निरस जीवन निर्मल म®अन अछि,
तै‘ किछु छंद हम लि£ द¢ल©ं
कि कि लि£ु छ®रू कि सब,
किछु म®अन परल किछु बिसरि गेल©ंह
क¨न काज अछि कलम दवातकऽ, व्यर्थ कागतकऽ पन्न्ाा केर
परहब आ फ¢र बिसरि द¢ब, कवि कल्पना रचना केर ।।
भरल म®अन आ £ाली जेबी, स¢ह® नींचाँ फाटल अछि
जर-जर पेट घसल पाछु मे‘ऽ
सौसे चेफरी साटल अछि
पर लाख टका केर म¨अन हमर आइ
हम मैथिल पर लुटा देलौह
कि कि लिखु छोरू कि सब
किछु मोअन परल किछु बिसैर गेलौह
तंग हाल बेहाल गरिबकऽ
दुनियाँ अछि रंग बिरंगी
रोजी रोटी केर खोजय लेल
बनलौं हम फिरंगी
कखनौअ सोचि व्यर्थ जनम भेल
की करबैय दुनियाॅ मे‘
टुटल पंखा ड®ला रहल छी
सहजहि दुपहरिया मे‘
कनियाॅ कहलैन केहेन कमासुत
क®बरे घर में बुझा गेलौह
कि कि लिखु छोरू कि सब
किछु मोअन परल किछु बिसैर गेलौह
दिन रैत भरि करि परिश्रम
टप-टप घाम चुबय अछि
हारल-थाकल घर अबैत छि
सदहल न®अन रहैत अछि
घिया-पुता सब स्नेह सऽ दौगल
छाति सऽ चिपकैएऽ
हाय गरीबी फाटल जेबी
छुछ दुलार रहैएऽ
चिकन चुनमुन देह रहैत छल
हम काद® में लेटा गेल©ं
कि कि लिखु छोरू कि सब
किछु मोअन परल किछु बिसैर गेलौह
ल®क बजै छाथि गाम घर मे‘
छौड़ा एस करै छै
बिसैर गेल छैकऽ माय बाप केर
निशा खाऽ परल रहैत छै
दिल्ली के जे हाल-चाल छैक
एकटा दैईब जनैइत छथि
सपत खा कऽ हम कहैईत छी
व्यर्थ समाज क®सैइत छथि
देखि गामक ल®क के कखनौ
हम दोगही में नुका गेल©ं
कि कि लिखु छोरू कि सब
किछु मोअन परल किछु बिसैर गेलौह
नैंह बांॅचल अछि प्रेम स्नेह आ
बदलल ल®क समाज
निक बात ह® आ की अद्यला
ककरहु सऽ नै काज
तकरे भ¨गना भ®इग रहल छथि
जनिका बाबा केर बखारी
दिल्ली आ कलकत्ता जाकऽ
नैत करैय बेलदारी
दंग भेल छी देख समाज केर
लाज शर्म सऽ सुखा गेल©ं
कि कि लिखु छोरू कि सब
किछु मोअन परल किछु बिसैर गेलौह
शिक्षा के युग डेग-डेग पर
शिक्षित ककरा कहबैय
शिक्षित भऽ कऽ गुट बनाबथि
केकरा घर केर लुटबए
तिनके मान सम्मान ह¨इत छनि
हाय रे बदलैइत दुनियॅा
भु£ल पेट अहुरिया मारए
मारए दिन दुिख पेटकुनियाॅ
लिख सिलेट पर नाम गाम हम
अपनहि हाथ्® मेटा देल©ह
कि कि लिखु छोरू कि सब
किछु मोअन परल किछु बिसैर गेलौह
- संतोष मिश्रा
09650174462
