मंगलवार, अगस्त 25

कविता

अंतरात्मा कहैत अछि
अबैत छी लयकें आंखि मे स्वप्निल भविष्य
गामसँ हम शहर दिस,
सोचैत छी ऑफीसर बनव
कठिन सँ कठिन श्रम कऽ,
करब नाम माय-बापक, गाम आओर राष्टï्रक
किछु बनि कऽ
बनाएब एकटा पृथक स्थान समाज मे
किछु नव सृजन कऽ
लेकिन जखन हम देखैत छी ओहि प्रतियोगी कें
जे बूढ़ भय रहल छथि,
किछु बिना पयने
युवावस्था के गंवा कें
गाम वापसि जा रहल अछि,
तखन हम हताश होइत छी
निराश होइत छी,
लगैत अछि निष्ठïा आओर साहस संग छोडि़ रहल अछि,
एकर बावजूदो 'अंतरात्माÓ कहैत अछि हमरा
अहां कियाक दु:खी भय रहल छी?
उज्ज्वल भविष्यक दिस देखैत रहू
सत्यसँ कर्मपथ पर चलैत रहू
विघ्न-बाधासँ लड़ैत रहू
ने पाछू भागू अहां
ओहि असफल प्रतियोगी के देखकें,
सरिपहुँ किछु कमी अछि हुनकामे,
हुनक लक्ष्य आओर रणनीति मे,
एकरा बाद
फेर हम आत्मविश्वासँ भरि जाइत छी
नूतनसँ ओही मे डूबि जाइत छी
सबटा निराशा सँ दूर भऽ जाइत छी
नव उत्साह आओर जोश मे
फेरो तैयारी मे जुटि जाइत छी,
जाहिसँ होय सफल
हम अपन आकांक्षाआकेँ मूत्र्तरूप दऽ सकी,
नव प्रतियोगी हेतु बनि सकी - 'आदर्शÓ।
—भरत लाल ठाकुर

2 टिप्‍पणियां:

ओम आर्य ने कहा…

bahut hi sundar rachana........likhate rahe

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

इस सुन्दर रचना के लिए बधाई!