मंगलवार, अप्रैल 21

लघुकथा / बन्न कोठली

एकटा पत्रिका निकालबाक योजना बनि रहल छल। प्रकाशक आ संपादक बैसि कय विचार-विमर्श कय रहल छला।
राजनीतिक चर्चा के लिखत ?
हमर छोट पुत्र, ओकरा राजनीति मे बड्ड मौन लगै छै।
महिलका काॅलम ?
हमर कनियां, भरिदिन महिला सभक बीच बैसल ज्ञाने बंटैत रहै छथि।
सिनेमा ?
हमर मांझिल पुत्र, एक दिनमे तीन-तीन शो सिनेमा देखि लैत अछि।
खेल ?
जेठका बेटा, खेल मे रमिकय पढाई धरि चैपट क लेलक।
आवरण चित्र ?
हमर बेटी, ओ ....
पत्रिका प्रकाशित भेल। शीर्षक नीचा मे मोट-मोट आखरमे लिखल छल - अहाँक, अहींद्वारा, अहीं सँ प्रकाशितपत्रिका।

- सत्येंद्र कुमार झा

विद्यापति गीत


चन्दा जनि उग आजुक राति।

पिया के लिखिअ पठाओब पांति।।

साओन सएँ हम करब पिरीति।

जत अभिमत अभि सारक रिति।।

अथवा राहु बुझाओब हंसी

पिबि जनु उगिलह सीतल ससी।।

कोटि रतन जलधर तोहें लेह।

आजुक रमनि धन तम कय देह।।

भनइ विद्यापति सुभ अभिसार।

भल जल करथइ परक उपकार।।