मंगलवार, मार्च 3

कविता / हम विशवविजयी

- कंचन

नव ज्योति एतय परकाश हेतै,
तै आस मे जन-जन बैसल छी।
जँ हमहिं जराबी दीप एतय,
नहि ई बूझी हम एकसरि छी।
सभ गोटे जँ निकलब भीड. हेतै,
नव धवल गगन कें चीर हेतै।
मन नाचत हम सब गाबि उठब,
सभ दिस तम केर ना’ा हेतै।
तू की कहलै हम की सुनलहुँ,
एहि बातक नहि व्याख्यान करू।
हम की कहलहुं हम की केलहुं,
एहि बातक सब सम्मान करू।
हम अलग विलग नहिं एकहिं छी,
अहि देह अलग मन संगहि छी।
सब मिल नव ज्योति जराबी तँ
ई वि’वविजयी तँ हमहीं छी।

2 टिप्‍पणियां:

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

सुन्दर सार्थक संदेश लिये रचना.

आप अपने ब्लोग के कलर को थोडा बदलें..
नीले बेगराऊंड पर पीला या सफ़ेद टेक्स्ट अधिक प्रभावी लगेगा... माफ़ कीजियेगा बिन मांगे सलाह दे रहा हूं

ajay kumar jha ने कहा…

baahut neek rachnaa, juliee ahan apan blog jaanchparakh par nahin likh rahal chhee kuno khaas kaaran. yadi ahan sab hamra apan blog mein shaamil karee ta hamar bhagya.