badal+ji.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-7875528491307411113</id><published>2011-01-04T03:43:00.001-06:00</published><updated>2011-01-04T03:43:20.815-06:00</updated><title type='text'>मन</title><content type='html'>मन कें बेसी नहि बुझाबी&lt;br /&gt;नहि त जन्मत कुण्ठा&lt;br /&gt;हमर जीवन कि बदलत&lt;br /&gt;वेदक दू-चारि ऋचा&lt;br /&gt;सुरूज कें धाह के कहि दिओए&lt;br /&gt;पक्षी कें नहि झुलसाबै&lt;br /&gt;हमरा सदिखन नीक लगैत अछि&lt;br /&gt;निस्दबध खरहोरि &lt;br /&gt;जतय बसात सेहो नहि सुनाइत अछि&lt;br /&gt;लोकक केहन आदति छैन्हि&lt;br /&gt;गप्प करताह, चाह पीताह आ विदा भ जेताह&lt;br /&gt;एकसरि हमरा छोडि़ कए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-7875528491307411113?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/7875528491307411113/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=7875528491307411113&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/7875528491307411113'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/7875528491307411113'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_04.html' title='मन'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-4077236377931717380</id><published>2011-01-03T08:24:00.001-06:00</published><updated>2011-01-03T08:32:46.383-06:00</updated><title type='text'>जुल्मी</title><content type='html'>- मंत्रेश्वर झा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुनिया मे अहीं टा त’ नहिं छी जुल्मी,&lt;br /&gt;अपना पर बजरत तखन बुझवै जे की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काल्हियो छलहुँ हमारा आ काल्हियो रहब,&lt;br /&gt;बीतत वर्तमान तखन बुझबै जे की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूसि फासि ठूसि ठासि भरलहुँ जिनगी,&lt;br /&gt;अंतकाल पछताके बुझबै जे की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजौलहुँ इनाम ले बदनामी खातिर,&lt;br /&gt;नाम जुटत अपनो त’ बुझबै जे की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नुका नुका पर्दा मे बाँचब कते दिन,&lt;br /&gt;खोलब जौं भेद तखन बुझबै जे की.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-4077236377931717380?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/4077236377931717380/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=4077236377931717380&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4077236377931717380'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4077236377931717380'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_7312.html' title='जुल्मी'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-5107935482842327341</id><published>2011-01-03T08:22:00.000-06:00</published><updated>2011-01-03T08:23:46.368-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विद्यापति'/><title type='text'>मानिनि आब उचित नहि मान</title><content type='html'>मानिनि आब उचित नहि मान।&lt;br /&gt;एखनुक रंग एहन सन लागय जागल पए पंचबान।।&lt;br /&gt;जूडि रयनि चकमक करन चांदनि एहन समय नहि आन।&lt;br /&gt;एहि अवसर पिय मिलन जेहन सुख जकाहि होय से जान।।&lt;br /&gt;रभसि रभसि अलि बिलसि बिलसि कलि करय मधु पान।&lt;br /&gt;अपन-अपन पहु सबहु जेमाओल भूखल तुऊ जजमान।।&lt;br /&gt;त्रिबलि तरंग सितासित संगम उरज सम्भु निरमान।&lt;br /&gt;आरति पति मंगइछ परति ग्रह करु धनि सरबस दान।।&lt;br /&gt;दीप-बाति सम भिर न रहम मन दिढ करु अपन गेयान।&lt;br /&gt;संचित मदन बेदन अति दारुन विद्यापति कवि भान।।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भावार्थ : - हे नायिका! अब अर्थ इतना भी रुसना-फुलना उचित नहीं है। इन बातों को अब छोड़ भी दो। देखो तो, ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे कामदेव अपने पांच बाणों के साथ जग चुके हों। रात कितना आकर्षक लग रहा है। चारों तरफ स्पष्ट दिखाई दे रहा है (शुक्ल पक्ष अपनी चढ़ाव में जो है)। इससे अच्छा (उपयुक्त) पला भला और क्या हो सकता (अभिसार के लिए) है। इस मनोनुकूल क्षण में प्रियतम से मिलन का जो आनन्द मिलता है उसका अनुभव (अनुमान) वही कर सकता है, जिसने ऐसे पल को कभी भोगा है। भँवर रस से हुए मदमत होकर कली को तोर रहा है, मधुपान कर रहा है। दोनों तरफ से कहीं कोई अवरोध नहीं है। अर्थात् सभी अपने-अपने प्रियतम की भूख मिटा चुके हैं, केवल तुम्हारा प्रियतम अभी तक भूखा है। तुम्हारे नाभि के ऊपर में लहर तरंगित है। संगम पर अवस्थित दोनों स्तन (छाती) शिव-शम्भु के समान लग रहे हैं। इस तरह के अवसर पर तुम्हारा प्रियतम आर्त होकर खड़े हैं। तुमसे कुछ मांग रहा है- याचक मुद्रा में। हे मानिनि (नायिका), तुम ऐसे पल में अपना सर्व दान कर दो। अब भी अपने मन को दृढ़ करो। इस चंचल मन का क्या भरोसा! यह तो दीपक के बाती जैसे हमेशा काँपता रहेगा। महाकवि विद्यापति ऐसी स्थिति का बोध कराते हुए कहते हैं कि कामेच्छा अत्यधिक मात्रा में एकत्रित हो जाने पर बहुत कष्ट देता है&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-5107935482842327341?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/5107935482842327341/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=5107935482842327341&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/5107935482842327341'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/5107935482842327341'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_1553.html' title='मानिनि आब उचित नहि मान'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-973702139890739714</id><published>2011-01-03T08:19:00.000-06:00</published><updated>2011-01-03T08:20:52.339-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विद्यापति गीत'/><title type='text'>अभिनव पल्लव बइसंक देल</title><content type='html'>&lt;strong&gt;अभिनव पल्लव बइसंक देल।&lt;br /&gt;धवल कमल फुल पुरहर भेल।।&lt;br /&gt;करु मकरंद मन्दाकिनि पानि।&lt;br /&gt;अरुन असोग दीप दहु आनि।।&lt;br /&gt;माह हे आजि दिवस पुनमन्त।।&lt;br /&gt;करिअ चुमाओन राय बसन्त।।&lt;br /&gt;संपुन सुधानिधि दधि भल भेल।&lt;br /&gt;भगि-भगि भंगर हंकराय गेल।।&lt;br /&gt;केसु कुसुम सिन्दुर सम भास।&lt;br /&gt;केतकि धुलि बिथरहु पटबास।।&lt;br /&gt;भनइ विद्यापति कवि कंठहार।&lt;br /&gt;रस बझ सिवसिंह सिव अवतार।&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-973702139890739714?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/973702139890739714/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=973702139890739714&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/973702139890739714'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/973702139890739714'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_7047.html' title='अभिनव पल्लव बइसंक देल'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-884008503194459593</id><published>2011-01-03T08:18:00.000-06:00</published><updated>2011-01-03T08:19:42.612-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विद्यापति गीत'/><title type='text'>अभिनव कोमल सुन्दर पात</title><content type='html'>&lt;strong&gt;अभिनव कोमल सुन्दर पात।&lt;br /&gt;सगर कानन पहिरल पट रात।&lt;br /&gt;मलय-पवन डोलय बहु भांति&lt;br /&gt;अपन कुसुम रसे अपनहि माति।।&lt;br /&gt;देखि-देखि माधव मन हुलसंत।&lt;br /&gt;बिरिन्दावन भेल बेकत बसंत।।&lt;br /&gt;कोकिल बोलाम साहर भार।&lt;br /&gt;मदन पाओल जग नव अधिकार।।&lt;br /&gt;पाइक मधुकर कर मधु पान।&lt;br /&gt;भमि-भमि जोहय मानिनि-मान।।&lt;br /&gt;दिसि-दिसि से भमि विपिन निहारि।&lt;br /&gt;रास बुझावय मुदित मुरारि।&lt;br /&gt;भनइ विद्यापति ई रस गाव।&lt;br /&gt;राधा-माधव अभिनव भाव।। &lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-884008503194459593?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/884008503194459593/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=884008503194459593&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/884008503194459593'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/884008503194459593'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_7923.html' title='अभिनव कोमल सुन्दर पात'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-5960166875870508980</id><published>2011-01-03T08:16:00.000-06:00</published><updated>2011-01-03T08:17:27.664-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विद्यापति गीत'/><title type='text'>जनम होअए जनु</title><content type='html'>&lt;em&gt;जनम होअए जनु,जआं पुनि होइ।&lt;br /&gt;जुबती भए जनमए जनु कोई।।&lt;br /&gt;होइए जुबती जनु हो रसमंति।&lt;br /&gt;रसओ बुझए जनु हो कुलमंति।।&lt;br /&gt;निधन मांगओं बिहि एक पए तोहि।&lt;br /&gt;थिरता दिहह अबसानहु मोहि।।&lt;br /&gt;मिलओ सामि नागर रसधार।&lt;br /&gt;परबस जन होअ हमर पिआर।।&lt;br /&gt;परबस होइअ बुझिह बिचारि।&lt;br /&gt;पाए बिचार हार कओन नारि।।&lt;br /&gt;भनइ विद्यापति अछ परकार।&lt;br /&gt;दंद-समुद होअ जिब दए पार।।&lt;/em&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-5960166875870508980?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/5960166875870508980/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=5960166875870508980&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/5960166875870508980'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/5960166875870508980'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post_03.html' title='जनम होअए जनु'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-3066956386625175179</id><published>2011-01-03T08:14:00.000-06:00</published><updated>2011-01-03T08:15:52.151-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विद्यापति गीत'/><title type='text'>गौरा तोर अंगना</title><content type='html'>गौरा तोर अंगना।&lt;br /&gt;बर अजगुत देखल तोर अंगना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिस बाघ सिंह करे हुलना ।&lt;br /&gt;दोसर बरद छैन्ह सेहो बौना।।&lt;br /&gt;हे गौरा तोर ................... ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्तिक गणपति दुई चेंगना।&lt;br /&gt;एक चढथि मोर एक मुसना।।&lt;br /&gt;हे गौर तोर ............ ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैंच उधार माँगे गेलौं अंगना ।&lt;br /&gt;सम्पति मध्य देखल भांग घोटना ।।&lt;br /&gt;हे गौरा तोर ................ ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेती न पथारि शिव गुजर कोना ।&lt;br /&gt;मंगनी के आस छैन्ह बरसों दिना ।।&lt;br /&gt;हे गौरा तोर ............... ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भनहि विद्यापति सुनु उगना ।&lt;br /&gt;दरिद्र हरन करू धएल सरना ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-3066956386625175179?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/3066956386625175179/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=3066956386625175179&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/3066956386625175179'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/3066956386625175179'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='गौरा तोर अंगना'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-9048295061800705981</id><published>2010-11-10T03:26:00.003-06:00</published><updated>2010-11-10T03:29:26.647-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता संग्रह'/><title type='text'>बादल की कविता संग्रह</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TNpl6FjNN0I/AAAAAAAAAR0/qHc_-Kvg3vE/s1600/COVER.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5537850740402108226" style="DISPLAY: block; MARGIN: 0px auto 10px; WIDTH: 400px; CURSOR: hand; HEIGHT: 334px; TEXT-ALIGN: center" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TNpl6FjNN0I/AAAAAAAAAR0/qHc_-Kvg3vE/s400/COVER.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TNplis5U7jI/AAAAAAAAARs/s1LIweMSxe8/s1600/COVER.jpg"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-9048295061800705981?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/9048295061800705981/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=9048295061800705981&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/9048295061800705981'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/9048295061800705981'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='बादल की कविता संग्रह'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/TNpl6FjNN0I/AAAAAAAAAR0/qHc_-Kvg3vE/s72-c/COVER.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-4289783575775994278</id><published>2010-02-22T22:26:00.000-06:00</published><updated>2010-02-22T22:27:27.310-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गोनू झा'/><title type='text'>गोनू झा केर पानक पीक</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;अपन प्रखर बुद्धि, वाक्ïपटुता, बौद्धिक चातुर्य आ परिहासक सहजि प्रवृत्तिक कारण हुनकर लोकप्रियता दिनानुदिन बढ़ैत गेलैन्हि। प्रसिद्धिक संग-संग लक्ष्मीक कृपा सेहो हुनका पर होमय लागलन्हि। गोनू झा आब गरीब नहि रहि गेल छलाह, ई बात इलाका केर चोर सबसँ सेहो नुकाएल नहि रहल। एक दिन किछु चोर ई निश्चिय कएलक जे गोनू झाक घर मे चोरी करी, कारण बहुत रास धन हाथ लगबाक संभावना छलै।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;गोनू झाक दलानक एक कोन मे तुलसी आ अन्य बहुत झमटगर झाड़ी छलन्हि। ओ एतेक झमटगर छलैक जे यदि द्वि-चारि गोटा ओहि ओढ़ मे नुका जायत तऽ बहुत ध्यान देलहि पर ओकरा पर नजरि पडि़ सकैत छल। चोर सभ तय कएलक जे सांझ होइत देरी ओहि झमटगर जडि़ मे नुका रहल जाय आ जखन राति मे गोनू झा सब सूति रहताह, तखन चोरी कएल जाय। द्विटा चोर सांझ होइत देरी ओहि झुरमुट मे नुका गेल आ राति होयबाक प्रतीक्षा करए लागल। सांझ भेला पर जखन गोनू झा घुमि घाम कऽ घर अएलाह तऽ आदतन दलानक एक चक्कर लगौलह। ओहि झुरमुट लÓग आबिते देरी हुनका किछु संशय भेलन्हि। तत्काल हुनका सब बातक अंदाज भऽ गेलन्हि। गोनू झा केर दिमाग मे तत्क्षण एकटा विचार अएलन्हि। ओ ओहि झुरमुट लÓग खाट खसा ओहि पर बैसि गेलाह आ अपना पत्नि सँ पनबटï्टी, एक बाल्टीन जल आ लोटा लऽ आनए कहलथिन्ह। जखन सभ सामान आबि गेल तऽ पनबट्टïी सँ पान निकालि एकटा पान खएलाह। फेर युक्ति अनुसार ओ झुरमुट पर पीक फेंकए लगलाह। ओ पीक सीधे चोरबाक देह पर फेकैत छलाह। पान सÓधला पर ओ लोटा मे पानि भरि कुल्ला करबा बहाने चोरक देह पर मुंहक पानि फेंक दैथ। फेर दोसर पान खा लागथि। ई क्रम लगातार चलैत रहल। मुदा चोर छल कि पानक पीक आ कुल्लाक पानि सँ तर-बतर भेलाक बादो ओ दुनु दम साधि नुकाले रहल। चोरि मे बहुत रास धन प्राप्तिक आ लोभ पकड़ा जयबाक डर सँ ओ कोनो सुगबुगहाट नहि करैत छल। जखन बहुत राति भऽ गेलै आ गोनू झा खाना खयबा लेल आंगन नहि गेलाह, तऽ हुनक पत्नि हुनका बजाबय दलान पर अएलथिन्ह आ उलाहना देलथिन्ह जे हुनका भूख किएक नहि लगैत छन्हि। मुदा गोनू झा तऽ कोनेा आओर युक्ति लगा कऽ  बैसल छलाह। ओ पत्नि सँ गप्प करबाक बहाने हुनको ओहिठाम बैसा लेलथि। एहू बीच पान खयबाक आ कुल्ला करबाक हुनक क्रम चलैत रहल। हुनका पत्नि के सभ असहज लगैत छलन्हि। अकक्षा के ओ कहलथिन्ह 'आब बहुत भेलैक, चलू पहिने खाना खा लीअ फेर पान थुकरैत रहब।Ó गोनू झा कहलथिन्ह, 'अच्छा अहां के जे विचार।Ó ई कहि ओ फेर पान थूकरैत कुल्ला चोरबाक देह पर फेंकला। ओ पत्निक आंचर सँ मुंह पोछि लेलाह। एहि पर हुनक पत्नि तमसा कऽ कहलथिन्ह ''हाँ, हाँ अहाँ ई केलौ, हमर साड़ी खराब कऽ देलहुं।ÓÓ गोनू झा हंसैत कहथिन्ह ''अहां हमर पत्नि रहितौं एतेक छोट बात पर तमसा रहल छी, अहां सँ नीक तऽ एहि झुरमुट मे नुकायल ई दुनू सज्जन पुरुख छथि, जिनिका देह पर हम सांझ सँ एतेक पानक पीक फेंकल आ कुल्ला कएल लेकिन ई दुनु भद्र लोक एको रत्ति खराब नहि मानलाह आ ओहिना चुपचाप बैसल रहलाह।ÓÓ ई सुनैत हुनक पत्नि सबटा बात बुझि गेलथिन्ह। चोरबो जखन ई सुनलक तऽ ओकरा सभ के बुझना गेलई जे गोनू झा हमरा देखि चुकल छथि। ओ दुनु हुनक पैर पर खसि माफी मांगए लागल। गोनू झा चोर के माफ करैत खाना खाय लेल आंगन विदा भऽ गेलाह।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-4289783575775994278?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/4289783575775994278/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=4289783575775994278&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4289783575775994278'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4289783575775994278'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='गोनू झा केर पानक पीक'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-399102437485957814</id><published>2010-01-27T23:11:00.001-06:00</published><updated>2010-01-27T23:14:21.463-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दहेज़'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिपिन बादल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तिलक'/><title type='text'>तिलक : जन्मसिद्ध अधिकार वा विकासक अवरोधक?</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;तिलक 'सोशल स्टेटसÓ आ सामाजिक प्रतिष्ठïाक विषय बनि गेल अछि। सामाजिक स्वीकार्यता प्राप्त छैक एकरा। जे परिवार तिलक नहि लऽ 'आदर्शÓ प्रतिमान स्थापित करैत छथि, हुनका प्रति बहुत रास संशय व्यक्त कएल जायत अछि। सच पुछू तऽ दहेजक के जन्मसिद्ध अधिकारक रूप मे महिमामंडित कएल जा रहल अछि। मुदा तिलक के जन्मसिद्ध अधिकार मानय बला कहियो ई सोचला जे ई प्रथा क्षेत्रीय आ सामाजिक विकास केर कतेक पैघ अवरोधक अछि?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मिथिला मे तिलक बरयाति आ कन्याक द्विरागमन धरि करोड़ो रुपया बह देल जायत अछि। सामथ्र्यवान जतए 40-50 लाख तक एहि नाम पर खर्च करैत छथि ओतए सामथ्र्यहीनो खेत-डीह बेचकेँ खर्च करैत छथि। कखनो सोचल अछि जे यदि रुपयाक सदुपयोग होयत तऽ एत्तेक राशि सँ कोन-कोन प्रयोजन पूर्ण कएल जा सकैत अछि। नि:संदेह बियाहो प्रयोजने ठीक मुदा आडंबरपूर्ण दिखाबा मे जेना कैंचा लुटाएल अछि की ओ उचित वा मानवीय जा रहल अछि? सामाजिक, पारिवारिक आ क्षेत्रीय विकास लेल सार्थक विकल्प ताकबाक आवश्यकता अछि। ई 'अर्थयुगÓ छैक तैं अर्थक अनादर करब विकासक लेल 'अनर्थÓ साबित होयत।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मिथिला मे तिलक प्रथा ब्राह्मïण परिवार मे सबसँ बेसी अछि मुदा आनो जाति मे आब ई सामाजिक प्रतिष्ठïाक विषय बनि रहल अछि। कन्यागत यदि प्रत्यक्षत: खर्च करैत छथि तऽ वरागत सेहो प्रतिष्ठïा अनुरूप खर्च करैत छथि आ ओ पाई हुनको लऽग बचि पबैत छन्हि। कखनो सोचल गेल जे अंतत: ओ पैसा कत्तऽ जाइत अछि, ककरा हाथ मे? एहि बंदरबांट मे के बनैत छथि लाभार्थी? आवश्यकता अछि सजग होयबाक आ नवयुवक-युवतीक केर लगाम अपना हाथ मे लेबाक। तिलक रोकबाक गंभीर आ यथार्थपरक आंदोलनक आवश्यक छै। मुदा के आंगा बढ़त?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मैथिल समाज जाति आ उपजाति मे बंटल छथि। श्रेष्ठï भाव सँ ओत-प्रोत? ई श्रेष्ठïताभाव आ जाति, उपजाति मे बंटल वर्ग समाजक कतेक अहित करैत अछि, इहो सोचनीय अछि। तिलक प्रथाक खात्माक लेल एकरो तोड़ब आवश्यक अछि। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बिना माइंजन आ देवानक जाति ब्राह्मïण अपन आपसी अंतरक संघर्ष मे तेना ओझराएल छथि की सामाजिक विकास मे बड़का अवरोधक होइत रहलाह। अगर एकर व्यावहारिकता के वियाह के रूप मे देखल जाय त किछु मामिला साफ बूझबा जैत।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जाति के संग-संग उपजाति तकरबाद फेर की हैत? उपजाति के सेहो तोड़ी क सह उपजाति बनत? अहि मे दोषी के अछि अई सवाल पर हमरा जनतबे अखन तक सोचल नहि गेल आ फोरवाड के नाम पर शनै:शनै: बेकवाड भेल जा रहल छी। यदि हम मिथिलाक किछु दोसर जाति के उदाहरण लेल जाय तँ यादव जाति मे 1964 सँ दहेज खतम भÓ गेलइ, कारण जे सब गामक माइंजन देवान एकटा बैसार सुंदर विराजीत गाम मे केलन्हि आ फैसला केलन्हि जे एकावन टा टका लऽ वरक दुआरि पर जैब जँ मंजूर होनि त ठीक नहि त ओहि परिवार के समाज मे बाडि़ देबनि। सहजहि दहेज के नामोनिशान नहि रहल।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एहने सन फैसला मिथिलाक कर्ण कायस्थ सेहो लेलन्हि मुदा कर्ण कायस्थ सब सेहो मैथिल ब्राह्मïण जेका अपना के उपजाति मे बांटी चुकल छथि। लेकिन बत्तीस गामक कर्ण कायस्थ श्रोतिय ब्राह्मïण जेका अपनाकेँ उच्च कुलशील क मानी कर्ण कायस्थ के दु उपजाति मे बांटी देलनि बत्तीस गामक भीतर आ बत्तीस गामक बाहर। जाति के फराक फराक उपजाति मे बांटला सँ नोकसान जे परिलक्षित होइत अछि ताहि मे बियाह दान पहिल संकट अछि। बत्तीस गामक भीतर दहेज के प्रचलन नहि अछि आ एकटा नीक वर (आइएएस, आइपीएस सनक वर) के गरीब घर मे एतऽ तक की निरक्षर कनिया सँ वियाहि देल जाइत अछि। ओ अफसर महोदय अपना हिसाबे अपन कनिया के तैयार कÓ लैत छथि। दोसर दिस जखने बत्तीस गाम सँ बहार भेलऊँ की मुश्किले-मुश्किल। कन्यागत अपन स्तर के वर तकबा लेल फिरिसान छथि। यथासाध्य डीह डाबर भरना या बेच कÓ बेटी के सुखी जीवन मुहैय्या करा रहल छथि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बत्तीस गामक भीतर कतहु-कतहु कन्यागतो मजगूत        रहैत छथि। वरक भाग खुलि जाइत छनि। कमो पढ़ला-लिखला उत्तर ससुर या सासू कृपा सँ ढंगगर नौकरी भेटि जाइ छनि आ सुखी जीवनक अभिलाषा पूरा भÓ जाइत छन्हि। सामान्यतया वियाहक नाम पर जे सौदेबाजी पसरल अछि ताहि सँ वंचित रहि जाइत छथि। जे कतहु ने कतहु समाज के सकारात्मक दिशा दैत अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मैथिल ब्राह्मïण आ कर्ण कायस्थ ई दुनू जाति अपन उपजाति के खतम कÓकÓ शर्तिया दहेज के घिसियाकेँ कमला, कोशी आ बागमती के बाढि़ मे भसिया सकैत छथि आ समाज मे नव उदाहरण तथा सकारात्मक दृष्टिï के पसारइ मे एक डेग उठा सकैत छथि। ई नि:संदेह एकटा घृणित प्रतीक दहेज के और पैसार सँ रोकी सकैत अछि।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-399102437485957814?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/399102437485957814/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=399102437485957814&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/399102437485957814'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/399102437485957814'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2010/01/blog-post_27.html' title='तिलक : जन्मसिद्ध अधिकार वा विकासक अवरोधक?'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-1040471201764174048</id><published>2010-01-14T23:20:00.002-06:00</published><updated>2010-01-14T23:28:05.885-06:00</updated><title type='text'>भारतीय संस्कृति मे बियाह</title><content type='html'>भारतवर्ष मे गर्भाधान सँ लै मृत्युपर्यन्त संस्कार धर्मशास्त्रक अनुशासन द्वारा अनुशासित होइत अछि। किन्तु एहि मे विवाह अत्यधिक महत्वपूर्ण अछि। भारतवर्षक जे विवाह बंधन अछि से मात्र दैहिक संबंधहि सँ बांधित नहि अछि अपितु सर्वथा धर्मक ऊपर प्रतिष्ठिïत अछि। कोनहु स्थिति मे ई विवाह बंधन नर-नारीक विलास-व्यसन अथवा आमोद-प्रमोदक अंश नहि बूझल जा सकैत अछि। ऐहिलौकिक जीवनक कये कोन पारलौकिक कार्य मे सेहो यदि व्यक्ति पत्नीशून्य भऽ जाइत अछि तँ ओकर कोनो यज्ञादि अनुष्ठïान मे अधिकार नहि रहि जाइत छैक। फलत: भारतीय संस्कृति मे विवाह संबंध एक अच्छेद्य संबंध कहल जाइत अछि। विवाहक अवस्थाक संग अन्य कोनो संबंध नहि मानल गेल अछि। ई संबंध जन्म-जन्मांतर मे सेहो अटूट रहैत अछि। जीवित स्वामीक संतोषार्थ कतिपय स्थल मे कतेको रमणी लोकनि बहुत किछु कऽ सकैत छथि किन्तु स्वामीक परलोक गमनक बाद हुनक नामोच्चारण मे सेहो कृपणता आबि जाइत छनि। किन्तु मृत स्वामीक विस्मरणक तँ चर्चे नहि हुनका हेतु आश्चर्यजनक त्याग भारतवर्षहि मे संभव अछि। स्वार्थक वशीभूत भऽ ककरो लेल किछु करब एक साधारण विषय अछि। परन्तु भारतीय नारीक त्याग सतीदाह सँ प्रत्यक्ष भऽ उठैत अछि। यद्यपि किछु व्यक्ति फतिंगाक दीपक प्रेम मे जरि मरब सँ एकर तुलना कैलनि अछि किन्तु वास्तविकता एहि सँ बहुत फराक अछि। एहि विषय मे भारतीय कथनक अपेक्षा अन्य व्यक्तिक उद्ïगारहि विशेष संवाल हएत। पठानक शासनकाल मे गयासुद्दीन जखन दिल्लीक सिंहासन पर आरूढ़ छल ओही समय पारस मे 'अमीर खुशरूÓ नामक महाकविक दिल्ली दरबार मे आगमन भेल छलनि।&lt;br /&gt;ई मुसलमान भेलहुँ पर अतिशय सहृदय छलाह। सव्रप्रथम सतीदाह देखिवाए वित्मयापन्न भऽ गेलाह। सतीदाहक कथा सुनतहिं ओ ओतए उपस्थित होइत छलाह एवं ओहि प्रसंग के देखिओ श्रद्धा सँ अवनत भऽ जाइत छलाह। ओ अनुभव करैत छलाह जे प्रेमक एवेक पैघ उदाहरण असंभव अछि। हुनक कहल छल जे प्रज्वलित अग्नि मे जरिकए भस्म होमए बला कीड़ाक अभाव नहि अछि मुदा मृत व्यक्तिक चिता पर जरिकए भस्म हएब सर्वथा भिन्न अछि। ताहिं कीड़ा फतिंगाक संग एकर तुलना सर्वथा अनुचित अछि। स्त्रीक लेल पतिक आग्रह योग्य वस्तु थीक किन्तु मृत स्वामीक लेल चिता पर अपन शरीरक त्याग करब सांस्कृतिक महान आदर्श थीक। कीड़ा-फतिंगाक लेल आग्रहक वस्तु दीपशिखा अछि। जरैत दीपशिखा मे पडि़कए कीड़ा-फतिंगाक अपन प्राण विसर्जन करैत अछि मुदा दीपशिखा मिझा गेला पर ई कीड़ा-फतिंगा ओकर समीप सेहो नहि जाइत अछि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''निस्वत सती से नादो पतंग के तासे&lt;br /&gt;इसमें और उसमें इलाका भी काठी&lt;br /&gt;यह आग में जलती है मुर्दे के लिए&lt;br /&gt;वह बुझी शमा के गिर्द फिरता भी नहीं॥ÓÓ&lt;br /&gt;—अमीर खुसरो&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;एहि शब्द सँ एही ठामक वैवाहिक संबंधक उत्कर्ष ज्ञापित होइत अछि।&lt;br /&gt;कतिपय गृह्यïसूत्र मे आरम्भ मे विवाहे संस्कार वर्णन भेटैत अछि। कारण गर्भाधान सँ लै जतेक प्रकार संस्कारक वर्णन उपलब्ध होइत अछि ओहि संस्कार सभक मूल आधार गार्हस्थ्य जीवनहि अछि। गार्हस्थ्य जीवनक प्रथम चरण विवाह संबंध थीक। वैदिक काल मे, जखन आजुक कतिपय संस्कारक चिह्नï मात्रो भेटैत अछि। वैदिक कालक ब्राह्मïणक लेल अपन पत्नीक संग मधुर कांत प्रेममय जीवन नितांत प्रिय छलन्हि। सामाजिक आवश्यकता केँ दृष्टिï मे राखि विवाह मात्र धार्मिक परम्पराक अभिन्न अंगेटा नहि अपितु अनिवार्य अंग एवं विशिष्टï कोटिक यज्ञ मे आबि गेल छल। विवाह हीन व्यक्ति यज्ञहीन व्यक्तिक कोटि मे परिगणित होइत छल। एतबए नहि विवाहक बिना मनुष्य अंगहीन बूझल जाइत छल। भगवान शंकर के आइयो हमरा लोकनि अर्धनारीश्वरक रूप मे अर्चना करैत छी।&lt;br /&gt;तैत्तरीय ब्राह्मïण मे एहि बातक संकेत भेटैत अछि। ओतए कहल गेल अछि। जे एकाकी पुरुष अपूर्ण अछि तथा पत्नी ओकर अर्धभाग थीक। एहि तरहेँ विवाह केँ एतेक उच्चतम भूमि पर अवस्थित कयल गेल अछि जकर आधार पर मनुष्य मात्र यज्ञेक हेतु अधिकृत नहि होइत अछि अपितु अपन शरीरक आधा अंग केँ सेहो पूर्ण कऽ पबैत अछि। जतेक आघ्रम अछि ओहि सभ आघ्रमक आधार गृहस्थाश्रम मानल जाइत अछि। तीन ऋणक कल्पना कए ओहि तीनू सँ मुक्तिक लेल विवाह एक अपरिहार्य अंग रहि जाइत अछि। ओहि मे ब्रह्मïचर्यक द्वारा ऋषि ऋण सँ विमुक्ति, यज्ञक द्वारा देवऋण सँ एवं सन्ततिक द्वारा पितृऋण सँ विमुक्ति कहल गेल अछि। पितृ ऋण सँ विमुक्तिक लेल विवाह संस्कारक अतिरिक्त अन्य कोनो साधन निर्दिष्टï नहि अछि। स्मृतिकाल मे सँ वैवाहिक बंधन प्रत्येक व्यक्तिक लेल आवश्यक मानल जाइत छल। ब्रह्मïचर्य श्रमक बाद गृहस्थाश्रम मे प्रवेश नितांत आवश्यक छल। पुराणकाल मे तँ अनेक ऋषि लोकनिक कथा सभा एहि सत्यक साक्षीक रूप मे उपलब्ध होइत अछि।&lt;br /&gt;मार्कण्डेय पुराण मे गार्हस्थ धर्मक प्रशंसा करैत मदालसा द्वारा कहल गेल अछि जे गृहस्थ धर्मक द्वारा अशेश जगतक पालन करवा मे मनुष्य सक्षम होइत अछि। पितर, मुनि, देवता, भूत, मनुष्य, कृमि, कीट, फतिंगा, पक्षी, पशु, असुर सभ गृहस्थ द्वारा उपजीवित होइत छथि तथा तृप्ति लाभ करैत छथि।&lt;br /&gt;उपर्युक्त विश्लेषण सँ ई सिद्ध होइत अछि जे भारतीय संस्कृतिक अनुसार विवाह संस्कार एक एहन महत्वपूर्ण संसकार थीक जगर आधार पर त्याग ओ प्रेम वास्तविक स्वरूप उपस्थित होइत अछि। एहि ठामक विवाह संबंध कामना एवं भोग सँ ऊपर उठि त्याग सबल भित्ति पर अवस्थित अछि। नारीक पतिव्रत्य एवं मृत पतिक शवक संग अपन विसर्जन एक अनिर्वचनीय अविच्छन्न प्रेम धाराक ज्वलन्त उदाहरण अछि।&lt;br /&gt;स्मृति आदि मे विवाहक भेदक निरूपण करैत आठ प्रकारक विवाहक स्वीकृति देल गेल अछि। किन्तु उत्कर्षापकर्षक आधार पर दू प्रकारक विवाहक कतोक स्थान मे समर्थन उपलब्ध होइत अछि। उक्त प्रकार केँ दू भाग मे विभक्त कएल गेल एक प्रशस्त एवं दोसर अप्रशस्त। प्रथम चारि प्रशस्त एवं अपर चारि अप्रशस्त। राक्षस एवं पैशाच तँ कोनहुँ प्रकारे वैध नहि मानल गेल अछि। मनुस्मृति मे पैशाच विवाह कन्या पर छल कपटक द्वारा अधिकार प्राप्त करैत छल। सुप्त, मत एवं अचेतन अवस्था मे कन्याक हरण पैशाच विवाह कहल जाइत अछि। वस्तुत: ई विवाह उच्छृंखलता एवं असभ्यताक प्रतीक थीक।&lt;br /&gt;द्वितीय विवाह राक्षस विवाह थीक। ई सेहो कनैत कलपैत कन्याक ओकर परिवार केँ क्षत-विक्षत कए बलपूर्वक हरण राक्षस विवाह थीक। दुनू विवाह मे कन्याक अथवा ओकर अभिभावकक स्वीकृति नहि रहैत अछि। एक मानवक लेल राक्षसी एवं पैशाची वृत्ति जहिना हेय अछि तहिना ओहि संस्कृतिक प्रतीक ई विवाह सेहो हेय थीक। दोसर शब्द मे युद्धक द्वारा पराजित राजाक वस्तुजातक सदृश स्त्री लोकनिक उपलब्धि कहल जा सकैत अछि। यद्यपि ई दुनू विवाह परम्परा महाभारत एवं पुराण सँ प्रमाणित अछि। बल एवं पराक्रमक प्रदर्शन कए कन्याक हरण भीष्म काशी राजक तीनू कन्याक कैलनि छल। किन्तु एतवा सत्य थीक जे ओहि हरणक बाद सेहो मानवताक अथवा भारतीय संस्कृति मूलाधार मे कुठाराघात नहि कैलनि। ओहि अपहरित कन्या सभक इच्छाक अनुरूपहि विवाह कैल गेल। तेसर कन्याक अनुरूप वरक प्राप्ति नहि होएबाक कतेक दारुण परिणाम भेल से ऐतिहासिक प्राचीन भारतीय इतिहासक अनुशीलन सँ हमरा लोकनि केँ विदित होइत अछि। भीष्म केँ एहि औद्धत्यक लेल अपन गुरु परशुरामक संग सेहो युद्ध करए पड़लनि। एतबए नहि वैह कन्या शिखण्डीक रूप मे एहि वीरक अंतिम लीलाक साक्षी सेहो बनलीह। तहिना परवत्र्ती काल मे संयुक्ताक पृथ्वीराजक द्वारा हरण वर्णित भेटैत अछि किन्तु ई कन्याक इच्छाक विरुद्ध नहि छल।&lt;br /&gt;गंधर्व विवाह मे माता-पिताक इच्छा गौण रहैत छलनि तथा वर-कन्याक इच्छाक प्रधानता रहैछ। कन्या स्वयं अपन पतिक चयन करैत छलीहन करैत छलीह यैह गौतम एवं हारितक अनुसार गांधर्व विवाह थीक। किन्तु मनु एकरा कामनाक वशीभूत भए कन्या एवं वरक परस्पर संयोग कहलनि अछि। ई विवाह अतिशय प्रशस्त मानल गेल अछि। शकुंतला तथा दुष्यंतक विवाह तथा एही प्रकारक अन्य विवाह जे स्वयंवरक आधार पर होइत छल सेहो एहि कोटि मे अबैत छल। सूक्ष्म दृष्टिï सँ विचार कयला पर महाकवि कालिदास आदिक दृष्टिï मे ई विवाह अतिशय प्रशस्त नहि छल। कामनाक प्रबलताक कारणेँ स्वेच्छाचारिताक प्रतीक भए हानिक भूमि सैह बनि जाइत अछि। महाकविक दृष्टिï मे विवाहक पूर्व तपस्या अथवा त्याग नितांत अपेक्षित छल। काम दहनक बादेक विवाह कामतृप्तिक साधन होइत छल तथा अर्धनारीश्वरक रूप धारण कऽ सकैत छल। शकुंतला अनयासहि दुष्यंतक वरण कयलनि, बाद मे अतिशय दु:ख भोगि कऽ पुन: तपस्याक द्वारा पवित्र भए तखन दुष्यंत केँ प्राप्त कैलनि। पार्वती तपस्याक बादे शिवक प्राप्ति कैलनि तँ ओ प्रेम अक्षुण्ण बनल रहल। एहि तरहेँ पुराणक गाथ सभ मे गांधर्व विवाहक अतिशय प्रचलन भेलहु पर त्यागक आवश्यकता पर जोड़ देल गेल अछि।&lt;br /&gt;चतुर्थ विवाह आसुरक विवाह थीक। एहि विवाह मे धनक प्रधानता रहैत छल। कन्याक संबंधी सभ केँ धन प्रदान कए स्वच्छंदतापूर्वक विवाह करब आसुर विवाह थीक। महाभारत मे कुरु राजकुमार लोकनिक लेल क्रय द्वारा पत्नी सभ केँ प्राप्त कैल गेल छल। मैत्रायणी संहिताक अनुसार क्रीता पत्नी अविश्वसनीय मानल गेल अछि।&lt;br /&gt;पंचम विवाह प्रजापत्य थीक। ई विवाह धार्मिक एवं सामाजिक कत्र्तव्य सभक पालन केँ प्रधान बनाय पिता कन्याक पाणिग्रहण योगय वरक संग करैत छलाह। एहि विवाह मे धर्माचरणक उपदेश देल जाइत छल।&lt;br /&gt;षष्ठï विवाह अछि थीक। एहि विवाह मे कन्या द्वारा वर सँ यज्ञादि धर्म विहित कर्म केँ सम्पन्न करबाक हेतु एक अथवा दू गोमिथुन प्राप्त करैत छलाह। एहि विवाह मे सेहो गायक ग्रहण आवश्यक छल किन्तु ओ गाय पुन: वर केँ दऽ देल जाइत छल। अत: ई कन्याक मूल्य नहि कहल जा सकैत अछि। वीर मित्रोदय मे एहि विवाहक वर्णन करैत यैह निर्दिष्टï कैल गेल अछि जे एहि विवाहकक क्रम मे कन्या पक्ष केँ प्राप्त गोमिथुन पुन: समर्पित कैल जाइत छल। अत: एहि विवाह मे मूल्यक कोनो प्रश्न नहि उठैत अछि।&lt;br /&gt;सप्तम विवाह दैव विवाह एवं अष्टïम विवाह ब्राह्मïविवाह थीक। ब्राह्मï विवाह मे पिता विद्वान्ï तथा शील सम्पन्न वर केँ स्वयं आमंत्रित कए विधिवत्ï सत्कार पूर्वक दक्षिणाक संग यथाशक्ति आभूषणादि सँ अलंकृत कए कन्याक दान करैत छलाह। ऋग्वेद मे वर्णित सोमक संग सूर्याक विवाह पूर्व उदाहरण रूप मे स्वीकार कैल जा सकैत अछि। आइ एहि विवाहक विकृत रूप समाज मे प्रचलित अछि जाहि मे अर्थ केँ प्रधान राखि निन्दनीय टका गनैबाक प्रथा प्रचलित अछि। दैव विवाह मे पिता अलंकृत कन्या केँ आरब्ध यज्ञ मे पौरोहित्य कार्य सम्पादन कैनिहार ऋत्विज केँ दैत छल। बौधायनक अनुसार कन्या दक्षिणाक रूप मे देल जाइत छल। दैव यज्ञक अवसर पर कन्याक दान लेल सँ दैव विवाह कहल जाइत अछि।&lt;br /&gt;पुराण युग में एवं संस्कृत साहित्यक काव्य परंपराक मध्य युग मे अंतर्जातीय विवाहक प्रचलन छल। कविवर राजशेखरक पत्नी कवियत्री अवन्तिसुंदरी क्षत्रिय कन्या छलीह। राजतरंगिनी मे एक तरहेँ कतेको उदाहरण उपलब्ध होइत अछि किन्तु परवर्ती काल मे अंतर्जातीय विवाह प्राय: अस्वीकृतहि मानल गेल अछि। आइ सेहो वर एवं वधूक योगयता तथा कुल आदिक परीक्षण कए विवाह यज्ञ सम्पन्न कैल जाइत अछि। एहि यज्ञ मे गणित विद्या विशारदक अनुसार शुभ मुहुत्र्त स्थिर कए देव देवीक आराधनक बाद पिता वरक हाथ मे कन्याक दान करैत छथि। परंपरानुसार कतिपय विधि-विधानक निर्वाह तथा मंगलाचार होइत अछि। विवाह कालक उक्ति सँ ई संबंध वर एवं वधूक जीवन मे एक बड़ पैघ सामाजिक संक्रमणक प्रतीक थीक। विवाह संबंध भोग-विलासक अथवा असंयत जीवनक एक मार्ग नहि अपितु जीवन मे एक महत्ï उत्तरदायित्वक वहन करब थीक। 'मंडपÓ आदि शब्द केँ देखला सँ एवं ओकर निर्माण मे कतिपय व्यक्तिक सहयोगक उपलब्धि सँ एहन-सन प्रतीत होइत अछि जे समाज मे समर्थ व्यक्ति सभक द्वारा एक गृह निर्माण पूर्वक वर-वधु केँ गाहर्यस्थक जीवन मे प्रवेश कराए कत्र्तव्यक भार वहनक लेल प्रेरित कएल जाइत छल। ओ लोकनि गार्हस्थय जीवन मे प्रवेश कए पितृ ऋणक संग-संग आनो कतेको ऋण सँ उद्धार प्राप्त करैत छलाह। प्राचीन कुल केँ छोडि़ कऽ आएल नववधू अपन त्याग एवं कुलीनता सँ ओहि घर पर अधिकार प्राप्त करैत छलीह तथा सभ कार्य मे सहधर्मिणीक स्वरूप निर्वाह करैत छलीह। अत: भारतीय संस्कृति मे विवाह यज्ञ अतिशय पवित्र तथा त्यागक आधारशिला थीक।&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;(लेखक डा. लक्ष्मण चौधरी 'ललितÓ , ललित नारायण मिथिला विश्विद्यालय दरभंगा मे मैथिली विभागाध्यक्ष रहि चुकल छथि।)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-1040471201764174048?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/1040471201764174048/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=1040471201764174048&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1040471201764174048'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1040471201764174048'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2010/01/blog-post_14.html' title='भारतीय संस्कृति मे बियाह'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-6769001259201295052</id><published>2010-01-09T00:52:00.001-06:00</published><updated>2010-01-09T00:55:10.420-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विवाह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैथिल संस्कार'/><title type='text'>श्रोतिय योग आ जयवारक वियाह पद्धति मे अंतर किएक?</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;वियाह एकटा, एहन संस्था छइ जे समाजक नैसर्गिक आवश्यकता अछि। मैथिल ब्राह्मïण अपना मे श्रोती, योग आ जयवारक नाम पर अलग-अलग पद्धति विकसित केने छथि। जाहि सँ मैथिल ब्राह्मïण अपन उपजाति के द्वन्द्व मे फंसल छथि। श्रोतिय ब्राह्मïण पच्चीस हजार जनसंख्या मे अधिकार माला लÓ घूमैत रहति छथि। हुनका पछवारि परक योग वर नहि चाहियइन। बहुत रास एहनो घटना भेटत जे श्रोती योग (भलमानुस) के झगड़ा मे एकटा सुंदर कनिया अपंग-अपाहिजक संग इच्छाक विरुद्ध लागी जाइये कारण जे कम जनसंख्या हेवाक कारणे तथा मिथिला मे प्रचलित पंजी व्यवस्था के परिणामस्वरूप अधिकार माला मे कनिया के मुताबिक सुयोग्य वर नहि छल आ कनिया के योग्यतानुसार पछवारि पार जाएल नहि जा सकैत अछि। कारण जे जाति टूटि जेतान्हि। आनो सोझे विवाह पद्धति के अंतर के लÓ बात करी तÓ मूल संरचना एकहि छैक खाली फराक बूझना जाइ छइ। ताहि मे सामाजिक कारण सेहो जिम्मेवार होइत रहल। जेना बरियाती वियाहक वेदो के सामने अहोरात बैसबाक प्रचलन। ई प्रचलन श्रोतिय ब्राह्मïण मे अखनो प्रचलित छैक। मूलत: बरियाती गवाह होइत छई। सामाजिक गवाह किएक त कोर्ट कचहरी के व्यवस्था नहि रहै। सरकारी पंजीकरण सेहो नहि। हाल मे फ्रांस के किछु दार्शनिक के धारणा बनलनि अछि जे वियाह संस्थाक निर्माण यौन अराजकताक कारणे पसरल बीमारी सँ भेल। संभवत: एहने किछु समझ के परिणाम सँ विवाह संस्कार के उत्पत्ति भेल। तैं गवाह के सेहो निर्माण कैल गेल की अमूक स्त्री अमूक पुरुष सँ जुड़ल छथि आ अमूक पुरुष अमूक स्त्री सँ। अत: दुनू गाम वर आ कनिया के दिस सँ बरियाती-सरियाती के अनौपचारिक गवाह होइत रहल ताकि सामाजिक अराजकता के बढ़ावा नहि भेटइ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;श्रोतिय ब्राह्मïण मे कम जनसंख्या हेबाक परिणाम रहल या परम्परा के प्रति जुड़ाव से नहि स्पष्टï अछि मुदा बरियाती अखनो वेदी पर बैसेत छथि। एम्हर पछवारि पार मे किछु ऐहन घटनाक्रम होइत रहलइ जाहि सँ बरियाती के वेदी पर बैसेवाक प्रथा खतम भ गेल। निसंदेह अहि तर्क सँ दुनू गोटे फराक भÓ गेला। छवारि पार मे सेहो किछु विधि मे अंतर देखबा मे अबैत अछि जाहि सँ योग (भलमानुस) आ जयवार के पद्धति मे भिन्नता भÓ गेल। बरियाती के अनउने खेनाइ पात पर नोन द कÓ खुवेबाक प्रथा श्रोती आ योग दुनू मे छन्हि आ एक सांझक भोजन के इंतजाम मुदा जयवार मे तीन सांझ बरियातीक भोजन नोनगर तीमन-तरकारी आ दोसर-तेसर सांझ माछ मउस सेहो केर प्रथा छनि। बरियातीक स्वागते सँ फर्क शुरू भÓ जाइ छइ। श्रोती आ जयवार दुनू मे हथघड़ी के प्रथा छनि मुदा जयवार लोकनि हथपकड़ा कहै छथिन्ह मुदा पढ़ल-लिखल जयवार परिवार मे हथघड़ी कहल जाइत छइ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;भलमानुस लोकनि बरियाती के रस्ता देखेबाक वास्ते गाम के सिमान पर कनिया पक्षक लोक के ठाढ़ केने रहइ छथिन्ह। तखराबाद श्रोती मे कुमरम के खोज छइ आ वरक केश कटेबाक प्रथा। एक बात आउर जे वर अपन हाथ मे दोपटा लपेटने मुँह झपने रहइ छथि। परिछन सँ ल कÓ चतुर्थी तक। ई प्रथा आब मात्र श्रोती मे छनि। दोसर इ जे श्रोती ब्राह्मïण मे कनिया वेदी या कोनो विध काल मे आँखि मुनने रहै छथिन्ह मुदा मुँह उधार रहै छन्हि। पछवारि पार मे विधकरी अपन आँचर सँ कनिया के मुँह झपने रहैत छथि। वियाह सँ चतुर्थी धरि कनिया आ वरके एक घंटा कोहबर मे सुतबाक विध छइ ताहि मे विधकरी संगे सुतल रहै छथिन्ह। शेषकाल वर विश्रामक घर मे रहै छथि आ कनिया कोहबर मे। ओना विधकरी के कनिया वरक बीच मे सूूतबाक प्रथा किछुए वर्ष पहिने भलमानुस आ जयवार मे खतम भेलनि। मुंहबज्जीक परम्परा श्रोतिये टा निर्वाह कÓ रहल छथि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ओना कने-मने वेदी पर सेहो अंतर मे जेना श्रोतिय लोकनि अपन सब किछु जेवर के देबाक रहइ छनि से वेदिये पर राखि दइ छथिन्ह जे किछु छथिन्ह कारण वेदी तर सँ दुरागमन क रेवाज सेहो पसरि गेलइ अछि। लेकिन वेदी तर सँ दुरागमन नहि भेला पर घसकट्टïी तथा वेदी उखाड़बा काल मे रूसल जमाय के मनेबाक वास्ते एक एकटा चीज वेदी पर सँ अलग राखि देल जाइ छन्हि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;चतुर्थीक सौजन मे कोनो अंतर पैदा नहि भेल अछि। तखन श्रोती मे ज कोनो वर के विदाइ होइ छन्हि त कनियाँ हुनका संगे कनैत गामक सिमान तक जाइ छनि या घरक लग पासक पोखरिक घाट तक। फेर कनिया वापस। आब ओना अधिसंख्य श्रोतिय ब्राह्मïण परिवार मे वेदिये तर सँ दुरागमन हुउÓ लागल अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;किछु-किछु दुरागमन सँ भडफ़ोड़ीक दौरान विध मे सेहो अंतर भÓ गेल अछि। जेना भडफ़ोड़ोक भोज मे कनिया चीनी परसै छथि आ पछवारि पार मे एकहि हाथे माछ बनैनाइ, कटनाइ आदि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;सवाल छइ जे इ सब अंतर भेल परन्तु एकर किछु कारणो हेबाक चाही जाहि द्वारे ई अंतर विकसित भेल। एकर मूल मे ई कारण रहल जखन पंजी व्यवस्था के निर्माण भेलाइ आ श्रोती योग के वर्गीकरण भेलइ। त किछु-किछु विध के फराक करऽ अपना-अपना के फराक साबित करÓ लगला। दोसर जे अपन-अपन विशिष्टïता के कारण एक दोसर के ओत जान-आन सेहो बंद भÓ गेल परिणाम भेल जे किछु विध बदली गेल। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-6769001259201295052?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/6769001259201295052/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=6769001259201295052&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6769001259201295052'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6769001259201295052'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2010/01/blog-post_09.html' title='श्रोतिय योग आ जयवारक वियाह पद्धति मे अंतर किएक?'/><author><name>बिपिन बादल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16014292250857946792</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_JuKwUmjXx6s/SXlaA2WUQvI/AAAAAAAAABM/QK4ZRAXuODU/S220/badal+ji.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-4219665369784442795</id><published>2010-01-07T00:19:00.000-06:00</published><updated>2010-01-07T00:20:25.797-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विवाह'/><title type='text'>वियाह : स्वरूप, संकल्पना आ सिद्धांत</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;पाश्चात्य चिंतन ओ विचारक अनुसार विवाह एक सामाजिक व्यवस्था अछि। स्वतंत्र यौनाचार के रोकए वास्ते जे मानव सभ्यताक विकासक संग अस्तित्व मे आयल। परञ्च भारतीय चिंतन व दर्शन के अनुसार विवाह एक धार्मिक कृत्य अछि। जाहि नींव पर वर्णाश्रम धर्म ओ वर्ण व्यवस्थाक महल ठाढ़ अछि ओहि आधार पर समस्त हिन्दू दर्शन टिकल अछि।  चारि वर्गक (ब्र्राह्मïण, क्षत्रिय, वैश्य ओ शूद्र) उत्पत्तिक समान चारि आश्रमो (ब्रह्मïचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ ओ संन्यास) के उदï्गम भारतीय मनीषी-ब्रह्मïा सँ मानैत छथि। तैं मिथिला मे आइयो ई कहबी प्रचलित अछि कि विवाह, जन्म ओ मरण विधिक हाथ मे छैक। चारि आश्रम मे सर्वतोभावेन महत्व। गृहस्थ आश्रम के देल गेल अछि। जेना सभटा नदी समुद्र मे जाकऽ आश्रय ग्रहण करैत अछि तहिना सब आश्रयक मनुष्य गृहस्थे आश्रम मे आश्रय प्राप्त करैत छथि। और एहि गृहस्थ आश्रम क मूल मे अछि स्त्री-पुरुषक संयोग विवाह संस्कार द्वारा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वैदिक साहित्य मे यद्यपि चारि आश्रमक स्पष्टï उल्लेख नहि भेटैत अछि परञ्च वैदिक संहिताक अतिरिक्त ब्राह्मïणक ग्रंथ, आरण्यक उपनिषद आदि मे चारि आश्रमक सत्ताक स्पष्टï संकेत भेटैत अछि। तैतरीय ब्राह्मïण के अनुसार प्रत्येक मनुष्य तीन ऋण लऽक उत्पन्न होइत अछि देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृऋण। पितृ ऋण सँ मुक्ति हेतु आवश्यक छैक कि मनुष्य विवाह कय संतानोत्पत्ति करे एवं ओकर उचित पालन-पोषण करे। ऋग्वेद के अनुसार विवाहक तीन टा मुख्य प्रयोजन अछि—1। वीर एवं सुयोग्य संतानक प्राप्ति तथा संतानक द्वारा अमरत्वक प्राप्ति। 2. धर्मक पालन-किएक तऽ कोनो याज्ञिक अनुष्ठïान पत्नी के बिना पूर्ण नहि हैत। 3. रति या इन्द्रिय सुख। उपनिषद इन्द्रिय सुखक तुलना ब्रह्मïानन्द सँ करैत अछि। आगा चलिक मनुजी विवाहक चारिम प्रयोजन स्वर्गक प्राप्ति (अपनो लेल तथा पितरक लेल) बतवैत छथि। अतएव संतान, धर्मकार्य, रति सुख और स्वर्गक प्राप्ति हेतु प्रत्येक मनुष्य के विवाह संस्कार आवश्यक मानल गेल। यद्यपि वैदिक काल मे आजन्म ब्रह्मïचारिणी कन्याक एकाधटा उदाहरण भेटैत अछि। परन्तु रामायणकाल मे कन्याक विवाह अनिवार्य मानल जाइत छल तथा कन्याक वैवाहिक जीवन के सफल एवं सुखमय बनैवाक हेतु हुनक अभिभावक पूर्ण प्रयत्न करैत छलाह। प्रारंभ मे कन्या के स्वयं वर चयन कर के अधिकार छलैन्ह किएक तऽ स्वयंवरक प्रथाक प्रचलन छल। किन्तु रामायण काल मे कन्याक पतिवरण मे स्वतंत्रता प्राप्ति नहि छल। स्वयंवरक उल्लेख होइतो, एहि मे अभिभावक इच्छाक सहमति आवश्यक छल।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;विवाह संस्कारक संपूर्ण विधि संपादन हेतु ऋषि-महर्षि द्वारा विधि ओ विधान निर्धारित कैल गेल जाहि मे वर-वधू क उम्र, कुल, देशकाल सभ पर विस्तृत चर्चा केल गेल अछि। (नारद स्मृति, पराशर स्मृति, मनुस्मृति आदि) मिथिला मे याज्ञवल्क्य स्मृतिक प्रधानता रहल। विवाह संबंध निर्धारित करैत काल ई ध्यान राखैत जाइत छल कि वर ओ वधू सदृश हो अर्थात्ï गुण कर्म ओ स्वभाव मे वर-वधू मे समानता हो। कुलक समानता, शील स्वभावक सदृशता, शरीर एवं रूपक सदृशता, आयुक अनुकूलता, विधाक सदृशता, आर्थिक स्थितिक समानता आदि पर विचार कैल जाइत छल। कुलक बहुत महत्व देल गेल छल। कुल परिवार या वंश गुण दोष संतानो मे अवैत छैक तैं विवाहक संबंध निर्धारण मे एहि बातक विचार संपूर्णता सँ कैल जाइत छल।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;विवाह अपने वर्ण वा जाति मे संभव छल। परञ्च सगोत्रिय विवाह निषिद्ध छल। गोत्र कुल व परिवारक प्रतीक छल। एक गोत्र मे उत्पन्न सब व्यक्ति परस्पर भाई-बहिन के संबंध मानैत छल तैं सगोत्रिय विवाह वर्जित छल। एकर अतिक्रमण के प्रमाण भारतक अन्य भाग मे यदा-कदा देखाइ परैत अछि। परन्तु मिथिला मे सगोत्रिय विवाहक प्रमाण अपवादो स्वरूप नहि देखाइ पड़ैत अछि। बहुपत्नी विवाहक प्रमाण अपवादो स्वरूप नहि देखाइ पड़ैत अछि। बहुपत्नी विवाह क प्रचलन नहि छल। यद्यपि ऋषि याज्ञवल्क्य के दू पत्नी (मैत्रेयी व कात्यायनी) छल परञ्च समाज मे इ प्रथा प्रचलित नहि छल। मिथिला त्यागक संस्कृति मे विश्वास करैत छल। पुरुष एक पत्नीव्रत तथा स्त्री पातिव्रत्य धर्म के पालन केनाइ अपन जीवनक सार्थकता मानैत छल। पातिव्रत्य धर्म के अनुपम उदाहरण जगत जननी सीता के वैवाहिक जीवन मे देखल जाइत अछि, जे संसारक इतिहास मे भूतकाल सँ लऽक आद्यावधि समस्त मानवजाति के लेल अनुकरणीय मानल गेल। धर्मशास्त्रक विधानक अनुसार कन्याक रजस्वला होबय सँ पूर्व विवाह कऽ देवक चाही एकर ध्यान रखैत बाल विवाहक प्रचलन छल। पत्नीक मृत्युक उपरांत पुनर्विवाह क व्यवस्था छल। विधवा विवाहक अनुमति छल परन्तु उच्च जाति मे एकर उदाहरण नहिये टा भेटैत अछि। भारतक अन्य भाग मे नियोग आदि क व्यवस्था कतिपय स्थिति मे मान्य छल परञ्च मिथिला मे नियोग द्वारा संतानोत्पत्तिक उदाहरण नहिए टा भेटैत अछि। पति व पत्नी कोनो एक दोसर के त्यागि नहि सकैत छल और एहन कुकर्म के वास्ते कठोर दंड के व्यवस्था छल। वैश्य व शूद्र जाति मे महिला मे पुनर्विवाहक व्यवस्था छल।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मुगल शासनकाल के अबैत देरी मिथिला मे बहुपत्नी विवाहक प्रचलन प्रारंभ भऽ गेल। कुल के मर्यादा क रक्षाक नाम पर कुलीन प्रथाक प्रचलन भेल तथा एक पुरुष के दस-बीस कन्याक संग विवाह के प्रचलन मिथिला मे प्रारंभ भेल। कालांतर मे सामाजिक चेतनाक परिणाम स्वरूप क्रमश: ई प्रथा समाप्त भेल। संपूर्ण हिन्दू समाजक भांति मिथिला मे सेहो इ मान्य छल कि विवाह संबंध जन्म जन्मांतर के लेल होइत छल। तैं विवाह-विच्छेदक उदाहरण (पत्नी द्वारा पति के परित्याग वा पति द्वारा पत्नी के परित्याग) नगण्य अछि। विवाह के अनेक प्रकार के वर्णन जे धर्मशास्त्र मे वर्णित अछि ताहि मे आर्ष, दैव विवाह के प्रचलन मात्र मिथिला मे छल।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-4219665369784442795?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/4219665369784442795/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=4219665369784442795&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4219665369784442795'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/4219665369784442795'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2010/01/blog-post_07.html' title='वियाह : स्वरूप, संकल्पना आ सिद्धांत'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-6979268378435890930</id><published>2010-01-02T02:47:00.001-06:00</published><updated>2010-01-02T02:50:12.749-06:00</updated><title type='text'>अपरिहार्य आत्म मंथन</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;वियाह व्यक्तिक संस्कारक हिस्सा मानल जाइत छैक। कहल जाइत छैक जे वियाह स्वर्ग मे तय होइत अछि। दू प्राणीक तन-मन आ आत्माक मिलन होइत अछि ई। एगो ऐहन बंधन जाहि मे व्यक्ति स्वयं बन्हाय चाहैत छैक। वियाह केँ गृहस्थ जीवनक आधार मानल जाइत अछि। कहल गेल अछि सफल गृहस्थ जीवन बीताबय बला लोके मोक्ष प्राप्त कऽ सकैत अछि आ स्वर्ग जा सकैत अछि। गृहस्थ जीवन मे जीवनक सभ भाव, दशा रस आ ज्ञानक रहस्य नुकायल अछि। तैं एकरा मानव लेल अपरिहार्य बना देल गेल अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वियाह पवित्र बंधन अछि। सुख-दु:ख मे एक-दोसरक संग नहि छोड़बाक प्रण लैत छथि वर-कन्या। साक्षी बनैत छथि अग्निदेव सहित भगवान। एकरा यज्ञ मानल गेल अछि, पवित्र अनुष्ठïान। कन्यादान सबसँ पैघ दान अछि। वियाह मे 'वरÓ मंत्र पढ़ै छथि आ 'कन्याÓ केँ 'पत्नीÓ के रूप मे स्वीकार करैत छथि। कन्याक अनुमोदन लेल जाइत अछि़? पत्नी रूप मे स्वीकार करबाक प्रयोजन की? तँ कि वियाह 'संस्थागतÓ होयबा सँ पूर्व उन्तुक्त यौनाचार रोकवाक साधन के रूप अस्तित्व मे आएल? कम सँ कम भारतीय दर्शन आ संस्कृति मे एहि पश्चिमी सोच प्रतिबिम्ब नहि भेटैत अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पहिने स्वयंबर होइत छल, ई नारीक सामाजिक स्थिति पर प्रकाश दैत अछि। बाद मे स्वयंबर शर्त सँ जुड़ल आ फेर ओहि मे कन्याक अभिभावक हस्तक्षेप होमय लागल। सीताक स्वयंबर मे शिव-धनुष तोड़बाक शर्त जनक केर छलन्हि। गौरीक वियाह मे सिर्फ गौरीक शिव सँ वियाह करबाक अदम्य इच्छा आ तपस्या प्रमुख छलन्हि। आब स्वयंवर इतिहास बनि गेल अछि आ 'कोट मैरिजÓ अस्तित्व मे आएल अछि। की एहि वियाह केँ स्वयंबरक बदलल रूप नहि मानल जा सकैत अछि? पारंपरिक वियाहो पर तऽ बदलैत समयक स्पष्टï प्रभाव देखबा मे आबि रहल अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;समयक प्रभाव प्रत्येक युग मे रीति-रिवाज आ संस्कार पर पड़ैत रहल छैक। अति प्राचीन काल मे बहुपत्नीक उदाहरण नहि भेटैत अछि मुदा बाद मे ई प्रचलन मे आएल। इहो प्रथा अब प्राचीन आ पौराणिक सहमति प्राप्त कऽ चुकल अछि। समयक प्रभाव सँ वियाहक बहुप्रकार आ नियोग समाप्त भऽ चुकल अछि। मिथिला ताहु समय मे अपना के बदलैत समयक प्रभाव सँ बहुत हद तक बचा केँ रखने छल। आजादी सँ पहिने तक रीति-रिवाज संस्कार आ परंपराक जतबो 'धरोहरिÓ बचल छल आब लुप्तप्राय भऽ रहल अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;वियाह मे बरियातिक प्रचलन सेहो अति प्राचीन अछि। बरयाति शिव-विवाह काल मे सेहो वियाह अनिवार्य आ अपरिहार्य हिस्सा छल। तऽ की ओ वियाहकेँ मान्यता देभय बला सामाजिक गवाह होइत छलाह आ की मन्यागत दिस सँ यैह भूमिका सरयाति निभाबैत छलाह? मुदा आब बियाहक संग बरयातिक स्वरूप सेहो बदलि रहल अछि। महिला लोकनि आब नहि सिर्फ बरयातिक हिस्सा बनय लगलीह अपीतु बैंडक धुन पर सेहो नाचय लगली। खान-पान मे पत्तल के जगह प्लेट लऽ रहल अछि तऽ महानगर मे बफे सिस्टम (स्वयं खाना उठाक आ ठाढ़े भऽ खाक) हावी भऽ रहल अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;समयक संग सौराठ सभा सेहो अप्रासंगिक बनल जा रहल अछि। अपन एहि धरोहरि के बचा पाबैक क्षमता चूकैत बुझा रहल अछि। विकल्प पर ध्यान देब या सौराठ सभा केँ पुन: स्थापित करब की हमर सामाजिक नैतिक कत्र्तव्य नहि अछि? आरोप-प्रत्यारोप आ अनावश्यक तर्क-वितर्क इपर उठि की सभकेँ मिलि एहि पर गंभीर आ सार्थक पहल नहि करबाक चाही? सौराठ वासी अपना के निर्दोष नहि मानि सकैत छथि आ ने कोनो मिथिलावासी एहि खतराक प्रति उदासीन भऽ सकैत छथि? पंजी व्यवस्था महत्व बुझि ओकरा बचायब सेहो सामाजिक दायित्व अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;तिलक सामाजिक अभिशाप अछि आ अवरोधक मिथिला केर विकास मे प्रति वर्ष पचास करोड़ सँ बेसीक राशि मात्र वियाह आ बरयातिक ताम-झाम पर बुकल जाइत अछि। एत्तेक खर्चक बाद कै कहे सकत मिथिला पिछड़ल आ गरीब अछि? व्यवस्था एहि दोख के समग्रता सँ विचार कऽ दूर करबाक प्रयोजन अछि। की लड़की केँ एहि लेल 'लक्ष्मीÓ मानल जाइत अछि? तिलक आ बरयातिक ताम-झाम पर जत्तेक राशि हमरा लोकनि खर्च करैत छी, तकर सार्थक सदुपयोग नहि कएल जा सकैत अछि की?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;समाज तेजी सँ बदलि रहल अछि आ एकर चपेट मे आबि रहल अछि मिथिलाक सामाजिक-सांस्कृतिक जीवनक प्रत्येक ओ 'धरोहरिÓ जे व्यक्तिक जीवनक अभिन्न हिस्सा होइत छल। आवश्यकता अछि पुन: मंथन केर। अपन लेल नहि, समाज लेल, इतिहास लेल आ भविष्य लेल।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;—विपिन बादल&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-6979268378435890930?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/6979268378435890930/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=6979268378435890930&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6979268378435890930'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6979268378435890930'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='अपरिहार्य आत्म मंथन'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-148551474640098536</id><published>2009-12-24T02:12:00.002-06:00</published><updated>2009-12-24T02:15:06.808-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मिथिलांचल'/><title type='text'>मिथिलांचल सँ पलायन</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;कोनो समाजक पहिल आ प्रमुख इकाई होइत अछि 'जनÓ। निर्माण आ विनाश दुनु मे जनक प्रमुख भागीदारी रहैत छैक। परंच मिथिलांचलक आबादी लगभग पांच करोड़ रहितो आइ मिथिला जनविहीन लागैत अछि। एतय जनसँ मतलब मात्र दैनिक बोनि पर खटनिहार श्रमिक नहि, अपितु समस्त ओहन जन सँ संबंधित अछि जे कार्यरत छथि, कुनु ने कुनु तरहक काज अबस्से करैत छथि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जतय एक दिश्ï मिथिलाक बढ़तै जनसंख्या विस्मयकारी होइछ ओतहि दोसर दिश्ï लोकक पलायन मिथिलाक विकास केँ अवरुद्ध कयने जा रहल अछि। जनसंख्या वृद्धि सँ उपजल अनेकानेक विसंगतिक कएने लोक गाम-घर छोडि़ अन्यत्र पलायन कय रहल अछि। गाम-घरक कुनु वर्ग-जातिक लोक एहि पलायन सँ नञि बाँचल अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;देखल जाय तै पलायन पहिनहुँ होइत छल। प्राचीन काल मे मिथिला सँ लोक सब पलायन कय अन्यत्र सेहो बसि गेलाह। प्राकृतिक, दैवी आ स्थानीय कारण मुद्दा बनैत छल। पर्यटन आ उच्च ज्ञान प्राप्त करबाक इच्छा, सँ लोक घर सँ बाहर सेहो जाइत छलाह। आखिर लोक अपन माटि-पानि आओर गाम-घर सँ पलायन कियैक-करैत छथि, एहि संदर्भ मे किछु ऐतिहासिक कारक पर ध्यान देल आवश्यक बुझना जाइत अछि। अंग्रेजक शासन जाधरि रहल भारतक आर्थिक स्थिति चरमरायल रहल। कोनहु क्षेत्र ऐहन नहि छल जकर शोषण नहि कएल गेलै। अंग्रेजी शासनक नीति एहि तरहेँ बनल छल जे सभकिओ गरीबीक मारि झेलबा लेल बाध्य रहथु। जेना जेना समय बीतैत गेल, सामान्य मनुक्खक लेल दू जूनक रोटी जुटेनाय मुश्किल होइत गेल। ब्रिटिश शासक द्वारा अंधाधुन आर्थिक शोषण, स्वदेशी उद्योग-धंधाक नाश, ब्रिटेन मे भारतीय संपदाक स्वच्छंद प्रवाह, कृषि प्रणालीक पिछड़ापन आओर जमींदार, रजवाड़ा, महाजन तथा राज्यक अधिकारी द्वारा आम निरीह जनता/किसानक शोषण शनै-शनै अकल्पनीय दैन्य आ विवशताक खाधि मे धकलैत गेल।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एकर कारण जे पलायन प्रक्रिया शुरू भेल ओ राज्य संगे जुड़ैत गेल। ब्रिटिश शासनक शुरुआती चरण मे यानी प्लासी के लड़ाई आ 1765 ई। मे दीवानी लेल अनुदान भेटलाक बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी जे शोषण आ मनमानीक रस्ता अख्तियार कयलक ओकर सब सँ पहिल शिकार बिहार, बंगाल आ उड़ीसाक संयुक्त प्रांत बनल। अंग्रेज ऐहन ने लूट-खसोट शुरू कएलक जाहि सँ एहि संयुक्त प्रांतक कोन-कोन मे भूख, अकाल व महामारीक साम्राज्य बनि गेल आ लक्ष्मी पड़ाय लगलीह।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एहि संदर्भ मे दरभंगाक देशी रियासतक संबंध मे दू आखर कहब समीचीन होयत। किछु दिन पहिने एहि पलायनक संबंध मे भेल शोधक अनुसारे कहल जा सकैत अछि जे मिथिला सँ भेल पालयनक मुख्य कारण दरभंगा महाराज द्वारा मिथिलांचल जनताक निर्बाध निरंकुश शोषण आ उत्पीडऩ छल। दरभंगा महाराजक एकछत्र वर्चस्वक कारणे मिथिलांचलक आर्थिक, राजनैतिक आओर सामाजिक दशा चिंतनीय बनल रहय। ओहि समय किसानक मनमाना दमन कएल जाइत छलै, ओकरा पर तरह-तरहकेँ कर, मालगुजारी आदि असहनीय बोझ सहबा लेल बेबस कएल जाइत छलै। शिक्षाक आवश्यकताकेँ सभ तरहेँ नजरअंदाज कएल गेलै, स्वास्थ्य आ अन्यान्य सामाजिक कल्याण सँ संबंधित क्षेत्र मे पिछड़ापन आ शैथिल्यपूर्ण निष्क्रियताक घटाक्षेप छायल रहलै। प्रेस, जनसंचार माध्यम आओर नागरिक अधिकारक स्वतंत्रता केँ सत्ता द्वारा हनन कयल गेलै। सरकारी राजस्वक एकटा पैघ हिस्सा राजकुमार, कुलीन दरबारी आ हुनक चमचा-बेलचा केँ ऐशो आराम आ ठाटबाट मे दुइर होइत छलै। एतबै नञि, जँ कहियो ब्रिटिश शासनक कोनो प्रतिनिधि दरभंगा अबैत छलैह तऽ राजरघरानाक प्रतिनिधि ओकरा अपन माय-बापो सँ पैघ मानि बेशकीमती जनेश दैत छलाह। एहि तरहेँ जाहि धनक उपयोग रियासतक प्रगति मे होबाक चाही ओ धन राजघरानाक ठाट बाट आ हुनक चमचागिरी मे व्यर्थ चलि जाइत छल।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मुदा आजुक परिप्रेक्ष्य बदलल अछि। बढ़ैत जनसंख्याक घनत्वक अनुपात मे जमीनक रकवा छोट भऽ रहल अछि। उद्योगकहीनता प्राकृतिक प्रकोप, बाढि़ आ रौदी, उच्च व व्यावसायिक शिक्षाक अभाव, सरकारी उदासीनता तँ कारण अछिए, संगहि उपलब्ध रोजगारक अवसर मे सेहो कमी भेल जा रहल अछि। समुचित रोजगारक अभाव मे लोक केँ अंतत: आजीविका के तलाश मे घर छोडि़ बाहर जाय पड़ैत छैक।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मिथिलांचल मे आजीविकाक मुख्य साधन रहल अछि कृषि। एकरा हम एना कहि सकैत छी जे मिथिलाक जीवन कृषि के इर्द-गिर्द छल। अन्नक उपज सँ लय कऽ पशु-धन, लकड़ी, फल-फुलवारी सब कृषि आधारित छल। जतय कृषक केँ उपज सँ आमदनि छलनि, ओतहि भूमिहीन या कम खेत वला लोक कृषक मजदूर रूप मे आजीविका पबैत छल। कृषि विज्ञानक व्यवस्था आब पूर्ण रूपेण अलाभकारी भऽ गेल अछि। कृषि आ कृषि आधारित मजदूर दूनूक लेल जिनगी भार भेल जा रहल अछि। एहन परिस्थिति मे हुनका सभक सामने पलायने एकमात्र रस्ता शेष छैन्हि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ओना ई पड़तालक विषय थीक जे पलायन आर पलायन सँ उपलब्धि प्राप्त करय मे ओ कतेक सक्षम भऽ सकलाह, हलांकि सरकार पलायन सँ चिंतित अछि मुदा ओकरा रोकय लेल कोनहुं थितगर उपाय करय सँ कतराऽ रहल अछि। विडम्बना तँ एहि गप्पक अछि जे एखनधरि सरकारी स्तर पर पलायनक कोनो स्पष्टï आँकड़ा तक उपलब्ध नहि भऽ सकल अछि। जखन कि पलायन गति जोर पकडऩे जा रहल अछि। यदि समय अक्षितै पलायन केँ नहि रोकल गेल तँ संभव अछि जे किछु दिन बाद राज्य, खास मिथिलांचलक गामक गाम खाली भेटत। मात्र नेना, भुटका, महिला आ कि बूढ़ भेटता।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कल्पना मात्र सिहरा दैत अछि। जतय एक दिस मिथिला अपन समृद्ध सांस्कृतिक धरोहरि, सामाजिक परंपरा आ मजबूत ग्रामीण जीवनक लेल चिन्हल जाइत छल ओतय के गांव मे आब पाहुन अभ्यागतक सत्कार करय लेल दलान पर किओ नहि भेटैत अछि। 'अतिथि देवो भवÓ औचित्यहीन भऽ रहल अछि, घरबइया बिना।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ई तँ पलायनक एक रुख थिक। पलायनक दोसर रुख उपरोक्त सँ बेसी भयावह अछि। गाम-घर सँ रोजी-रोटी आ नील भविष्य क तलाश मे निकलल हताश लोग की नव-जगह ठाम पर जा किछु प्राप्त कय पबैत छथि कि नहि? घर सँ जतेक सुखद सपना लय कऽ चलैत छथि ओहि मे सँ एक्कोटा पूर होइत छैन्हि कि नहि? आ सबसँ अहम्ï चीज थिक हुनक ओतय केँ जीवन स्तर।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अपनहि राज्य आ देश मे अप्रवासी केर जीवन जीवाक लेल बाध्य ई लोकनि घर सँ दूर दुर्गतिक जीवन जीबैत छथि। मिथिला सँ पलायित लोक ओना तँ भारतक सब पैघ छोट शहर मे भेटि जयताह मुदा हिनक पहिल आ अंतिम पड़ाव दिल्ली होइत अछि। कारण, जँ दोसर शहर आ नगर मे समुचित रोजगारक व्यवस्था नञि भेल तँ दिल्ली मे छोट सन रोजगार तऽ कतओ भेटबे करत।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पढ़ल-लिखल, हुनरमंद सँ लय कऽ मूर्ख, बेलूरि सब कोटिक पलायित लोक दिल्ली मे भेटि जयताह। जिनगीक गाड़ी घीचैत-तीरैत। दिन भरि डाँड़ तोडि़ मेहनति आ राति मे गाम-घरक याद। यैह हिनक सभक दिनचर्या अछि। दुर्गा पूजा, दिवाली, होली सब छुटि गेलै, बिसरा गेलै चास-बास आ कलम-बारी, सभ दिनक पेटक आगि शांत करबाक उपाय मे। बिसरि कय आबि गेल छथि गामक ओ दलान जतय ताशक चौकड़ी जमैत छुटि, कीर्तन गबैत छलाह, शायद एतय अतिमानव बनाबक चेष्टïा मे अपनो केँ बिसरि गेलाह। बाँचल एकमात्र इच्छाक संग जीबि रहल छथि, शायद एहि महानगरी मे हमरो भाग्य खुजि जायत। भेड़-बकरी जकाँ जीवन जीवाक लेल अभिशप्त छोट-छोट झोपड़पट्टïी मे निर्वाह करैत शायद अपन जन्म लेबाक वा पूर्वजन्मक फल भोगि रहल छथि। परदेश मे हजार-पन्द्रह सौ रुपयाक नौकरी लेल बारह सँ चौदह घंटा खट्टïा पड़ैत छैन्हि संगे मानसिक शोषण सेहो बरदास्त करय पड़ैत छैन्हि। मुदा प्राप्ति नगण्ये सन होइत छैन्हि। महंग शहर-महंग वस्तु जात। फेर साल दू साल मे एक बेर गाम आयब।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पलायन सँ क्षति केवल गाम-घर समाज आ क्षेत्रे टा के नञि होइत अछि, पलायन सँ सभसँ बेसी कष्टï उठबैत छथि ओहि वर्ग विशेषक नारी, जिनक पुरुष मजदूरी लेल घर सँ जाइत छथि। अल्प आय मे अपना परिवार केँ छोडि़ असुरक्षा भावना मे पत्नी आ बच्चा केँ धकेल स्वयं सेहो चिंतित रहैत छथि। अलग-अलग लोकक हिसाबे मजबूरीक परिभाषा भिन्न भय सकैत छैक मुदा ओहि सँ उपजल असुरक्षा, सामाजिक हानि तथा अन्यान्य कारण सभक एक्कहि रहैत छैक। बच्चाक भविष्य, अपन वर्तमान आ अतीतक बीच तादात्म्य मिलाबैत, अपन जिनगीक अवसाद मिटेबाक प्रयास मे प्राय: सभ नारी तत्पर रहैत छथि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पलायन एक समस्या थिक। एहि बात सँ इनकार नहि कयल जा सकैत अछि, परन्च सरकार एहि सत्य केँ नुकाबय चाहैत अछि। गामक गाम वीरान पड़ल जा रहल अछि। महानगर, जतय पलायित व्यक्तिक ठौर पबैत छथि, ओतहुक स्थानीय निकाय अप्रवासीक समस्या सँ ग्रसित भऽ क्षुब्ध अछि। राज्य सरकार एहि समस्या पर चुप अछि। एतेक गंभीर समस्या केँ राजनीतिक स्तर पर हल्लुक अथवा कोनो खास नञि बुझनाय, सरकारक हृदयहीनता केँ प्रदर्शित करैत अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अपन उपलब्धि गनेवाक कारणे सरकार यदि छोट-मोट नियोजन करितो अछि तँ ओहो ऊँटक मुंह मे जीरक फोरन बुझना जाइत अछि। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता मे जबड़ल व्यवस्था राज्यक एतेक गंभीर विषय पर कोनहुँ राजनीतिक व्यक्तित्व आ कि दल गंभीरता सँ ध्यान नञि दैत अछि। ध्यान दैत अछि मात्र चुनावक बेर मे। फेर बिसरि जाइत अछि। स्थानीय नेता, विधायक, सांसद मात्र अपना क्षेत्र मे ओहने विकासक कार्य मे रुचि राखैत छथि, जतय सँ हुनका अवैध रूपेँ हिस्सा (रुपया) प्राप्त होइत छैन्हि। समय रहितै यदि पलायनक एहि स्थिति पर नियंत्रण करबाक समुचित उपाय नहि कएल जायत तँ, ई स्थिति विस्फोटक भऽ वर्तमान व्यवस्थाक लेल विकट समस्या ठाढ़ कय देत। एहि मे कनिको सन्द्रह नहि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-148551474640098536?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/148551474640098536/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=148551474640098536&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/148551474640098536'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/148551474640098536'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/12/blog-post_24.html' title='मिथिलांचल सँ पलायन'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-8558246603008127240</id><published>2009-12-21T22:36:00.000-06:00</published><updated>2009-12-21T22:38:53.620-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कला'/><title type='text'>कलाक चौंसठि संख्याक रहस्य आ कलाक मूलाधार</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;कलाक चौंसठि संख्याक रहस्यक दिसि दृष्टिï देला पर ई कहल जा सकैत अछि जे ऋग्वेदक मंत्र अष्टïक अध्याय एवं वर्ग मे व्यवस्थित अछि। आठ अष्टïक, चौंसठि अध्याय, दू हजार चौबीस वर्ग तथा दस हजार पांच सौ नवासी मंत्र अछि। सायणक अनुसार मंत्रक संख्या दस हजारि चार सै नवासीए अछि। पांचाल एही हेतुए ऋग्वेदक चतु:षष्ठिï संज्ञा देलनि। एहि तरहेँ चौंसठि संख्या केँ पवित्र स्वीकार केल गेल अछि। कामशास्त्र केँ ऋग्वेदक सदृश धार्मिक प्रतिष्ठïा एवं पवित्रता देवाक हेतुएँ वार्भव्य पांचाल चौंसठि उपविभाग मे विभक्त कैलनि अछि। ऋग्वेदक दसम मंडलक समानहि एकरहु दस मुख्य भाग थीक। यैह कारण अछि जे एकरा चतु:षष्ठिïक नाम सँ सेहो अभिहित कैल जाइत अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कलाक वर्गीकरण वात्स्यायन सँ पूर्वहि भऽ चुकल छल। पांचाल चतु:षष्ठि कलाक निर्देश कैने छलाह। जैन-गं्रथ चौंसठिकला केँ चौंसठि 'महिलागुणÓ रूप मे सेहो प्रस्तुत करैत अछि। एहि क्रम दसम एगाहरम शताब्दी मे विरचित 'कालिकापुराणÓ मे ब्रह्मïा एवं संध्याक प्रेम प्रसंग मे चौंसठिकलाक उल्लेख भेटैत अछि। एहि तरहेँ विभिन्न पुराण साहित्य आदि मे चौंसठि कलाक उल्लेख प्राप्त होइत अछि। मुदा एहि चौंसठियो कलाक नव-नव विश्लेषण क्रमश: बाद मे एक-एक कला केँ लऽ ओकर विभिन्न अंगोपांगक विस्तृत वर्णन कैल गेल और ई विभिन्न प्रस्थानक रूप मे एक पृथक स्थान प्राप्त करय लागल। विभिन्न कलाक प्रयोजन सेहो चतुर्वर्गक प्राप्ति सैह सूचित कैल गेल अछि। साधनक दृष्टिïएँ विभिन्न कलाक मौलिक आधारक प्रश्न अछि ई स्पष्टï अछि जे पौराणिक देव स्वरूपक विश्लेषणक संगहि संग कलाक सभ भेदक सांगोपांग विश्लेषण उपलब्ध भऽ सकल अछि। वेद मे कला शब्दक मात्र प्रयोग भऽ गेला सँ कलाक मूलाधार वेद नहि कहल जा सकैत अछि। किएक तँ मूर्ति निर्माण आदि वस्तु बहुदेववादक आधारहि पर विकसित मानवाक हएत। संवादसूक्त केँ नाटक मूलाधार एवं सामवेदक गान केँ संगीतक मूलाधार मानवा मे हमरा कोनो तरहक आपत्ति नहि अछि आ ने एही मतवैभिन्य अछि जे वाद्यक कतिपय रूप वेदकाल मे उपलब्ध छल। किन्तु ई एकांत सत्य थीक जे वास्तुकला, संगीतकला, मूर्तिकला, चित्रकला आदि जे विकसित रूप उपलब्ध होइत अछि एवं विषम संबंध अधिकारी एवं प्रयोजनक संग विभिन्न कलाक शाास्त्र सभक पुराणहिक देन थीक। भगवानक विभिन्न अवतार एवं लीलासभकेँ मूलाधार बना कऽ मूर्तिकला अपन चरम उत्कर्ष पर प्रतिष्ठिïत भऽ गेल। ओहि देवता सभक तथा पौराणिक राजलोकनिक नगर, देवालय, चैत्य आदिक विभिन्न वर्णनक अनुसार वास्तुकला अपन विकसित स्वरूप मे अवस्थित भेल। पौराणिक मूर्ति एवं वास्तु निर्माणक साक्ष्य आइ पर्यन्त भारतीय देवालय एवं खंडहरक रूप मे हमरा लोकनिक समक्ष उपस्थित अछि। चित्रकला सँ निश्चये पुराणक देन थीक। जहाँधरि संगीतक प्रश्न अछि ओकर विकास पुराण मे वर्णित सरस्वती, नारद, शिव, पार्वती, गंधर्व, अप्सरा सभ एवं विभिन्न राजसभाक संगीताचार्य लोकनिक आधारहि पर मानवाक इएत। पुराण सभ मे कोनो कलाक वर्णन मे लेखनी केँ संकुचित नहि राखल गेल अछि। एतबए नञि प्रत्येक कलाक एक एहन आचार्य एवं अधिष्ठïात्री देवताक स्वरूप उपलब्ध होइत अछि जकर साधना सँ ओहि कला मे परम प्रौढ़ता प्राप्तिक सूचना भेटैत अछि। समय-समय पर मय एवं विश्वकर्मा द्वारा कतेको अलौकिक नगर-निर्माणक सूचना पुराण मे देखि, ओकर अपूर्व वर्णन केँ पढि़ चिर विस्तृत, मंत्रमुग्ध कल्पना जगत मे विचरण करैत अकस्मात ई कहवाक हेतु बाध्य होमय पड़ैत अछि जो ओहि निर्माणक दृष्टिï सँ हमर स्थापत्यकला सर्वथा अपूर्ण अछि। शिवक ताण्डव, पार्वतीक लास्य, गंधर्व एवं अप्सरा सभक संगीतलहरी, सरस्वती एवं नारदक तंत्रीक झंकार अद्यपर्यंत पौराणिक शब्दक द्वारा हृत्तंत्री केँ किछु क्षणक लेल झंकृत करवा मे समर्थ होइत अछि। अत: बिन्दु इच्छोक ई स्वीकार करवाक लेल बाध्य होमय पड़ैत अछि जे विभिन्न कलाक मूलाधार पुराणहि अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-8558246603008127240?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/8558246603008127240/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=8558246603008127240&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/8558246603008127240'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/8558246603008127240'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/12/blog-post_21.html' title='कलाक चौंसठि संख्याक रहस्य आ कलाक मूलाधार'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-667109483438385981</id><published>2009-12-19T02:11:00.001-06:00</published><updated>2009-12-19T02:14:23.833-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गोनू झा'/><title type='text'>तहसीलदारक दाढ़ी 'बाह-बाहÓ मे गेल</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;एकटा राजा छलाह। हुनका एकटा तहसीलदार छलनि। जो रैयतसँ जमीनक मालगुजारी वसूल करैत छल। ओ बड़ निष्ठïुर स्वभावक लोक। हुनकर नामे सुनि कऽ लोकक पेटक पानि डोलय लगैत छलैक। ओ जाहि गाम मे पहुंचि जाइत छलाह ओहि गामक लोक तबाह भऽ जाइत छल। लोक सब एहि बातक नालिश राजाक ओहिठाम केलक लेकिन किछु सुनावाइ नहि भेलैक। संयोग सँ ओ तहसीलदार एकबेर गोनू झाक गाम मे पहुंचल मालगुजारी वसूलक हेतु। ओ गामक लोकके तंग करब शुरू केलनि। ककरो खेत कटा लेथिन, त ककरो बेगार मे पकरि लेथिन तऽ ककरो पिटबाइये देथिन। कारण हुनका संग मे सिपाहियो रहैत छल।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;अन्ततोगत्वा गामवला सब आपस मे विचार कऽ कऽ गोनू झासँ कहलकनि जे अपने तऽ बड़ चतुर व्यक्ति छी कोनो एहन उपाय करू जे तहसीलदार एहि गामसँ भागि जाय। गोनू झा उत्तर देलथिन अपने लोकनि चिंता नहि करू काल्हि भेनसरे हुनका हम अवश्य भगा देबनि।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;भेनसर भेलैक गोनू झा तहसीलदारक ओहिठाम पहुंचलाह। गामक बहुतो लोक हुनका संग पहुंचल। ओहि समय मे तहसीलदार साहेब दत्तमनि कऽ रहल छलाह। हुनकर छाती तक लटकैत दाढ़ी झुलि रहल छल। गामवला सब हुनका नमस्कार कऽ कऽ बैसैत गेलाह। तहसीलदार साहेब कुरूर आचमनि कÓ अंगपोछासँ दाढ़ी आ मुंह पोछलनि। ओही मे हुनकर दाढ़ीक एक गोट केश टूटि पृथ्वी पर खसि परल। झट दÓ गोनू झा ओहि केश के उठा कÓ अपना धोतीक एकटा खूट फारि ओहि मे लपेटि लेलनि आ तीन चारि बेर ओकरा माथ मे ठेका प्रणाम केलनि आ ओकरा अपना धोतीक खूट मे बान्हि लेलनि।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;ई देखि संगक लोक सब पुछलकनि—एहि केशकेँ लऽ कÓ की करब गोनू बाबू?&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;गोनू बाबू उत्तर देलखिन—अहां लोकनि इहो बात नहि जनैत छियैक जे एहि समय मे जाहि भाग्यवानकेँ तहसीलदार साहेबक दाढ़ीक एक गोट केश भेटि जेतैक ओ सोझे बैकुण्ठ चलि जायत। फेर कि छल? सब तहसीलदार साहेबक खुशामद करय लागल। तहसीलदार साहब फुलि कÓ कुप्पा भÓ गेलाह। लेकिन एतेक गोटे केँ दाढ़ीक केश कोना दÓ सकितथिन। ओ दाढ़ीक केश देवक लेल तैयार नहि भेलखिन तहन गोनू झा कहलथिन जे ई ओना नहि देथुन। एक-एकटा कÓ सब गोट लÓ लैत जाउ।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;आब कि छल। तहसीलदार साहेेब छाूड़ू-छोड़ू करैत रहलाह आ लोक एब उठि-उठि एकक बाद दोसर, दोसर के बाद तेसर एवं क्रमे एकक बाद एक देखैत-देखैत हुनकर आधा दाढ़ी साफ भऽ गेलनि। दाढ़ी सँ खून बहय लगलनि। ओ लोकके बहुत डँटथिन लेकिन ओहि पर कियो कोनो ध्यान नहि दैत दाढ़ी उखारैत हल्ला करैत छल जे 'बाह-बाह केहन सुंदर दाढ़ी अछि?Ó&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;ई खबर समस्त गाम मे पसरि गेलैक। सौसे गामक लोक दाढ़ीक केश लेबय चलि देलक। तहसीलदार साहेब जखन समस्त गामक लोककेँ जबैत देखलखिन तÓ ओ जी-जान लÓ कÓ भगलाह। जिनका सबकेँ दाढ़ीक केश नहि भेटलनि ओ लोकनि खुशामद करैत पाछू-पाछू दौड़लाह। लेकिन तहसीलदार साहब जान लÓ कÓ परेलाह। ओ भागैत जाथि लोक हुनका खेहारने जाय अंततोतत्व ओ भागिये गेलाह। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span style="color:#006600;"&gt;ओहि दिनसँ पुन: ओ ओहि गाम मे मालगुजारी वसूलक हेतु नहि गेलाह।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-667109483438385981?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/667109483438385981/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=667109483438385981&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/667109483438385981'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/667109483438385981'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/12/o.html' title='तहसीलदारक दाढ़ी &apos;बाह-बाहÓ मे गेल'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-7145036361999400070</id><published>2009-12-17T23:41:00.002-06:00</published><updated>2009-12-17T23:58:40.829-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सौन्दर्य'/><title type='text'>नख सँ शिख धरिक सौन्दर्य</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;कजरारी आँखि, सुग्गा जकाँ नाक, कबूतर सन गला, अनारक बीज सन गँथल दाँत, गुलाबक पंखुड़ी जकां लाल-लाल ठोर, नागिन सन लहराइत केश, सरिसौंक गाछ जकाँ लचकैत डॉड़ ...... नहि जानि सुंदरता केँ कतेक तरहेँ बताओल जाइत रहल अछि। कताक कवि तऽ नारीक सौन्दर्यक विषय मे कतेको रचना कय देलाह। एहि नख सँ शिख धरिक सुंदरता मे कोन अंग के की अहमियत होइत छैक ......&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पैर : साधारण तौर पर पयर कें उपेक्षित अंग मानल जाइत अछि। लेकिन शिख सँ नख। (पैरक नह) धरिक सुंदरता केँ पूर्ण मानल जाइत अछि। नवकनियाँ पयर मे पायल पहिर एक-घर सँ दोसर घर दिश्ï डेग उसाहैत छथि तऽ सभ सहजेँ पायलक रुन-झुन आवाजकेँ अकानÓ लगैत छथि। पयर मे पायलक अलावा बिछिया, मैचिंगल नेल पॉलिश सुंदरता के बढ़ाबैत अछि संगहि जँ पैर के लालरंगा सँ रंगि देल जायतऽ कि कहत ...... ! अजुका समय मे खनखनाइत चानीक पायलक जगह सोनाक पानि चढ़ाओल पायल, कुंदर आ मोती आदिक झांझरि लय रहल अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;डाँर : जिनक डाँर पातर-छितर रहैत छैन्हि हुनक कोन कथा...! नख सँ शिख धरिक सुंदरता मे डाँरक अपन अहमियत होइत छैक। आइयो जखन तथाकथित आधुनिक महिला पारंपरिक परिधान यथा साड़ी, लहंगा चोली आदि पहरैत छथि तऽ करधनी (डरकश) अवश्ये पहिरय छथि। एहि सँ पतरकी डाँरक सुंदरता बढि़ जाइत छै आओर ओहि पर बलाबाबैत-अल्हड़ जकाँ हुनक चालि सभ केँ आहत करथ मे समर्थ होइत अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नितम्ब : डाँर पावर-छितर आ सुडौर हुअए, संगहि नितम्ब भारी-भरकम बेडौल हुअए तऽ सुंदरता धरलै रहि जाइछ। तैं नितम्बक उचित रख-रखाव जरूरी अछि। बेसी चर्बी वाला आ गरिष्ठï भोजन, शारीरिक श्रमक कमी आओर आलस्यपूर्ण दिनचर्या डाँर आ नितम्ब केँ भारी बनाबैत अछि। ताहिं खान-पान आ जीवनशैली के सुधारबा आवश्यक।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पीठ : हालांकि पीठ पाछे दिश्ï रहैछ, तइयो ओकर साफ-सफाईक ध्यान राखल जाय। पीठ केँ हमेशा सीधा रखबाक चाही, झुकि कऽ बैसला आ चलला सँ देह टेड़ भऽ जाइत छै। बिना बाँहिक आ पैघ गर खुजल गलाक ब्लाउज पहिरल जाय तऽ पीठ के सुंदर हैब अत्यावश्यक।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बाँहि आओर हाथ : हाथ मे काँच या मेटलक खूबसूरत चूड़ी अथवा लाहक लहठी तऽ बाँहि केँ बावजूद सऽ सजेबाक परम्परा चलि आबि रहल अछि। बाँहि हाथ के सुंदर रखबाक लेल एकर सफाई जरूरी अछि। केहुनी के उपेक्षित नञि छोड़बाक चाही, नहि तऽ काल्हिं कलाईब सुंदरता हेतु कलाइबंद (ब्राशलेट) पहिरल जाइत अछि। संगहि रंग-बिरंगी चूड़ी, मैटल, काँच, हाथ संकर, अंगूठी आदिक संगे रंगबिरंगी नेल पॉलिश उपलब्ध अछि जकर समय आ परिधानक हिसाबे उपयोग मे आनल जा सकैछ। कोहुनी सँ नीचाँ हाथधरि मेंहदी लगाओल जाइत अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;उरोज : एहि सौंदर्य यात्रा मे भरल-पुरल उरोजक भूमिका केँ नकारल नहि जा सकैछ। ई मात्र नारी होबाक एहसास नहि थिक वरन्ï दामपत्य जीवन आओर ममत्व केँ आत्मसात करबाक हेतु थिक। उरोजक आकर्षण आ उभारक लेल खान-पान आओर समुचित देखभालक आवश्यकता होइछ, जाहि सँ नारी उन्नत उरोजक स्वामिनी बनल रहथि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;गरदनि : पातर-सोटल गरदनि नारीक सुंदरता मे चारि-चान लगा दैत छैन्हि। सुंदर ग्रीवाक लेल समय-समय पर फेशियल करेनाय लाभदायक होइत अछि। जखन गर्दन सुन्न रहैत तऽ आभा नहि प्रकट करैत अछि, ताहिं गरदनि मे कंठहार, रानीहार, मंगलसूत्र, चेन, नेकलेस या हार, हँसिया, नेकलेस पाबैत अछि, मुदा गरदनि हुअए तऽ लंबा चेन आ रानीहार सुंदरता मे बढ़ोतरी करैत अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;चेहरा : गुलाबी गाल, रसीली ठोर, मोतीक समान धवल दंतपंक्ति, कजरारी आँखि, सुन्दर नाक व कान, ई सब मिलि कय चेहरा कहाबैत अछि। चेहरा नीक रहैय तऽ अनयासे ककरो प्रथमे दृष्टिïये अपना दिश्ï आकर्षित करबा मे समर्थ होइछ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ठोर : पहिने गुलाबी ठोर सुंदरताक पर्याय मानल जाइत छल लेकिन बदिलैत समयक संग लोकक मानसिकता बदलि रहल छैन्हि आओर एहि ठोर के लाल, मैरुन, मोव, पिंक, ब्राउन, कॉफी आ चॉकलेट शेड्स मे रंगल जा रहल अछि। एतबै नञि नबका फैशनक आलम ई ललनाक ठोर नीला, पीयब, हरियक यानि सतरंगी रंग मे रंगि रहल छथि। एहि सभक बीच जरूरत एहि गप्पक जे ठोर आ त्वचा सँ मेल करैत शेड्स के चुनल जाए जकरा लगा कय अधर बिना खुजने अपन-आकर्षण जाल मे सामने वला के कैद कय सकैय।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;नाक : अपन सभक सभ्यता संस्कृति मे नाकक नथ (छक) केँ सौभाग्य ओ सुहागक प्रतीक मानल जाइत अछि। कुनु शुभकाज मे जँ स्त्री नथ नञि पहिनैय तऽ हुनक चेहरा श्रीहीन बुझना जाइत छैन्हि। जहिया सँ भूमंडलीकरण समय आओल तहिया सँ तथाकथित पश्चिमी सभ्यता सेहो श्री केँ एहि प्रतीक नथ केँ अपन शृंगार प्रसाधन मे अपनौलक।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;आँखि : सुंदरीक नयनाक कटार पता नञि कतेक के घायल कय दैत अछि ...? ओना तऽ आँखिक खूबसूरती अपन बशक नहि ई तऽ प्रकृति प्रदत्त अछि तइयो थोड़ैक देखभाल आ शृंगार कय कऽ आँखि केँ आकर्षक बनाओल जा सकैछ, ई तऽ अपन हाथ। पहिलुका जमाना मे काजर एकमात्र जानल-परखल सौंदर्य प्रसाधन छल। लेकिन एखुनका समय मे आँखि केँ आकर्षक बनेबाक लेल बाजार मे विभिन्न शेड्स के आई लाइनर, आइ ब्रो पेंसिल आओर आई शैडो उपलब्ध अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कान : जँ चेहराक सम्पूर्ण सुंदरता केँ ताकल जाय तऽ आँखि नाक अधरक अलावा कानक अहमियत कम नहि अछि। जँ कान नहि रहितै तऽ कतय लटकैते लम्बा-लम्बा झुमका, झूलैत बाली आ कतय सजितैय रंग-बिरंगी टॉप्सँ? किंचित्ï एहि दुआरे कानक ऊपरी भाग के श्रवण शक्ति सऽ कोना सरोकार नहि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कपार : सुहागक प्रतीक बिंदी (टिकली) आब पारम्परिकता सँ ऊपर उठि कय फैशन वल्र्डक एकटा अहम हिस्सा बनि चुकल अछि। जमाना बीत चुकल अछि जखन सबदिन एक्के रंग आ डिजाइनक बिंदी लगाओल जाइत छल। आब तऽ बाजार मे सुहागिन, कुमारि आ फैशनपरस्त महिला सभक लेल अलग-अलग रंग आ डिजाइनक बिंदी भेटैछ, जे ओ अपन रुचि आ पसिन्नक हिसाबे कीनि सकैथ। ध्यान राखल जाय जे अपन कपार, रंग, केशक स्टाइल आ उम्रक हिसाबे टिकली कीनल जाय।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;केश : माथक केश महिलाक लेल अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि। केश केँ कई प्रकारें जूड़ा बना कय ओकरा कलात्मक जूड़ापिन, फूलक गजरा, मोती जरल किलप्स सँ सजा कय मलिका-ए-हुस्न बनल जा सकैत अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;—रानी झा&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-7145036361999400070?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/7145036361999400070/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=7145036361999400070&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/7145036361999400070'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/7145036361999400070'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/12/blog-post_17.html' title='नख सँ शिख धरिक सौन्दर्य'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-9127356036907908676</id><published>2009-12-16T00:55:00.001-06:00</published><updated>2009-12-16T00:57:07.320-06:00</updated><title type='text'>सत्येंद्रक लघुकथा</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;केंद्र &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ओकर पत्नी आ ओकर मायमे एकदम्मे नहि पटै छलै। ओ थाकल-हारल जखन कार्य सँ वापस आबय तँ पत्नी घरक दरबज्जे परसँ मायक प्रति विषवमन करय लागै। मायो एकान्त पाबि एक ढाकी उपराग पत्नीक मादे सुना जाइ। ओकर मौन तीत भ जाय। आइयो ओहिना भेलै। ओ चुपचपा सुनि लेलक दुनूक गप्प। ताबब बेटा आबि गैले, ''पापा, एकटा प्रश्नक उत्तर कहू तँ, कि एक केंद्रसँ अनेक वृत्त घीचल जा सकै छै?ÓÓ&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;''हँÓÓ ओ संक्षेप मे उत्तर देलक।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;''मुदा पापा, जते बेर वृत्त घीचल जेतै, तते बेर प्रकालक नोक ओकर केंद्र पर पड़लासँ ओकर गड़ैतो हेतै।ÓÓ&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बेटाक गप्प सुनि ओ ओकर मुँहे तकैत रहि गेल।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;दोसर गलती&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एकटा साइकिल कारसँ सटि गेलै। कारकेँ किछु नहि भेलै। साइकिल थूड़ा गेल छलै। साइकिलक ई पहिल गलती छल जे ओ अपन औकादि नहि बुझलक। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;थुड़ायल-कुचायल साइकिल न्यायक लेल जाय लागल। ई ओकरासँ दोसर गलती भ गेल छलै।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-9127356036907908676?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/9127356036907908676/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=9127356036907908676&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/9127356036907908676'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/9127356036907908676'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/12/blog-post_16.html' title='सत्येंद्रक लघुकथा'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-3648990745835898857</id><published>2009-12-15T07:42:00.002-06:00</published><updated>2009-12-15T07:45:01.094-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विज्ञापन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सुभाष चन्द्र'/><title type='text'>देह उघाड़ू विज्ञापनक पसरैत जाल</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;जाहि अंतर्वस्व केँ महिला सभ शारीरिक सुंदरता, सुघड़ता केँ कायम रखबाक लेल उपयोग मे आनैत छथि; ओकरा पश्चिमी सभ्यता केँ पक्षधर बाजारू संस्कृतिक कारणे लाज-धाक के धकियाबैत फैशनक रूप मे परोसि रहल छथि। कि एकरा अपन सभक सभ्यता पर करगर चोट मानल जाय? कि किछु आर!&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जाहि अंतर्वस्त्रक नामकेँ सार्वजनिक रूपेँ बजबा मे हमरा सभकेँ असोकरज बुझना जाइत अछि, जकरा घरक महिला कुनु दोसर कपड़ा के तर मे दऽ रौद मे सुखाबैत छथि, ओहि वस्त्रक ऐना प्रचार अखरैत अछि। अप्पन समाज मे एखनधरि 'ब्राÓ शब्दक सार्वजनिक रूपें प्रयोग केनाय अभद्रताक पर्याय मानल जाइत अछि। ओतहि एकरा उत्तरीय भारतीय परिधानक रूप मे मान्यता देव कचोटैत अछि कि फैशनक अर्थ कपड़ाक संख्या आ अकार मे कमी आनब रहि गेल अछि? डिजाइनर आ व्यवसायी द्वारा अपन हितक वास्ते हमर सभक सभ्यता केँ निरन्तर नांङ्गïट करब कत्तय धरि उचित अछि? अफसोस होइत अछि भारतीय नारीक परिधान पर आखिर कहिया रूकत ई पश्चिमी सभ्यताक अनुकरण। अनुसरण मात्र उघारूपन केँ, आर कथूक नहि? जखन कि हमर अतीत समृद्घ अछि, विकसित अछि। मात्र शारीरिक उघारूपन अपनेलाह सँ कि भेटत?&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पश्चिमी देश जकाँ उघारूपनक रोग एखनहुँ एहिठाम सभकेँ नहि लगलैक अछि। एहिठाम नारीकेँ देवी मानल जाइत छैक। सरस्वती आ दुर्गा मानैत छैक। सेक्सक आनन्द ई कदापि नहि लगाओल जाय कि भारतीय संस्कृति उघारूपनक खालिस विरोधी अछि। एक सीमा धरि हमहूँ सभ उघारूपन मे विश्वास करैत छी, सीमा तोड़ी कऽ नहि। बिनु उघारने तऽ संभोग सम्भवे नहि छैक। एहिठामक सभ पत्नीक संग ओ सभ करैत छथि जे योनि संतुष्टिï लेल आवश्यक छैक। नहि तँ सन्तान कोना होयत? सृष्टिï कोना चलत? बिनु बेटाक जे मरैत अछि तकरा तँ हिन्दू धर्मक अनुसार स्वर्गों मे कल्याण नहि होइत छैक।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;प्रेम कोना करी, संभोग कोना करी, ताहि संबंध मे शिक्षा लेल हमरा देशक कामशास्त्र विश्वविख्यात अछि। काम लक्षणक विस्तृत विवरण दैत आचार्य वात्सायन लिखैत        छथि :-&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;''श्रोत्तत्वकचक्षुर्जिका ध्राणानामात्म संयुक्तेन मनसा।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;धिष्टिïतानां स्वेषु विषयेतानुकूल्यत: प्रवृत्ति: काम:॥ÓÓ&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अर्थात्ï - कान, त्वचा, आँखि, जिह्वïा, नाक एहि पाँचो इन्द्रिय केर इच्छानुसार शब्द, स्पर्श, रूप, रस आ गन्ध केर प्रवृत्तिये काम थिक अथवा एहि इन्द्रिय केर प्रवृत्ति सँ जे आत्मानन्द होइछ तकरे 'कामÓ कहल जाइछ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;निष्कर्ष ई जे ज्ञान मे जाहि विषयक संस्कार होइछ से वासना बनि ज्ञान मे विद्यमान रहैत अछि आ जखन उक्त विषय के पयबाक इच्छा उत्पन्न होइत अछि तऽ ओहि इच्छा के काम कहल जाइत अछि। चूँकि ई इच्छा ज्ञानक विषय अर्थात्ï वासना सँ जनमैत अछि तेँ ओहि विषय-वासनाके सेहो काम कहल जाइत अछि। काम केर कारणेँ एक प्राणी दोसर प्राणी सँ आकृष्टï भऽ संभोग करैत अछि तेँ सृष्टिï सृजन होइछ। काम के गाम-घरक बोली मे 'सहवासक इच्छाÓ कहल जाइत अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;काम सृष्टिïक अस्तित्व अछि। काम सृष्टिïक आदि तत्त्व अछि। सृष्टिïक विकासक आदि कारण भेला सँ एकर अनादि सेहो कहल जाइत अछि। एकरा उपेक्षित मानब समस्त मानव मात्रक लेल अपराध थिक। काम प्राणिमात्र केर जन्मगत स्वाभाविक प्रवृत्ति थिक। काम केर शमन शारीरिक आ मानसिक दृष्टिïयेँ हानिप्रद अछि। 'कामÓ स्त्री-पुरूष दुहुक लेल समान अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;दुनू मे समानरूपेँ भूख, प्यास आ तृप्ति छैक। काम इच्छाक शान्तिपूर्ण समाधान प्राणीमात्रक लेल आवश्यक एवम्ï हितकर अछि। जहिया भूख आ काम खतम भऽ जायत तहिया सृष्टिï स्वत: समाप्त भऽ जायत। तेँ प्राणिमात्रक लेल काम आ भूख दुनू अनिवार्य अछि। इएह कारण अछि जे काम प्राणीमात्रक लेल ईश्वरीय प्रवृत्ति थिक। एकर अनिवार्यता आ महत्ता के किओ नकारि नञि सकैत अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;डॉ। फ्रायड केर विचार छन्हि जे—''संसारक पैघ-पैघ योद्घा, राजनेता, दार्शनिक आ वैज्ञानिक भेल छथि सभहक जीवन काम-वासना सँ पूर्ण पाओल गेल अछि। दुनियाक विकास हिजड़ा सँ नहिं अपितु ओहि 'मर्दÓ सँ भेल अछि जे काम उपासक छलाह। धर्म-दर्शन आ समाजक समस्त ललितकला केर पाछाँ मनुष्य मे सेक्सक भावना निहित रहैछ।ÓÓ&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;जतेक संभोगक आसनक चर्चा हमरा सभक कामशास्त्र मे अछि तकर बराबरी तँ पश्चिमी देश आइयो नहि कऽ सकल। लेकिन हम सभ ई काज पश्चिमी देशक लोक जकाँ सार्वजनिक स्थान मे नहि, शयनकक्ष मे करैत छी, सूतय वला घर मे। केवाड़ बन्न कऽ करैत छी। परदा राखि कऽ करैत छी। आन केओ देखि नहि लिअय तकर-ध्यान रखैत छी। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हमर पूर्वज पश्चिमी देश सभ सँ बेसी उघारूपन मे विश्वास करैत छलाह। प्रमाण तँ खजुराहो मन्दिर अछि जतय भित्तिचित्र आ प्रतिमाक रूप मे हजारों-हजार स्त्री पुरुषक संभोग मे व्यस्त, नग्न नृत्य मे मस्त, आलिंगनबद्घ होइत चुम्बनक्रिया मे संलग्र चित्र देखाओल गेल अछि। एहेन अनेको मन्दिर अछि जतय पश्चिमी सभ्यताक पक्षधर केँ अपन सेक्सक ज्ञानक श्रेष्ठताक घैलि फुटि जेतैन्ह। होश निफ्ता भऽ जेतैन्ह।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-3648990745835898857?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/3648990745835898857/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=3648990745835898857&amp;isPopup=true' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/3648990745835898857'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/3648990745835898857'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='देह उघाड़ू विज्ञापनक पसरैत जाल'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-6687269734734950590</id><published>2009-11-27T23:22:00.004-06:00</published><updated>2009-11-27T23:26:59.825-06:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैथिलि'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विद्यापति'/><title type='text'>विद्यापति गीत</title><content type='html'>&lt;p&gt;1&lt;/p&gt;&lt;p&gt;कि कहब हे सखि रातुक बात।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;मानक पइल कुबानिक हाथ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;काच कंचन नहि जानय मूल।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गुंजा रतन करय समतूल।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जे किछु कभु नहि कला रस जान।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;नीर खीर दुहु करय समान।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;तन्हि सएँ कइसन पिरिति रसाल।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बानर-कंठ कि सोतिय माल।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भनइ विद्यापति एह रस जान।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बानर-मुह कि सोभय पान।। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;2&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जौवन रतन अछल दिन चारि।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;से देखि आदर कमल मुरारि।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;आवे भेल झाल कुसुम रस छूछ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;बारि बिहून सर केओ नहि पूछ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;हमर ए विनीत कहब सखि राम।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सुपुरुष नेह अनत नहि होय।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जावे से धन रह अपना हाथ।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;ताबे से आदर कर संग-साथ।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;धनिकक आदर सबतह होय।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;निरधन बापुर पूछ नहि कोय।।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;भनइ विद्यापति राखब सील।&lt;/p&gt;&lt;p&gt;जओ जग जिबिए नब ओनिधि भील।। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;३&lt;/p&gt;&lt;p&gt;सैसव जौवन दुहु मिल गेल। श्रवनक पथ दुहु लोचन लेल।।&lt;br /&gt;वचनक चातुरि नहु-नहु हास। धरनिये चान कयल परकास।।&lt;br /&gt;मुकुर हाथ लय करय सिंगार। सखि पूछय कइसे सुरत-विहार।।&lt;br /&gt;निरजन उरज हेरत कत बेरि। बिहुँसय अपन पयोधर हेरि।।&lt;br /&gt;पहिले बदरि सम पुन नवरंग। दिन-दिन अनंग अगोरल अंग।।&lt;br /&gt;माधव देखल अपरूब बाला। सैसव जौवन दुहु एक भेला।।&lt;br /&gt;विद्यापति कह तुहु अगेआनि। दुहु एक जोग इह के कह सयानि।। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-6687269734734950590?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/6687269734734950590/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=6687269734734950590&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6687269734734950590'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6687269734734950590'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/11/1-2.html' title='विद्यापति गीत'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-1498688472468563698</id><published>2009-10-05T01:10:00.001-05:00</published><updated>2009-10-05T01:13:46.216-05:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नागार्जुन'/><title type='text'>गुदरी मे लाल : बाबा यात्री</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SsmOYr5lWZI/AAAAAAAAAF0/9xjkpY9OTjA/s1600-h/140px-Nagarjun.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5388994983877761426" style="FLOAT: right; MARGIN: 0px 0px 10px 10px; WIDTH: 140px; CURSOR: hand; HEIGHT: 193px" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SsmOYr5lWZI/AAAAAAAAAF0/9xjkpY9OTjA/s320/140px-Nagarjun.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;मिथिलाक पावन माटि तंत्र, दर्शन ओ शिक्षाक लेल सनातन कालहि सँ प्रसिद्ध रहल अछि। ई सिद्धपीठ ओ तपोभूमिक रूप मे सेहो विख्यात अछि। एकर शैक्षणिक भूमि सततï् उर्वरा रहल अछि। विद्यापति, अयाची, वाचस्पति ओ मंडन-भारतीक एहि धरती पर वर्तमान युगक एक गोट महान विभूतिक जन्म भेल, जिनक नाम छल-ठक्कन मिश्र। ई आगू चलि ठक्कन सँ वैद्यनाथ मिश्र, वैदेह, आ फेर 'पतन-अभ्युदय बंधुर पंथा, युग-युग धावित यात्री। तुमि चिर सारथि तव रथ चक्रे, मुखरित पथ दिन रात्रि।Ó धावित यात्री आगू चलि बौद्ध साहित्य दर्शनक संपर्क मे नागार्जुन आ युवा साहित्यकारक बीच बाबा नागार्जुन भेलाह।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;बाबाक चर्चा करैत एकटा अक्खड़, घुमक्कड़, बेबाक, बात-बात पर हँसय बला चेहरा ओ अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थिति सँ अप्रभावित व्यक्तित्व, मानस-पटल पर प्रकट भऽ जाइत अछि। ई निर्विवाद सत्य जे विशुद्ध निर्गुनियाँ सदृश सांसारिक माया-मोह सँ दूर, अपना मे मस्त रहयबला, स्वछन्द विचरण कएनिहार आओर कोनो परिवेश मे अपन स्वतंत्र विचार निडरताक संग व्यक्त कएनिहार बाबा यात्री एहि गप्प केँ मिथक साबित कएलन्हि अछि जे भारतवर्ष मे व्यक्ति मृत्यु पश्चाते अमरत्व केँ प्राप्त करैत अछि। ओ तऽ अपन जीवन कालहि मे अमरत्व केँ प्राप्त करैत जनकविक रूप मे विख्यात भऽ गेल छलाह।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;बाबाक मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र छलन्हि। हिनक जन्म ज्येष्ठï पूर्णिमा तदनुसार जून, 1911 ई। मे अपन मात्रिक सतलखा (जिला मधुबनी) मे भेल छल। हिनक पिताक नाम पंडित गोकुल मिश्र आ पैतृक गाम तरौनी (दरभंगा) छल। प्रारंभिक शिक्षा अपन पैतृक गाम स्थित विद्यालय सँ प्राप्त कएला उपरांत 14 वर्षक आयु मे गनौली संस्कृत पाठशाला सँ प्रथमा एवं मध्यमाक परीक्षा उत्तीर्ण कएलन्हि। एतय ई लिखब अप्रासंगिक नहि होयत जे संस्कृत शिक्षा दिस अग्रसर होयबाक मुख्य कारण निर्धनताक पर्याय रहल। तदुपरांत महारानी (दरभंगा) द्वारा प्रदत्त छात्रवृत्तिक आधार पर उच्च शिक्षाक प्राप्ति हेतु काशी गेलाह आ ओतऽ सँ साहित्याचार्यक उपाधि अर्जित कएलन्हि। फेर एक साल धरि कलकता मे रहि 'काव्यतीर्थÓ क उपाधि पओलन्हि। ध्यान देवा योग्य अछि जे अपन स्वाध्यायक बल पर ओ नहि केवल मात्रृभाषाक साहित्य संसार केँ पल्लवित ओ पुष्पित कएलन्हि वरïनï् एकर अतिरिक्त पालि, अद्र्धमागधी, अपभ्रंश, सिंहली, तिब्बती, गुजराती, बंगला ओ पंजाबी साहित्य पर सेहो समान अधिकार बनोलन्हि। राष्ट्रभाषा हिन्दी तऽ जेना हिनका मे रचि-बसि गेल छल।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;18 वर्षक अवस्था मे बाबाक वियाह ग्राम हरिपुर, बख्शी टोल निवासी कृष्णकांत झाक पुत्री अपराजिता देवी सँ भेलन्हि। विवाहोपरांत सन् 1932 ई। मे ओ उत्तरप्रदेशक सहारनपुर मे शिक्षक पद पर नियुक्त भेलाह। परन्तु, अपन घुमक्कड़ प्रवृत्तिक कारणे किछु दिनक बाद पद-त्यागी देलन्हि। 1934 सँ 1936 ई. क बीच ओ भारतक विभिन्न भागक भ्रमण करैत रहलाह। जाहि क्रम मे ओ अनेक महान विभूति ओ संस्थाक संपर्क मे अओलाह। 1936 ई. मे ओ सिंहलद्वीप (लंका) गेलाह जतय बौद्ध धर्मक अध्ययनक क्रम मे 1937 ई. मे ब्राह्मïणत्व केँ त्यागि बौद्धधर्मक दीक्षा ग्रहण कऽ बौद्ध भिक्षु भऽ गेलाह आ बौद्ध परंपरा मे 'नागार्जुनÓ नाम धारण कएलन्हि।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;दुब्बर-पातर शरीर.....कोटरा मे धंसल-धंसल आँखि.....खूखायल लकड़ी सन हाथ-पएर.....अत्यंत साधारण वेश-भूषा.....। बाबाक रहन-सहन एतेक सादगी भरल छल जे ई प्रतीत होयब कठिनाह जे ओ अंतर्राष्टï्रीय व्यक्तित्व छथि। जेहने भीतर, ओहने बाहर सेहो। हुनक व्यक्तित्वक सबसँ आकर्षक तत्व छल हुनक स्पष्टïवादिता। इएह कारण अछि जे हुनक व्यक्तित्व अलग-अलग कर्मक्षेत्र मे अलग-अलग ऐतिहासिक व्यक्तित्वक स्मरण करोबैत अछि। भगवान बुद्ध अपन युगक पीडि़त मानवताक हितक रक्षार्थ संघर्ष कएलन्हि। वैद्यनाथ मिश्र सेहो बौद्ध धर्मक अनुयायी बनि भगवान बुद्धक आदर्श वचन 'बहुजन हिताय बहुजन सुखायÓ केँ अपन रचनाक माध्यम सँ जन-जन धरि पहुँचेवाक बीड़ा उठौलन्हि। ओ जतय अपन मातृभाषा मैथिली मे विद्यापति एवं चंदा झाक क्रम केँ आगू बढ़ोवैत मैथिली कविताक आधुनिकीकरण कएलन्हि, ओतहि हिन्दी मे सेहो भारतेन्दु, प्रेमचन्द्र, ओ निरालाक परम्परा केँ आधुनिक काल मे आगू बढ़ेबाक सफल प्रयास कएलन्हि। पाब्लो, नेरुदा, लोरका आ मायकोवस्की मे हुनका अंतर्राष्टï्रीय भ्रातृत्व प्राप्त भेलन्हि।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;एहि मे कनिको संदेह नहि जो बाबा यात्री पूर्ण साहित्यकार छलाह। ओ माक्र्सवादी होइतहु 'सर्वे भवंतु सुखिन:Ó केर प्रवल समर्थक छलाह। हुनक साहित्यिक व्यक्तित्व बहुमुखी छल। ओ साहित्यक तमाम विधा-कविता, कहानी, उपन्यास आदि केँ सम्पुष्टिïत ओ संबद्र्धित कएलन्हि। हुनक कविता मे एक दिश संस्कृत काव्यक आनंद प्राप्त होइत अछि, तऽ दोसर दिस आम जीवनक दयनीय स्थितिक दृश्य दृष्टिïगोचर होइत अछि। ओ आम जिनगीक जे चित्रण अपन रचना सभ मे कएलन्हि अछि, वास्तव मे हुनका द्वारा बीताओल यथार्थ छल। इएह एकटा सुच्चा साहित्यकारक परिभाषा सेहो थीक।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;एकटा बानगी देखल जाऊ। एहि मे ओ मिथिलाक दयनीय स्थितिक चित्रण एहि रुपेँ कएने छथि—&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;''तानसेन कतेक रविवर्मा कते&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;घास छीलथि, बागमतिक कछेड़ मे&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;कालिदास कतेक विद्यापति कते&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;छथि हेड़ायल महिसबारक हेर मेÓÓ&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;देखल जाय तऽ बाबा अपन सभ रचना मे समाजवादी पात्रक सशक्त चित्रण कएलन्हि अछि। हुनका ई स्पष्टï ज्ञात छलन्हि जे अधिकांश पाठक अतिसामान्य जनहि होइत छथि। तेँ जावत धरि सामान्य जनक हित लेल चिन्तनशील नहि भेल जायत, ता धरि हुनका लेल साहित्यक रचना कोना कएल जा सकैत अछि? हुनक उपन्यासक आंचलिक परिवेश नहि केवल सटीक आओर सराहनीय अछि बल्कि नव पीढ़ीक कथाकार ओ उपन्यासकारक लेल प्रेरक एवं अनुकरणीय सेहो।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;5 नवम्बर, 1998 ई। केँ बाबा पंचतत्व मे विलीन भऽ गेलाह। लेकिन बहुत कमहि पाठक केँ ज्ञात हेतन्हि जे अपन शब्दरुपी वाण सँ विद्रोहक बिगुल फूकनिहार एवं सामाजिक कुरीति केँ कलम क माध्यम सँ जूझनिहार बाबाक अंतक कारण 'कुपोषणÓ अर्थात उचित भोजनक अभाव रहल होयत। जी हाँ, ओ 'हाइपोप्रोटिनिमिया-एनोमियाÓ रोग सँ ग्रसित छलाह, जकर मूल कारण मात्र कुपोषण अछि।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-1498688472468563698?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/1498688472468563698/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=1498688472468563698&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1498688472468563698'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1498688472468563698'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='गुदरी मे लाल : बाबा यात्री'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SsmOYr5lWZI/AAAAAAAAAF0/9xjkpY9OTjA/s72-c/140px-Nagarjun.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-119902252748942100</id><published>2009-09-18T02:51:00.001-05:00</published><updated>2009-09-18T02:54:25.237-05:00</updated><title type='text'>जो रे कलंकियाहा!</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;दिल्लीक भगम-भागी जिनगी मे सदिखन सभ किओ अफस्यांत रहैत अछि। एखन तऽ अवश्ये, चुनावक बाजार जे गरमायल छै। सभकें पड़ाहि लागल छैक। अखबार आ चैनल वला सभ नेताक साक्षात्कारक लेल दौडि़ लगा रहल छथि। भला एहन स्थिति मे हम कोना पाछा रही, आखिर हमहूँ तऽ एकगोट पत्रिका सँ जुड़ल छी। कखनो काल चन्द्रशेखरकट खुटिआयल दाढ़ी सेहो रखैत छी, तैं अपना केँ पत्रकार-मानवा मे कोनो असोकरज नहि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अचानक एतेक ने धरफरी भऽ गेल जे भोर होबाक धैर्य नहि रहल, झटपट चट्ïटी पहिर-बिदा भेल, जे आइ कोनो-ने कोनो महापुरुष केँ जरूर ताकि लेबैन्ह, हुनका सँ दू टप्पी गप्प कए ओकरे साक्षात्कारक रूप मे तैयार कऽ लेब। डेग बढ़ौने जाइत रही, यमुनाक कछेर मे पहुँचल तऽ एकगोट बूढ़ दुरहि सँ देखवा मे अयला, हाक देलयन्हि कथी लेऽ सुनताह। डेगक नाप बढ़ावैत लग पहुँचल तऽ देखल जे कक्का नेहरू मन्हुआयल टहलैत छलाह। कुशल-क्षेम पुछलाक बाद, बाजलाह-रे पत्रकार-हम तऽ बुढ़ारी मे एहि धारक कात मे छी तऽ तौं कथी लेल टौआइत छÓ तोरा कोन विपति कपार पर आयल छ? हम बजलौ-विपतिक कोनो सीमा छै, यौ कक्का, बुझना जाइछ जे सभक सोच चालनि भऽ गेल छै, सभक भिन्ने बथान, किओ सोझेँ मुँहे गप्पे नहि करैत छै! बड़Ó झमारल छी, शान्ति तकबा लेल अहाँक शान्तिवन दिश्ï अवैत रही कि अहाँ पर नजरि पड़ल। संगहि आकांक्षा छल जे अपन पत्रिका मैथिली टाइम्सक लेल अहाँक साक्षात्कार लैतौं!&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बाजि उठलाह-'हमरा सँ साक्षात्कार! हमरा लग-वाँचले कि अछि, किछुओ तऽ नहि। कहै छÓ अपना केँ पत्रकार आर एतबो नहि ज्ञात छÓ जे शान्विनक शान्ति आब खत्म भऽ गेलै।Ó हम अकचकेलौ! मौन में तऽ बड़ऽ 'किछु फुड़ायल, लेकिन एकटा गप्प मौन पड़ल जे बेर पड़ैÓ तऽ गदहो के बाप कहि, 'आखिर हमरा तऽ हुनक साक्षात्कार चाही। झट सँ हम कागत निकालल, पेनक ठप्पी खोलि प्रस्तुत भेलौं इंटरभ्यूक लेल। कहलयन्हि कक्का चुनावक बाजार गर्म छै, सब कथूक भाव तेजी सँ बढि़ रहल छै, एहि संदर्भ मे अहाँक विचार सँ अवगत होमय चाहैत छी। कहलाह-बुरि कहाँ के। सत्ते मे तौं पत्रकार छह 'अधकपारी! हौ हमर उमरि नहि देखैत छह, चलऽ  छाहरि मे बैसि गप्प-सरकक्का करब। तोहर सभक तऽ एकमात्र सिद्धान्त भऽ गेल छह 'हम सुधरेगें, जग सुधरेगा; न सुधरेगें न सुधरने देंगें।Ó मौन मे आयल ठोकल जबाव दियैन्ह, लेकिन हड़बड़ी मे कोनो गड़बड़ी ने होअए आ प्रथम ग्रासे मक्षिकापात: नहिं भऽ जाए तेँ पुन: दाँत निपोडि़ हंसी के रहि गेलहुँ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हमर पहिल प्रश्र छल-अहाँक कांग्रेस पार्टी मे सभकेँ ऐना पड़ाहि कियैक लागि गेल छै? तहि पर कहलाह-हौ, आबक लोक अपना केँ बेसी एडवान्स बुझैत अछि। किओ गाय-महीस तऽ छै ने जकरा खूँटा मे खुटेंस कऽ राखल जा सकए। सभक-अपन सोच छै, ककरो तऽ बाध्य नहि ने कएल जा सकैए छैक।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हम पूछलयन्हि-सुनबा मे अबैत अछि जे नेतृत्वक कारणेँ सभ पार्टी छोडि़ रहल छथि, कि आहाँ नेतृत्वक कमजोरी मानैत छी? बजलाह-जदि नेतृत्व कमजोर पडि़ रहल छैक तऽ बाकी नेता सभ हिजड़ा छथि कि, किओ आगाँ बढि़ कऽ कमान सभालि लैथि। ई तऽ प्रजातन्त्र छै ने, जनता-जनार्दनक ध्यान तऽ अवश्ये राखय पड़तैक नहि तऽ कोपक सामना करबाक लेल तैयार रहथु।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हमर अगिला प्रश्र छल-कक्का! अहाँक कांग्रेस आई विपक्ष मे रहलाक कारणे सभ कथूक विरोधे टा करैत अछि, चाहे भारत-उदय हो अथवा राजगक एजेंडा? ऐना कियैक? चोट्टïे जबाव देलाह-विपक्षक काज छैक आलोचना केनाय, एकर मतलब ई नहि जे सभ कथूक विरोध कयल जाए। विरोधक लेल विरोध कयल जाए। जहाँ धरि हमर व्यक्तिगत सोच अछि-भारत उदयक विरोध नहि होबाक चाही। भारत निरंतर विकासक पथ पर बढि़ रहल अछि, एहि विकास क विरोध कियैक। कांग्रेसक शासनकाल मे जहन भारत पर्व आ मेरा भारत महानक नारा देल गेल छल तऽ विपक्षी दल एकर विरोध नहि कयलक। ओना चुनावक समय छै, एक-दोसरा पर छीटाकांशी तऽ चलितै रहैत छै।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;पूछलयन्हि-विपक्षी सभ निवर्तमान अध्यक्ष सोनिया गाँधी, केँ प्रधानमंत्रीक रूप मे विरोध कय रहल अछि! आ किछु बरख पूर्वहि कांग्रेस सेहो विदेशी मूलक सवाल पर टूटि चुकल अछि, कियैक नहि अहाँ सब संविधान मे एहि सँ संबंधित कोनो प्रावधान केलयहिं? कक्काक मौन विखिन्न भऽ गेलैन्ह, कहलैन्हि-हौ, कि बुझैत रहहिं जे एहनो समस्या ऐतै, सेहो हमरे खानदान मे। नहि जानि पूर्वजन्म मे कोन चूक भेल जे सभ कलंकियाहा एहि पार्टी आ हमरे खानदान मे आओल। जहन बेटी आन जाति आन धर्म मे वियाह कयलक तऽ कतेक-उठा-पठकक बाद मामिला शान्त भेल। कोहुना कऽ त्राण पओने छलौं। ई कलंकियाहा आन जाति आ धर्म के पूछय, विदेशीये के उठाकऽ लऽ अनलक। तिधर्मीए सऽ बियाह करबाक छलै तऽ कय-स-कए इन्दु जकाँ देसे मे करिता। कि बुझैत रहियै जे ओ पुतोहु राजनीति मे आओत आर एहि समस्या सँ जनता केँ जुझय पड़तैक। जे-से। जहन पुतोहु बनि गेल तऽ ओकर अधिकारक विरोध मे तऽ हम नहि ने किछुओ कहब आखिर हमरे खानदानक अछि ने।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;तहन जनताके अहाँ कि कहै छियैह जे सोनिया के प्रधानमंत्री बना दै? हम तऽ सेहो नहि कहलियह। हाँ जनमत के अपन महत्व छैक, सभटा रिमोट तऽ जनता लग छैक, जनता विवेक व बुद्धि सँ निर्णय लिअय तऽ सबटा तसवीर ओहिना सामने आबि जेतै। बुझना मे आयल जे कक्का केँ एक दिश अपन खानदान तऽ दोसर दिश्ï राष्टï्र प्रेम खिचि रहल छन्हि। एहि ऊहापोहक स्थिति मे हमर अगिला प्रश्र छल-सोनिया गाँधी किछु दिन पूर्वहि बजलीह जे उपप्रधानमंत्री-आडवाणी जी एकटा औरत सँ डरि कऽ फेरो रथ-यात्रा आरंभ कय रहल छथि। कि जनताक लेल ओ-मात्र एकटा औरत छथि, आर किछु नहि? ताहि पर कहैत छथि जतय धरि औरतक गप्प छै तऽ सोनिया अवश्ये औरत छथि। एकरा अलावे कांग्रेस अध्यक्षा आ भवी-प्रधानमंत्री सेहो छथि। हौ! तोरो सभ केँ कि कहियौ, तहूँ सभ पत्रकार ने बेमतलब के तिलक-तार घींचैत रहैत छह। ऐना कहूँ भेलै यै। हमरो बेटीतऽ महिला रहैत प्रधानमंत्री आ पार्टी अध्यक्ष छल। बेचारी सोनिया लग राजनीतिक अनुभव थोड़ेक कम छै, ताहिं तहूँ सभ रहि-रहि कऽ उकट्ïठि करैत रहैत छह। जा, आर किओ नहि छह! आई-काल्हिं एतेक जे घोटाला पर घोटाला भऽ रहल छैक, मार-काट ताहि पर कथीक लेल नहि ध्यान दैत छहक। हमर खानदान मे आन जाति, विदेशी सँ वियाह कि कयलक तौं सब सदिखन चर्चाक बाजार गर्मोने रहैत छह। कि दोसरो पार्टी सभ मे दुर्गुण नहि छै कि? आन सब दूधक धोल छथि आ कि गंगाजलक बोतल उठाकऽ सप्पत खेने छथि। तहूँ सब आब नेता जकाँ चाटुकार भऽ गेल छह। हमरा लग आब तोरा सन-सन चाटुकर लोकक लेल फुर्सति नहिं अछि। सभ केँ चीन्हि लेल।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एतबे मे हमर निन्न टूटि गेल मुदा एतबेऽ संतोष अछि जे सपने मे सही पत्रकार जकाँ केकरो साक्षात्कार तऽ लेल। सेहो कक्का नेहरू सन महापुरुष केर।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-119902252748942100?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/119902252748942100/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=119902252748942100&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/119902252748942100'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/119902252748942100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/09/blog-post_18.html' title='जो रे कलंकियाहा!'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-2083046210238937636</id><published>2009-09-12T00:36:00.000-05:00</published><updated>2009-09-12T00:37:20.113-05:00</updated><title type='text'>मंहगाई</title><content type='html'>&lt;p&gt;आई बडकी काकी’क आयु सौ वर्ष पुर्ण भ’ गेलन्हि.बडकी काकी के पोता दरिभंगा सं आयल छैन्हि आ जल्दी जयबाक हेतु तैयार भ रहल छैन्हि..काकी दौडि कय गुड्डू’क दोकान जा दू लीटर सरिसो तेल आ पांच किलो चाउर कीन अनलीह सनेस भेजबाक लेल. पोता कहलकन्हि"दाय,एतेक सौख छौ त’ पाईये कियेक नै भेज दै छहुन्ह बेटा के?"काकी बजलीह "हौ, गुड्डू के दोकान कोनो दूर छैक.पोता तमसा गेलन्हि आ कहय लगलन्हि"तू बूढ भ’ गेलैंह,बुधि नहि काज करैत छौ.आब कियो मोटरी भेजैत छै?""बुधि त’ लोकक नै काज करैत छैक?"- काकी बाजय लगलीह-"जहिया लोक मोटरी सनेस भेजैत रहय,हम पाई भेजैत रही,आब हम पाई के बदला मे मोटरिये भेजैत छी.कारण जे आब त’ जतेक भारी मोटरी ओतबे भारी पाई.देखै नै छहक कते मह्गाई बढि गेलैक.मोटरी ल’ जा ई पाइ स हल्लुक पडतह."&lt;/p&gt;&lt;p&gt;- अरविन्द झा&lt;br /&gt;बिलासपुर &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-2083046210238937636?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/2083046210238937636/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=2083046210238937636&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2083046210238937636'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2083046210238937636'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/09/blog-post_12.html' title='मंहगाई'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-2160899107425463411</id><published>2009-09-11T00:25:00.001-05:00</published><updated>2009-09-11T00:27:56.980-05:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खेलकूद'/><title type='text'>जीवन मे खेल-कूदक महत्त्व</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;खेलकूदक इतिहास प्राय: ओतबै पुरान अछि जतेक मानव सभ्यता। आदि कालहि सँ खेलकूद मानव जीवनक एकटा अभिन्न अंग रहल अछि। समय प्रवाह मे एकर रूप आ प्रकार मे परिवर्तन होइत रहल अछि आ एकर वर्तमान स्वरूप विस्मयकारी ढंगे विपुल तथा बहु आयामी भऽ गेल अछि। खेलकूदक प्राचीन परम्परा मे एथलेटिक्स खेलक बड़Ó महत्वपूर्ण स्थान छल आ एकर उद्ïगम प्राचीन मिस्रक सभ्यता मे भेटैछ। एथलेटिक्स शब्दक शाब्दिक अर्थ होइछ 'इनामक खेल प्रतियोगिताÓ आ एहि तरहेँ प्रतियोगिता भावनाकेँ आरोपित करैछ। खेल मे बहुत रास खेल सभ सम्मिलित कएल गेल अछि जेना विविध प्रकारक दौड़-कूद, मुक्केबाजी, कुश्ती, गोला फेंक, भाला फेंक, तलवार बाजी, भारोत्तोलन, तीरंदाजी, विभिन्न प्रकारक तैराकी आ शारीरिक व्यायाम संगहि मैदान मे खेलबा योग्य खेल जेना क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, हैण्डबॉल, टेनिस अछि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;स्वस्थ जीवनयापनक हेतु आवश्यक शर्त सभ मे खूलकूद एकटा विशिष्टï स्थान रखैत अछि। खेलकूद तऽ मनुष्य मात्रक लेल बड़Ó महत्वपूर्ण होइछ, मुदा अवस्था आ मनेवृत्तिक अनुसारेँ ओकर रूप बदलि जाइत छैक। यथा बाल्यावस्था सँ किशोरावस्था तक लोक सक्रिय आ प्रत्यक्ष रूपे खेलकूद मे भाग लैत अछि। एकरा बादक अवस्था मे किछु व्यक्ति एकटा योगासनक रूप मे तथा किछु भोर-सांझ टहलवाक रूप मे अपनबैत छथि। रूप एकर चाहे किछुओ होइहि किन्तु एकर उद्देश्य आ परिणाम एक्के होइत छैक। जेना मशीन वा कोनो यंत्रकेँ सुचारू रूप सँ चलयबाक लेल समय-समय पर ओकर झाड़-पोंछ, तेल-पानि इत्यादिक जरूरत होइछ ततबे यंत्र रूपी एहि मानव शरीर केँ स्वस्थ, सुन्नर, सुडौल, मजबूत एवं दीर्घायु बनएवाक हेतु खेलकूद आवश्यक होइछ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;छात्र लोकनिक बहुमुखी व्यक्तित्वक विकास मे खेलकूद बड़Ó विशेष महत्व छैक। कहल गेल अछि जे— च्च्स्शह्वठ्ठस्र द्वद्बठ्ठस्र द्बठ्ठ ड्ड ह्यशह्वठ्ठस्र ड्ढशस्र4ज्ज् अर्थात्ï स्वस्थ मनुष्ये सँ मानसिक आ बौद्धिक प्रौढ़ताक अपेक्षा कएल जा सकैछ। खेलला कूदला सँ शारीरिक व्यायाम होइछ जाहि सँ मांसपेशी कडग़र, हड्डïी चौडग़र आ सुसंगठित बनैत अछि। एहि सँ शरीरक प्रत्येक भाग मे होमय वला रक्त संचार सेहो नियंत्रित होइछ, जे रक्त चाप आ हृदय गति केँ नियंत्रित करैत अछि। खेलकूद मनुष्य मे एकटा जागृति जगबैत अछि जकरा द्वारा हमरा लोकनि एक दल, एक समूह मे रहि कोनो खास उद्देश्यक पूर्तिक हेतु अनुशासित ढंगे प्रयास करबाक कला सीखैत छी। खुलल वातावरण तथा स्वच्छ वायु मे खेलकूद शरीर मे स्फूर्ति दैछ, शरीरकेँ तन्दुरूस्त बनबैछ आ मुखमंडल पर आभा जगबैछ जाहि सँ प्रभावशाली व्यक्तित्वक निर्माण मे सहायता भेटैत छैक। बन्द कोठरी मे बैसि निरन्तर विद्याभ्यासये रत रहला सँ शरीर कमजोर भऽ जाइछ आ खसि पड़ैछ जे आगा पुन: अध्ययन कार्य मे बाधा उपस्थित करऽ लगैत अछि, ताहिं एकर निवारणक लेल खेलकूद बड़Ó आवश्यक भऽ जाइछ।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;विभिन्न खेलक लेल स्थापित किछु खास नियम सभ केँ अनिवार्य रूपेँ पालन करबाक अभ्यास जीवनक कोनो क्षेत्र मे विकास, उन्नति ओ प्रगतिक मार्ग प्रशस्त करैछ। ई क्रीड़ा परस्पर सहयोग आओर नियमक प्रति सजगता बढ़बैछ, आत्म नियंत्रणक कला सीखबैछ, सभक हित मे आत्म त्याग, करबाक भावना जगबैत अछि। संगहि उत्थान-पतन, हार-जीत आदि मे स्थित प्रज्ञ (निष्काम कर्मयोगी) बनबाक नैतिक शिक्षा सेहो प्रदान करैत अछि। विभिन्न खेलक क्रम मे खान-पानक संदर्भ मे घोषित आ निर्धारित नियमक पालन कएला सँ आत्म संयम आ कठोर इच्छा शक्ति विकसित होइत अछि। जे जीवन मे सतत्ï कोनो ने कोनो रूपेँ लाभकारी सिद्ध होइत रहैछ। क्रीड़ा मनुष्य मे अदम्य साहस, उत्साह तथा धैर्य प्रदान करैत अछि। एहि सँ हमरा लोकनि केँ विकट सँ विकट परिस्थिति मे अंत समय धरि पूर्ण लगन, निष्ठïा आ उत्साह सँ कार्य करैत रहबाक प्रेरणा भेटैत अछि। एकटा नीक खेलाड़ी सतत सजग एवं सतर्क रहैत अछि। एहि तरहेँ ई अनुकरणीय चरित्र निर्माणक मार्ग प्रशस्त करैछ। दू वास्तविक खेलाड़ीक बीच सतत स्वस्थ एवं लाभकारी प्रतिस्पर्धाक भावना देखबा मे अबैछ चाहे ओ जीवनक कोनो क्षेत्र वा शास्त्रक कोनहुँ विधा हो।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हिन्दू दर्शन मे कहल गेल अछि—आत्मा वा अरे द्रष्टïव्य: अर्थात्ï अखिल विश्व मे आत्मा सँ साक्षात्कार करब इएह टा एकमात्र दर्शनीय वस्तु थीक। मुदा एकरो चरितार्थ करबा लेल पूर्णरूपेण शरीर सँ स्वस्थ होयब अनिवार्य थीक। आ एहि हेतु खेलकूद व्यायाम आ योगासन आवश्यक अछि। स्वस्थ शरीर खाली कार्यक परिणाम आ मात्रे टा नहि अपिक ओकर गुणात्मकता के सेहो परिवद्र्धित आ परिष्कृत करैछ। कमजोर आ अस्वस्थ व्यक्ति कोनो कत्र्तव्यक निर्वाह नीक जकाँ नञि कऽ सकैत छथि। किएक तऽ ओ सर्वदा दोसर दिस एकटा पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति असंभव आ असाधारणो कार्य केँ अपन आत्मबल सँ संभव आ सुलभ बना दैत छथि। खेलक क्षेत्र मे हम परस्पर सहयोगक भावना सँ प्रेरित भऽ अपन व्यक्तिगत अस्तित्वकेँ दलक अस्तित्वक संगे जोडि़ लैत छी। खेल समाप्त भेलाक बाद दू दलक खेलाड़ी परस्पर ओहि सौहाद्र्र सँ मिलैत छथि जेना निकटतम मित्र। जीवन सेहो एकआ पैघ खेल क्षेत्र थीक आ एहि हेतु हमरा लोकनि खेलक आदर्श सभकेँ आत्मसात कय ली बड़ जीवन बड़Ó सुखी आ गरिमामण्डित भऽ जायत।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एखनुका समय मे खेलकूद प्रांतीय आ राष्टï्रीय सीमा-परिसीमा केँ लाँघि अंतर्राष्टï्रीय स्तर पर स्थापित भऽ चुकल अछि। कोनो मान्यता प्राप्त खेलक खेलाड़ी अपन व्यक्तिगत क्षमता, प्रतिभा आ प्रदर्शन सँ सगरो ख्याति पबैत छथि आ ओ जाहि देशक रहनिहार छथि तकर प्रतिष्ठïा सेहो बढि़ जाइछ। ई क्रीड़ा आब मात्र एकटा मनोरंजक साधन आ स्वस्थ जीवनक कुंजीए नहि रहल अपितु ई व्यावसायिक रूप सेहो प्राप्त कऽ चुकल अछि। विविध खेल मे बहुतोक एहन प्रतिभावान खेलाड़ी छथि जे खेलक बलेँ विविध सेवा मे नीक स्थान प्राप्त कयलनि अछि। खेल मे विशिष्ट ख्याति प्राप्त आ प्रमाण पत्र प्राप्त व्यक्ति केँ नौकरी मे एहि आधार पर अतिरिक्त अंक सेहो भेटैत छैन्हि। टेनिस, मुक्केबाजी आ फुटबॉल व्यावसायिक आ आर्थिक दृष्टिïएँ सभसँ लाभकारी खेल अछि जकर विजेता अत्यल्प समय मे विपुल धन राशिक स्वामी बनि जाइत छथि।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मुदा 'अति सर्वत्र वर्जयेतÓ तेँ सामान्य व्यक्ति केँ खेलकूद आ व्यायाम मात्र स्वास्थ्य प्राप्तिक उद्देश्य रखबाक चाही। अत्यधिक खेलकूद आ व्यायाम सेहो शरीरक लेल हानिकारक भऽ जायत आ विविधि प्रकारक असंतुलन आ रोग केँ आमंत्रित करत संगहि 'शरीर माध्यम खलु धर्मसाधनम्ïÓ केर जे हमरा लोकनिक मूल मंत्र अछि, से विफल आ अप्रासंगिक भऽ जायत।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-2160899107425463411?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/2160899107425463411/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=2160899107425463411&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2160899107425463411'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2160899107425463411'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/09/blog-post_11.html' title='जीवन मे खेल-कूदक महत्त्व'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-1807498725297182261</id><published>2009-09-08T04:24:00.002-05:00</published><updated>2009-09-08T04:34:55.513-05:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कला'/><title type='text'>चौंसठ कला</title><content type='html'>किछु गप्प ऐहन होइत छैक जकरा बारे मे कतेक बेर कतेको आदमी सँ सुनैत छी, मुदा ओ गप्प आखिर छै कि आ कियैक बाजल जाइत अछि। एकर तह मे जयबाक कोनो विशेष प्रयोजन नहि बुझैत छियैह। ऐहने एकटा सुनल जानल शब्द अछि 'चौंसठ कलाÓ, जे बहुत पहिनहिं सँ सुनबा मे आबि रहल अछि। लेकिन बहुत कम लोक केँ एकर अवगति छैन्हि जे सरिपहुँ ई चौंसठों कला होइत छै कि?&lt;br /&gt;कहल जाइछ जे अजुका समय मे यदि एहि चौंसठ कला मे सँ नारी मे बीसोटा भेटि जाय तऽ ओ नारी गुणी छथि। जँ किनको मे चौंसठों कला हेतैन्ह तऽ नि:संकोच ओ पद्ïमावती सदृश हेतीह, जिनक गुण आ रूप-लावण्य पर साधारण मनुक्खक कोन कथा देवता सेहो मोहित होबाऽ सँ नहि बँचि पबैत छथि। जकर सीथ मे मोती हुअए, मुंह चन्द्रमा केर समान होइ, भौं धनुष जकाँ प्रतीत होइहि, जे अपन नयनाक कटार सँ जगत्प्राणी के घायल करैथ, जिनक लाल-लाल ठोर रस सँ भरल होइन्हि, ऐहन स्त्री जँ चौंसठों कला सँ परिपूर्ण होथि तऽ हुनका लेल पुरुष भेटब दुर्लभ जे हिनक वरण कए पबथिन्ह। ऐहन सुंदरी या तऽ स्वयंवर रचा अपन पति स्वयं पसिन्न करतीह अथवा दुष्यंतक शकुंतला वा कृष्णक राधा हेतीह। भऽ सकैछ फेर सँ सिंहल द्वीप बनै वा दुबारा राजा रत्नसेनक जन्म होइन्हि।&lt;br /&gt;आई-काल्हिं जखने लड़कीक गुणक चर्चा होइत अछि सहजहिं सभक ठोर पर चौंसठ कला आबिए जाइत अछि, कारण पुरनका समय मे चौंसठों कला सँ परिपूर्ण स्त्रीये सर्वगुण सम्पन्न मानल जाइत छलीह। आखिर ई चौंसठों कला अछि की? जे मन के उद्वेलित कय रहल अछि। जँ पड़ताल कएल जाय तऽ साहित्य संस्कृति मे चौंसठ कलाक परिचय एहि प्रकारेँ भेटैत अछि :&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गायन&lt;br /&gt; वाद्य विद्या&lt;br /&gt;नृत्य कलाक ज्ञान&lt;br /&gt;नाट्ïयकलाक ज्ञान&lt;br /&gt;चित्रकारी केनाय&lt;br /&gt;बेल-बूटा बनायब&lt;br /&gt;चाऊरक आँटा आ फूल सँ रंगोली (अरिपन) बनायब&lt;br /&gt;रंग-बिरंगी पाथर सँ फर्श सजेनाय&lt;br /&gt;मौसमक हिसाबे कपड़ा पहिरबक ज्ञान&lt;br /&gt;समय आ ऋतुक हिसाबे शैय्या रचनाक ज्ञान&lt;br /&gt;जलक्रीड़ा जानब&lt;br /&gt;जलतरंग बजेनाय&lt;br /&gt;पुष्पाहार आदि बनायब&lt;br /&gt; वेणी बनेनाय&lt;br /&gt;सुगंधित द्रवक ज्ञान&lt;br /&gt;विभिन्न प्रकारक कपड़ा लत्ता पहिरबक ज्ञान&lt;br /&gt;फूलक आभूषण बनाऽ पूरा देह के सजेबाक ज्ञान&lt;br /&gt; इंद्रजालिक योग में निपुण&lt;br /&gt;सौंदर्यवद्र्धक वस्तुक ज्ञान&lt;br /&gt;नबका-नबका व्यंजन बनायब&lt;br /&gt;सिलाई मे निपुणता&lt;br /&gt;कईक प्रकारक शर्बत आ आसव बनाय&lt;br /&gt; कढ़ाई मे निपुणता&lt;br /&gt;कठपुतली बनायब आ ओकरा नचायब&lt;br /&gt;वीणा आ डमरू बजेनाय&lt;br /&gt;मुरूत बनेनाय&lt;br /&gt;ग्रंथक ज्ञान&lt;br /&gt;नाट्ïय सिनेमाक अवगति&lt;br /&gt;कूटनीति मे दक्षता&lt;br /&gt;पटिया गलीचा आदि बनायब&lt;br /&gt;विभिन्न समस्याक समाधान केनाय&lt;br /&gt;घर-निर्माणक जानकारी&lt;br /&gt;बढ़ईक थोर-मोर काजक ज्ञान&lt;br /&gt; रत्न चिह्नïनाई&lt;br /&gt; मणिक रंग बुझनाय&lt;br /&gt; बागवानीक शौक&lt;br /&gt;पौधा सभक जानकारी&lt;br /&gt;  मुर्गा तीतर के लड़ेनाय&lt;br /&gt; तोता-मैना के पढ़ेनाय&lt;br /&gt;पक्षी-पालन&lt;br /&gt;बहुभाषी होयब कम सँ कम दू भाषाक ज्ञान&lt;br /&gt;इशारा सँ बातचीत करब&lt;br /&gt;नबका-नबका बोली निकालब&lt;br /&gt;नीक-बेजायक पहचान&lt;br /&gt; काव्यके बुझबाक शक्ति&lt;br /&gt;स्मरणशक्ति नीक&lt;br /&gt;पहेली बुझायब&lt;br /&gt; सांकेतिक भाषा मे गप्प केनाय&lt;br /&gt; मन मे कटक रचना केनाय&lt;br /&gt; समस्त कोषक ज्ञान&lt;br /&gt; छंद ज्ञान&lt;br /&gt;वेदक ज्ञान&lt;br /&gt;खिलौना निर्मित केनाय&lt;br /&gt;चौसर आ ताश खेलनाय&lt;br /&gt;बच्चाक खेलक ज्ञान&lt;br /&gt;उबटन आ मालिशक ज्ञान&lt;br /&gt;घरक साफ-सफाई केनाय&lt;br /&gt; पैघक आदर आ सम्मान&lt;br /&gt;आज्ञाकारी&lt;br /&gt;मधुर व्यवहार&lt;br /&gt; मृदु व मितभाषी&lt;br /&gt; छन्दबद्ध रचना केनाय&lt;br /&gt; मितव्ययी&lt;br /&gt;अस्त्र-शस्त्र ज्ञान&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-1807498725297182261?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/1807498725297182261/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=1807498725297182261&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1807498725297182261'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1807498725297182261'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/09/blog-post_08.html' title='चौंसठ कला'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-1127805942573909150</id><published>2009-09-07T00:53:00.003-05:00</published><updated>2009-09-07T01:00:35.271-05:00</updated><title type='text'>अभिव्यक्ति</title><content type='html'>अभिव्यक्ति&lt;br /&gt;सुखायल पात जका&lt;br /&gt;हुनका लोकनिक गप्प&lt;br /&gt;उरैत अछि स्वतन्त्र आकाश मे,&lt;br /&gt;छू लैत अछि&lt;br /&gt;गगनचुम्बी महल के,&lt;br /&gt;सैट जाइत अछि&lt;br /&gt;खुब पैघ पोस्टर स’,&lt;br /&gt;तेज चलैत अछि&lt;br /&gt;कार के काफ़िला के सन्ग.&lt;br /&gt;मुदा हमर सभहक बात&lt;br /&gt;पानि मे फेकल पाथर जका&lt;br /&gt;डूबि जाइत अछि,&lt;br /&gt;विलीन भ जाइत अछि,&lt;br /&gt;ओहि मे वजन होइत छैक&lt;br /&gt;तैयो स्तित्व नहि।&lt;br /&gt;किछु साल बाद&lt;br /&gt;माटिक गादि मे दबि&lt;br /&gt;भुमिगत भ जाइत अछि&lt;br /&gt;एहन अभिव्यक्ति के कि अर्थ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- अरविन्द झा&lt;br /&gt;बिलासपुर&lt;br /&gt;09752475481&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-1127805942573909150?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/1127805942573909150/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=1127805942573909150&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1127805942573909150'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/1127805942573909150'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/09/blog-post_07.html' title='अभिव्यक्ति'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-6730174635200386313</id><published>2009-09-04T03:14:00.002-05:00</published><updated>2009-09-04T03:17:17.266-05:00</updated><title type='text'>रस्ता</title><content type='html'>आदमी&lt;br /&gt;विचार सँ पैघ होइत छै&lt;br /&gt;वैभव आ अभिमान सँ नहि&lt;br /&gt;जनैत छी&lt;br /&gt;विचारक फुनगी पर&lt;br /&gt;आदमीक प्रवृति टाँगल रहैत अछि&lt;br /&gt;आ ओकर प्रारब्ध&lt;br /&gt;कर्मक गति तकैत अछि&lt;br /&gt;तत्पश्चात्ï&lt;br /&gt;आदमी, आदमी बनैत अछि।&lt;br /&gt;हम अहाँक उपदेशक नहि&lt;br /&gt;हम त मानधन छी&lt;br /&gt;हमर औकात तऽ&lt;br /&gt;एकटा चुट्टी सन अछि&lt;br /&gt;जकर मालगुजारी&lt;br /&gt;हम अपन शब्दक रूप मे अभिव्यक्त करैत छी।&lt;br /&gt;हमर बात मानब त सुनू&lt;br /&gt;अहाँ अपन मनोवृति के बदलु&lt;br /&gt;एहिठाम अहाँ के सभ किछु भेटत&lt;br /&gt;जकरा अहाँ प्राप्त कए सकी&lt;br /&gt;मुदा भाई लोकनि&lt;br /&gt;रस्ता दूटा अछि&lt;br /&gt;पहिने आश्वस्त भए जाउ&lt;br /&gt;जे कोन रस्ता कतए जाइत अछि।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;—सतीश चंद्र झा&lt;br /&gt;9810231588&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-6730174635200386313?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/6730174635200386313/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=6730174635200386313&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6730174635200386313'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/6730174635200386313'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/09/blog-post_04.html' title='रस्ता'/><author><name>बिपिन बादल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16014292250857946792</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_JuKwUmjXx6s/SXlaA2WUQvI/AAAAAAAAABM/QK4ZRAXuODU/S220/badal+ji.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-44764291636367832</id><published>2009-09-03T03:51:00.000-05:00</published><updated>2009-09-03T04:02:55.823-05:00</updated><title type='text'>बाढि़ बनाम जल प्रबंधन</title><content type='html'>जल जीवन अछि। जीवन अछि जल। व्याप्त अछि बरोबरि प्रकृति मे, पृथ्वी पर, हमरा-अहाँ केँ शरीर मे। एकर बिना जीवनक नहि भऽ सकैत अछि कल्पना। मुदा जल मचा दैत अछि त्राहिमाम—न्यून उपलब्धता मे आ अपन अधिकता मे। 'अतिÓ—आनैत अछि विपत्ति। कमी वा बेसी, सुखाड़ वा बाढि़ होइत अछि प्रलयकारी।&lt;br /&gt;प्रलय अनिष्टï सूचक अछि। रोंइयां ठाढ़ भऽ जाइत छैक, देह सिहरि जाइत छैक सोचला मात्र सँ। मानवीय होय वा प्राकृतिक- होइत अछि ई विनाशक। तैँ आवश्यक अछि प्रतिकार। सोचय पड़त विकल्प, ताकए पड़त समाधान। भागीरथी प्रयासक करए पड़त संधान। सुरक्षा लेल आवश्यक छैक-श्रम, स शक्ति, संपत्ति आ सामथ्र्यक प्रबंधन।&lt;br /&gt;प्रबंधन जटिल होइत छैक अपना वृहत स्वरूप मे। ऊर्जा आ बहुत रास सामूहिक प्रयासक समन्वय अछि प्रबंधन। वृहत योजना आ गंभीर चिंतन। दूर दृष्टिï आ व्यापक अध्ययन। तखने कल्याणकारी आ सटीक भऽ सकैत अछि प्रबंधन। रोकल जा सकैत अछि क्षय संपत्ति, माल आ जानक।&lt;br /&gt;प्रतिवर्ष सैकड़ो जान आ करोड़ोंक संपत्ति स्वाहा। जल-जमाऊ के असरि रहैत अछि कतेको दिन। बाधित परिवहन आ पंगु जीवन। बीमारी-महामारी मँगनी मे, सँपकट्टïीक विशेष उपहार। दंश झेलैत छी चुपचाप। अभिशप्त जेना विधवा प्रलाप। मुखर अपेक्षा, मौन सरोकार। आत्मसात जेना संस्कार। भविष्य निर्धारित कऽ सकैत अछि वर्तमान। वर्तमान बुझबा लेल देखए पड़त अतीत।&lt;br /&gt;अतीत मे स्व. डॉ. लक्ष्मण झा देखौलन्हि वेभेल परियोजनाक प्रारूप। बाढि़ पर गंभीर मनन। समाजक गहींर चिंतन। बुझि नहि सकल अज्ञानी मन, तैं नरकीय बनल रहल जीवन। फेर सँ उठल अछि आवाज। नव आगाज। नव सुगबुगाहट। नव सूत्र। नवीन अध्याय। डैम आ पनबिजली! स्थायी निदान? बाढि़क समाधान? नव शुरुआत?&lt;br /&gt;शुरुआत सँ जुड़ल अछि अंत। निर्माण सँ विध्वंस। डैमक निर्माण आ कि लाखो-करोड़ोक विस्थापन। भूमिक अधिग्रहण। खतरा मे पर्यावरण। कतेको आपदा-विपदा केँ आमंत्रण। की तैयार छी? उद्वेलित भावना, सहि सकत आर्थिक/अस्तित्ववादी प्रताडऩा? सुरसाकेँ मुंह जेंका पसरल समस्या। अस्तित्वक कतेको यक्ष प्रश्न। बहुत रास चिंतन। अनवरत मंथन। वैचारिक मंदारक अछि प्रयोजन। अमृत? विष? वा दुनु? पचा सकब? तैं डेग बढ़ौला सँ पहिनेए लेमय पड़त निर्णय। अपना लेल, भविष्य लेल, पीढ़ी दर पीढ़ी लेल। स्वागत, प्रत्येक कल्याणकारी निर्णयके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-44764291636367832?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/44764291636367832/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=44764291636367832&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/44764291636367832'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/44764291636367832'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='बाढि़ बनाम जल प्रबंधन'/><author><name>बिपिन बादल</name><uri>http://www.blogger.com/profile/16014292250857946792</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_JuKwUmjXx6s/SXlaA2WUQvI/AAAAAAAAABM/QK4ZRAXuODU/S220/badal+ji.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-2504565129950644983</id><published>2009-08-31T23:46:00.001-05:00</published><updated>2009-08-31T23:50:38.167-05:00</updated><title type='text'>काज</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;बेटा पूछलक हमरा-&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;मां, हमरा कीयाऽ कनेलहुं&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कनि धीरे सऽ बाजल हम&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;अहाँ कीयाऽ हमरा तमसेलौं&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;कनैत-कनैत बाजल ओ&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हम तामस नहि दियेलहुं&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;हम चप्पल नहि हरेलहुं&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;ओ तऽ हरा गेल अपनेहि&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एखन तऽ हम&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;करैत रही काज&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;फाड़ैत रही किताब।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;—कुलीना रुबी&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1760048263699541726-2504565129950644983?l=maithilitimesonline.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/feeds/2504565129950644983/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1760048263699541726&amp;postID=2504565129950644983&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2504565129950644983'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1760048263699541726/posts/default/2504565129950644983'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://maithilitimesonline.blogspot.com/2009/08/blog-post_31.html' title='काज'/><author><name>सुभाष चन्द्र</name><uri>http://www.blogger.com/profile/00163673662608636927</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='23' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_jtYT_V3wFTo/SXmS4y2q4CI/AAAAAAAAABQ/mT7waAR6TEw/S220/subhash.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1760048263699541726.post-7513681416890660835</id><published>2009-08-28T04:29:00.001-05:00</published><updated>2009-08-28T04:32:35.064-05:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैथिल'/><title type='text'>मिथिलाक उद्धार करु सरकार</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;अहाँ मैथिल? अछि क्षेत्र, भाषा, संस्कृति आ विरासत केर ह्रïासक चिंता? तहन किऐक धएने छी हाथ पर हाथ? चलु करी मिथिलाक उद्धार। बहुत आसान छैक सरकार, अहाँ होऊ तँ तैयार। जाति, उम्र, शिक्षा नहि ककरो दरकार। अहीं याचक, अहीं मुखतार। दोसरक पूंजी, अहांक पगार। आमद केर स्रोत हजार। सामाजिक प्रतिष्ठïा बोनस भजार। चंदाक हथकंडा पर चलत व्यापार।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;बुझि तँ गेल होइबै अपनेहियों, हम की कहए चाहैत छी। भरि देश मे बहुत-बहुत रास काज लेल शतकोटि संख्या मे लोग अपन प्रत्यक्ष भागीदारी कÓ रहल छथि, बिना सरकारी मुलाजिम बनने। मिथिला मे तें ई प्रथा खास प्रचलित भÓ गेल अछि। सच पुछु तँ एहि मामला मे अंतर्राष्टï्रीय स्तर पर मिथिलाक खिलाफ बड़का साजिश भेल अछि। हम शपथपूर्वक कहबाक लेल तैयार छी जे दुनियाके कोनो देश मे कोनो एक क्षेत्रक नाम पर एतेक संस्था नहि छैक जतेक मिथिला मे अछि। क्षेत्र, भाषा, संस्कृति, कला, साहित्य कें के पूछए सामाजिक आ राजनीतिक स्तर पर जतेक संस्था, भरि देश मे हम आवासी वा प्रवासी मिथिलावासी कागत पर बना रखने छी, ओतेक संस्था तँ कतहु नहि अछि। संचार क्षेत्र मे एतेक विकासक बादो मिथिलाक एहि उपलब्धि पर विश्व समुदाय हमरा लोकनि के पुरस्कृत वा सम्मानित करबाक मामला पर गांधीजीक बानर जेंका मुंह, कान आ आंखि बंद कएने अछि। एतेÓ तक जे एहि क्षेत्र मे हमरा लोकनिक नाम 'गिनिज बुक आफ वल्र्ड रेकार्डÓ तक मे शामिल नहि कएने अछि। की ई भारत खासकऽ मिथिलाक विरुद्ध अंतर्राष्टï्रीय षड्ïयंत्र नहि अछि? भूमंडलीकरणक दौर मे विकासक लेल कटिबद्ध एतेक संस्था बला क्षेत्रक उपेक्षा कोना जायज मानल जा सकैत अछि? तैँ हे मिथिलाक कर्णधार लोकनि, आऊ हम सब मिलि गोटेक हजार संस्था एहि नाम पर बना क्षेत्रक उद्धार आ अंतर्राष्टï्रीय साजिशक पर्दाफाश करैत नव जागृतिक बिगुल बजाबी आ संस्था जगतक इतिहास मे अपन क्षेत्रक नाम रोशन करी। ओना परोक्षक बात छैक, हम (व्यक्तिगत स्तर पर) अंतर्राष्टï्रीय मंचक भलमानसहतक एहि अर्थ मे ऋणी सेहो छी जे विश्व जगत कान, आंखि आ मुंह संग अपन नाक (गांधीजी केर बानरक विकसित मॉडल) सेहो बंद कएने अछि, नहि तऽओ अपनो सबहक संस्थाक विषैण गंध सेहो सूँघि सकैत छल जाहि सँ अपन आपसी दुर-छियाक संस्कार आ संस्कृति भारी अप्रकृतिक कारण बनि सकैत छल।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;एहि सँ हतोत्साहित वा निराश होयबाक आवश्यकता नहि अछि। आखिर एतेक छोट अपकृतिक संभावना सँ डरेबाक लेल तँ हमरा लोकनि 'शत्रुघ्न सिन्हा फैन्स क्लबÓ सँ लऽ 'मैथिल अल्पसंख्यकÓ धरि महान आ समर्पित उद्देश्यवला संगठन तँ नहि बनौने छी ने यौ? 'अखिल भारतीयÓ आ 'अंतर्राष्टï्रीयÓ स्तर पर संगठन/संस्था हम की ओहिना बना लेने छी। देशक प्रत्येक कोन मे जतए दसो गोट मैथिल पहुंचि गेल होथि ओहि ठाम मिथिला आ मैथिलीक उद्धारक उद्देश्य सँ एगो संस्थाक आविर्भाव भऽ जाइत अछि। ई दीगर बात अछि जे एहि सबहक बावजूद मैथिली नहि तऽ अष्टïम सूची मे स्थान पाबि सकलीह आ नहिए मैथिलीक मूल लिपि 'मिथिलाक्षरÓ प्रचलन मे आबि सकल अछि। मिथिलाक संस्कृति अलोपित होमए लागल अछि। पंजाबक लस्सी आ 'मकई दी रोटी, सरसों दा सागÓ आ बंगालक 'माछा भातÓ आ दक्षिण भारतीय व्यंजन भरि देश मे भाषा सँ इतर सेहो अपन अलग पहचान बना लेने अछि आ लोकप्रिय भऽ रहल अछि। की बंगाली लोकनि हमरा सभ सँ बेसी माछ-भात खाइत छथि? मुदा ई हुनक पहचान सँ जुडि़ गेल छन्हि। हमर तिलकोर, दही-चूड़ा, मखान आ कि आनो कोनो व्यंजन क्षेत्रीय पहचानक अंग बनि सकल अछि? जहां तक भाषायी प्रतिबद्धताक प्रश्न अछि मिथिला-मैथिली सँ जुड़ल संस्था/संगठनक पदाधिकारियो लोकनि कतेक मैथिली बजैत छथि से सर्वविदित अछि। तेँ गाम-गाम चौक-चौराहा आ घर तक मे मैथिली उपेक्षित होमय लगली हँ। प्रवासी लोकनि के बात तऽ छोडि़ दिअऽ मिथिला मे रहनिहार प्रबुद्ध आ सम्मानित लोकनि सेहो अपना के कथित तौर पर 'आधुनिकÓ साबित करैत घरो मे दोसर भाषा बाजब शानक बात बुझैत छथि। प्रबुद्ध प्रवासी लोकनि अपना बच्चा के हिन्दी, अंग्रेजी आ स्थानीय क्षेत्रीय भाषा (पंजाबी, बंगला, मराठी आदि) के ज्ञान तऽ आवश्यक रूपें दैत छथिन। मुदा मैथिली ''बच्चा के पैघ भेला पर स्वेच्छाÓÓ पर छोडि़ देल जाइत अछि, कारण यदि बच्चा घर मे मैथिली बाजत तऽ ई ओकर 'विशुद्ध हिन्दी उच्चारणÓ मे बाधक भऽ जयतैक। मिथिला मैथिली के 
