गुरुवार, जुलाई 23

जमीने हेरा गिया है

बहुत दिन भऽ गेल मटरु कामति सँ भेट नहि भेल छल। आई हुनका सँ गप्प करबाक बहुत इच्छा भऽ रहल छल। हुनके ध्यान कऽ रहल छलाँ कि एकाएक मटरु कामति धमकि पड़लाह। हर्षित मोने कहलयन्हि, मटरु भाई, बहुत दिनक जीयब अहाँ, एखन हम अहीँक ...... मटरु कामति बीच मे बजला, 'बहुत दिन जीब तऽ रहब कत्तअ सरकार? आब तऽ जमीनो गायब भऽ रहल अछि। अपना जगह सँ, पता नहि केना एम्हर सँ ओम्हर घुसकि जाइत अछि जमीन? जमीने तकबा मे जिंदगी खेप जायत तावत्ï रहब कत्तअ? तैं बहुत दिन जीबाक श्राप नहि दिअ।
जमीन गायब भऽ जायब आ ऐम्हर सँ ओम्हर घुसकबाक गप्प नहि बुझि हम मटरु कामति दिस ध्यान सँ ताकल। चेहरा मलिन, बढ़ल दाढ़ी, मईल कुर्ता आ किछु दुबरायल मटरु कामति बहुत उदास या दु:खी बुझना गेलाह। हुनक मनोदशाक अंदाज कऽ हम गंभीर होइत पूछलयन्हि, बहुत उदास आ क्लांत बुझा रहल छी मटरु कामति, की कोनो खास बात? जमीनक मादे की कहैत रही? पूरा बात सविस्तार कहू ने? मटरु कामति कुर्सी पर बैसैत पहिने तऽ एक लोटा जल पीबाक लेल माँगलाह, फेर कहए लगलाह, ई सुनैत रही जे जनसंख्या बढ़ला सँ जमीन लोकक लेल कम पडय़ लागल अछि, मुदा जमीन घुसकऽ लागल वा गायब होमय लागल अछि ई पहिल बेर देखल-सुनल। अमीन सभ जे ने करय।Ó
हम जिज्ञासु बनि हुनक बात पूर्ण मनोयोग सँ सुनए लगलहुँ। तावत्ï जल आबि गेल। एक्के बेर मे पूरा लोटाक जल पीलाक बाद ओ पुन: शुरू भऽ गेलाह, 'ओना तऽ कतेको जमीनी विवाद मे पंचयती कएने रही, दूनू पक्ष के मान्य आ शांतिपूर्ण विवादक निपटारा करबाक जश सेहो भेटल छल मुदा एहि बेर जे अनुभव भेल ओ तऽ कल्पनो मे नहि छल।ÓÓ हम बिना कोनो जिज्ञासाक व्यवधान उत्पन्न कएने चुपचाप हुनक व्यथा सुनैत रही। ओ अपन बात आगाँ बढ़ोलाह, 'ओना तऽ हम एहि बातक विरोधी शुरू सँ रही जे लोक अपन जमीन-खेत बढ़ेबाक वास्ते बान्ह वा आडि़-धूर काटि रहल छथि। एहि लेल आनो मामिला मे बहुत रास दुश्मन पोसि लेने रही मुदा अपने एकर फाँस मे आबि जायब ई नहि सोचने रही। फेर स्वयं घटनाक्रम पर अबैत ओ बजलाह, 'गाम मे हमरा बगल मे कारी कामतिक घर छैक। बुझू जे ओकर बाड़ी आ हमर बाड़ी एक-दोसर सँ सटले अछि। पिछुला किछु साल सँ जखन ओ अपन बाड़ी तामय, दू कोदारी हमरा बाड़ी दिस सेहो चला दियअ। ई काज ततबा चालाकी आ मंद गतिए करए जे बहुतो दिन तक हमरा लोकनि केँ ओकर कपट आ धृष्टïताक पतो नहि चलल। बहुतो दिन बाद जखन हमर आँगनसँ तरकारी तोडय़ बाड़ी गेली तऽ हुनक ध्यान एहि दिस गेलनि। ओ चुपचाप आबि हमरा कहली मुदा हम कोनो ध्यान नहि देलियै। धीरे-धीरे ओ हमरा बाड़ी सँ साग-सब्जी सेहो तोडय़ लागल। एहि पर ओकर घरबारी आ हमरा आँगनबारी मे उकटा-पैंची, गारि-गलौज सेहो होमय लागल। मुदा हम हरदम अपने कनियाँ के बुझा-सुझा चुप करा दैत रहियैन्ह। असल मे कारी के घराड़ी डेढ़ क_ïा मे छैक जखनकि अहाँ सबहक आशीर्वाद सँ हमर घराड़ी साढ़े-तीन कट्ठा मे अछि, जाहि मे पछुलका करीब एक क_ïाक बाड़ी के हम तीमन-तरकारी वास्ते साग-सब्जीक हेतु उपयोग करैत रही। कारीयो करीब दस-बारह धूर बाड़ी लेल छोडऩे रहय। एक दिन हम तरकारी लेेलबाड़ी गेलौं, तऽ कारीक बेटा हमरा रोकि देलक जे ओकर हिस्सा मे छैक। हमरा बड़ अजगुत लागल। अपने सँ हम कोबी रोपने रही। ओकरा डाँटि जखन हम ध्यान सँ बाड़ी देखल तऽ आश्चर्य मे पडि़ गेलौं, अपन बाड़ी ओकर बाड़ी सँ कनि छोटे बुझना गेल। हम ताज्जुब मे पडि़ गेलौ। हम एहि पर सोचैत रही कि कारी अपन बेटा संग आएल आ हमरा हाथ सँ कोबीक छत्ता छीन गारि देमय लागल। उकटा-पैंची, धक्का-मुक्की सँ कपरफोड़ीक स्थिति आबि गेल। खैर, लोकक हस्तक्षेप सँ तत्काल मामिला शांत भेल आ तय भेल जे घराड़ीक नापी भऽ जाय। अमीनक नाम पर हम कहल जे कारी जकरा मंजूर करए सैह हमरो मंजूर होयत, कारण हम तऽ आश्वस्त छलौंहे।
कारी कामति एगो अमीन ताकि आएल। ओ अमीन नेंगड़ा नगेंद्र यादव छल, एक नंबरक बेईमान आ पेंचिल। भरि इलाका मे बदनाम। खैर, जखन ओ आबिए गेलै आ हम जुबान दऽ चुकल रहियै तैं चुप रही गेलौं। नापी शुरू भेल तऽ हम घर आबि गेलौं, कारण पूरा विश्वास छल जे अमीन किछो करए कारीक डेढ़ क_ïा के दू क_ïा तऽ नहिए बना देतै। मुदा ई की? ओ नेंगड़ा तऽ पूरा टोल आ कि गामेक नक्सा बदलि देलकै।Ó ई कहि ओ कनि काल लेल चुप भेलाह। हम बड़ीकाल धरि चुपचाप सुनैत रही मुदा उत्कण्ठा आब बलवती भऽ गेल। उत्सुकता सँ पूछलन्हि, 'से की मटरु कामति, अहाँ दुनू गोटेक नापी मे गामक नक्सा केना बदलि गेल?Ó तावत ध्यान आएल जे एते काल धरि हम चाहक लेल सेहो नहि कहलियैक अछि, आँगन मे चाह लेल कहि हम पुन: उत्सुकतापूर्वक मटरु कामति दिस ताकल मटरु कामति बजलाह, 'आ की कहू, ओ अमीन तऽ सबहक टीक एक-दोसरा सँ बान्हि देलकै। हमरा बाड़ी आ अँगना तक कारी कामति के हिस्सा मे पडि़ गेल। हमर दलान बाड़ी बनि गेल आ सरकारी पक्की रास्ता आ ओहि कातक मास्टर साहेबक घर मे बाकी जमीन ठेल देलक। कारी यादवक वर्तमान घराड़ी घुरन बाबूक हिस्सा मे पडि़ गेलन्हि आ घुरन बाबूक ...... कत्ते धरि कहूँ ओ तऽ सबके विस्थापित आ पुन: स्थापित करबाक भाँज लगा देलकै। आब तऽ चारु कात सँ हड़बिड़ो मचि गेल। हम अमीन के कहलयै, जे बलू अहाँ नापी कएलौं हँ कि जमीनक अदला-बदली।Ó ई सुनिते नगेंद्र यादव भड़कि उठल, 'तऽ की हम बेमानी कीया है, जकर जत्तअ हिस्सा है, जमीन है, घराड़ी है से स्पष्टï कीया है। कड़ी पकड़बा काल घर मे जा कऽ बैसि गिया आ आब ओकालत झाड़ता है। अगर हमरा पर विश्वास नहीं था तो हमको बुलाये काहे। हमरा फीस दो हम चलते हैं, अपने से नाप लेना और सुनि लो, कोनो मर्दक बेटा हमर नापी को गलत नही साबित कर सकता है।Ó ई कहि ओ अपन ताम-झाम समटअ लागल। यहि नापीक बाद मास्टर साहेब आ घुरन बाबू सभ अपन-अपन अमीन मँगौलाह। मास्टर साहेबक अमीन हमर घराड़ी कारी कामति के घर के दफानैत आँगा बढ़ा देलक तऽ घुरन बाबूक अमीन कारीक घराड़ी दफानबाक ब्यौत लगा देलकै। आब तऽ बुझू पूरा गामे एकर लपेट मे आबि गेलै। लाठी-भाला सभ निकैल गेलै। अपन हिस्सा छोड़बा लेल कियो तैयार नहि मुदा दोसरक जमीन हड़पबा लेल सब तैयार।ÓÓ तावत चाह आबि गेल। चाहक चुस्की लैत हम पूछलयन्हि, ऐना किया भेलैक। गामक सीमा-चौहद्दी तऽ होयबै करतैक ने, खाता-खेसरा सँ तऽ सभ स्पष्टï भऽ जयतैक।Ó ओ कहलाह, 'ओ सभटा अमीन सभक धुरफंदी छलैक, सभक देखा-देखी हमहुँ एगो अमीन बजाओल। अबितैं ओ बाजल, 'ककरा-ककरा मे अहाँ के जमीन निकालि दें से पहिने कहि दीजिएÓ फेर कनि मुस्कियाइत अर्थपूर्ण अंदाज मे ओ कहलक, 'कनि हमरो ध्यान रखिएगा, तऽ हम चारु कात अहाँ के जमीन निकालि दूँगा। ओ मूर्ख अमीन सभ की नापेगा हमरा सामने, ओ सब तऽ हमरा सामने बच्चा है, हमर कड़ी पकड़ैत-पकड़ैत ओ सभ अमानत सीखा है। ककरो मे हिम्मत है कि हमर नापी को टस से मस कर दे।Ó ई सुनितै अवाक भऽ गेल रही। हमहुँ अमीनक एहि लीला पर अचंभित रही तथापि पुन: हम सवाल ठाँढ़ कएलयन्हि, मुदा कोनो सीमा, चौहद्दी, खाता-खेसरा ...... Ó बात खत्म भेला सँ पहिनेहि मटरु कामति खौंझा के कहला, 'की रहतै सीमा-तीमा। पहिने टोलक ईनार चिह्निïत रहै, मुदा घर ही चापाकल के प्रचलन मे ओ मसोमत जेंका भऽ गेल छल। फेर बुटाय बाबू जखन पक्का घर बनबऽ लगला तऽ पहिने तऽ ईनार भड़बा लेला फेर ओहि पर अपन भनसा घर ठांढ़ कऽ देला। चूँकि ईनारक प्रयोग नहि होय तैं कियो खास विरोध-प्रतिरोध नहि केलकै। आब के जा कऽ हुनका भनसा घर तोडि़ ईनार ताकबा लेल कहतैन।Ó ई कहि मटरु कामति चाह खत्म कऽ खैनी चुनाबऽ लगला। एहन समस्या सँ प्राय: प्रत्येक गाम प्रभावित अछि तैं कनि काल धरि हमहूँ चुप रहलहुँ फेर पूछलयन्हि, 'तऽ अंतत: की भेल नापीक परिणाम, मामिला कोना सलटल?Ó खैनी मुँह मे दैते मटरु कामति जोश मे आबि गेलाह, 'कपरफोड़ी करितौं पूरा गाँव सँ एहि सँ नीक छल अमीन-वमीन बिसरि अपने कलेज पाथर बना कारी सँ समझौता क लीऽ।Ó मुदा सरकार, एकर बाद तऽ बुझिए जे अतिक्रमण आ अमीनक लीला देखबा हेतु हमहुँ फाँड़ बन्हि लिए। तकर बाद तऽ आम लोक केँ के कहए सरकारीओ जमीनक जे-जे लीला-देखा से की कहेँ आओर कत्तअ तक कहेँ। लोकतऽ जमीने गायब कर दीया है, जत्तअ जमीन है ओत्तए नक्सा नहि जत्तअ नक्सा है ओ जमीने अलोपित भऽ गिया है।Ó फेरो हमर उत्कण्ठा जागल, पूछलन्हि, से की मटरु कामति, कनि फरिछा के कहुँ ने?Ó आ की कहू, सिर्फ दू चारिटा उदाहरण देते हैं,
मधुबनी शहर के बीचोबीच दूटा केनाल है। दुनू केनाल को कुछ लोगो ने देफाइन लिया, कत्तेको बेर जाँच-पड़ताल हुआ मुदा सबटा बेकार भऽ गिआ, मौनिसपिलेटी सँ जगह का नक्से गायब भऽ जाता है असलिए काल मे। सरकारी अमीन प्राइवेट पार्टी सँ पैसा लऽ कऽ चुप भऽ जाता है। बड़का-बड़का मकान बनि गिया, बाढि़-बरसात मे लोकक बाड़ी-झाड़ी लोकक आँगन-दुवारि भर जाता है, पानी निकलने का नाला तक गायब भऽ गिया मुदा सरकारी नक्से हेरा गिया है। के की कऽ सकता है, मौनिसपिलेटी बला साहेब कहते हैं, 'तुमको बड चैँक है, नक्सा लऽ आओ खोजि के तखन देखो हम केना चुप रहता हूँ?Ó
आब अहीं कहिए जे नक्सा सरकारी ऑफिस मे नही है उसे कीया कबाड़ी के दोकान मे ताका जाएगा? मधुबनी शहरक रास्ता घटता जाता है और सड़क पर दोकान बढ़ता जाता है। मुदा सरकार, दरभंगा मे तो जमीन गायब भऽ गिया है। ललित बाबू विश्वविद्यालय का कतेको एकड़ जमीन कत्तअ हेरा गिया है, ककरो पते नही है, दरभंगा नगरपालिका अपन हेराया जमीने कऽ ताकबाक लटर-पटर मे पड़े बिना अलगे से जमीन खरीदने का विचार कर लिया। जौं सरकार ओहो जमीन हेरा गिया तऽ कतेक जमीने खरीदता रहेगा। हम तऽ जखन एहन-एहन जमीनी लीला देखा तऽ सोचा भने हम दस धूर कारी को दे दिया नहि तऽ अमीन सब तऽ हमर बाप-दादा का गामे हेरा देबाक चक्रचालि चला था। हमरा चुप देखि ओ पुन: बजलाह, पुर्णियाँ, मे अवैध लोक वैध जमीन कब्जा लिया, सरहसा नर्क बनि गिया, समस्तीपुर-मुजफ्फरपुर मे जमीन हड़पो आंदोलन तऽ तेना चला है कि ललला झंडा बला का लाल आंदोलनो ओकर सामने कारी पडि़ गिया। लाल झंडा बला सब राजक जमीन तक पड़ धावा बोलना चाहा था दरभंगा मे। हमरा तऽ लगता है कि दू-चारिटा सरकारी अमीन अगर प्राइवेट रूप सँ बहाल कऽ लिया जाय तऽ पूरा शहर के जमीन पर कब्जा कीया जा सकता है। सरकारी जमीन हेराता रहेगा प्राइवेट प्रापर्टी बढ़ता रहेगा। है न ई लाभक सौदा?ÓÓ ओ हमरे सँ पूछि बैसलाह। हम चुप रही झंझारपुर स्टेशन लऽगका अतिक्रमण हाले मे देखने रही, बहुत रास दृश्य आँखिक आँगा नाचि उठल।
हमरा चुप देखि मटरु कामति व्यंग्य कएला, 'अहाँ तँ सुनिए कऽ चुप भऽ गिये तखन सोचिए जकरा जमीन ताकवा के पीड़ा उठाना है ओ की करेगा? तैं ओ हाथ-पैर बान्हि आँखि बंद ककऽ चुप भऽ गिया है। फेर एही चुप्पी सँ तऽ अर्थक प्राप्तियो भऽ जाता है, मामिला उठेला सँ बड़का-बड़का आ पाई बला लोक सँ अराडि़ के ठानेगा? मिथिला का भलमानस आम लोक चुप रहकर अपन भलमानसी का परिचय दे रहा है। कियो किछो करे भलमानसी नहि छूटना चाहिए। मटरु कामति अचानक राष्टï्रीय आ अंतर्राष्टï्रीय चिंता सँ अपना के जोड़ैत बजलाह, 'सरकार, हम सोचैत छी जे राष्टï्रपति भवन या प्रधानमंत्री आवास कहियो जमीनी विवाद मे आबि जाय आ एत्तुका अमीन नपाई मे जाय तऽ की होगा? प्रधानमंत्री को तो सात रेसकोर्स सँ सात कोस दूर जाय कोनो रेस का कोर्से ने 'ज्वाइनÓ करना पड़ेगा।Ó हुनक एहि तर्क पर किछु हँसी सेहो आएल मुदा जामय हम किछु बाजी मटरु कामति पुन: गप्पकेँ नव मोड़ दैत बजलाह,
'पाकिस्तानक संग तऽ भारत झूठे का सीमा-विवाद का ढ़ोंग अलापता है, अरे मैं तो कहता हूँ एत्तअ सँ चारिटा अमीन भेज दो जमीन नापने, मियाँ शरीफ शराफत बिसरि जाएगा आ कड़ी पकड़ते-पकड़ते जनरल मुशर्रफ, जेनरल आदमी जेकाँ अपसियाँत भऽ जाएगा। सोचेगा कराँची बचावेँ की इस्लामाबाद? सबटा सीमा विवाद एक्के बेर मे खत्म बुझिए। आओर पाकिस्तानक हाल देखि चीन पहिनेहि सीमा बला सब झंझट सँ भाग जाएगा और कहेगा हमको मिथिला के अमीन से बचाओ, चाहे आधा चीनीए किएक नहि फाँक लो। लेकिन हमर बात के बुझता है? बिना मतलब का विवाद-विवाद करता रहता है अप्पन सरकार।ÓÓ
ई कहि एकाएक ठाढ़ भऽ गेला मटरु कामति। कहलनि, 'एखन चलैए छी फेर भेंट होयत।Ó ई कहि अपन यायावरी डेग बढ़ौने चलि गेलाह मटरु कामति आ हमरा ओहि ठाम छोडि़ गेलाह जत्तअ अपनो जमीन असुरक्षित बुझना जाय लागल। जमीन ने हेराई अछि आ ने गायब होइत छै, ओ तऽ स्थान परिवर्तित सेहो नहि कऽ सकैत अछि तथापि अनादिकाल सँ सबसँ पैघ झगड़ा आ अराडि़क जडि़ बनल अछि। समरसता, बंधुत्व, संबंध सब खत्म भऽ जाइत छैक एकर पाँछा आ एक दिन आदमी सेहो खत्म भऽ जायत अछि मुदा नहि जाइत छै जमीन ककरो संगे। एहि ठाम रहि जायत अछि। शायद अगिला पीढ़ीक लोककेँ संबंधक परीक्षा लेमए। तऽ की मटरु कामतिक व्यथा हुनक व्यक्तिगत छन्हि? के सोचत एहि मे नुकायल वेदना केँ आ सेहो कहिया धरि?

3 टिप्‍पणियां:

pankaj ने कहा…

hello
apne badi sachhai se blog mantain kiya hai apki lakhni aur bhasa ke prati samarpan kabile tarif hai..yeh jajba bahut kam logon main dikhata hai..

rahul jha ने कहा…

bipin ji pranam

ahan ke likhal JAMIN HERA GIYA HAI
kaphi dilchaspa lagal

Dhanyabaad
Rahul Jha
Noida
9711500567
E-mail-rahuljha85@gmail.com

adityakumarjha ने कहा…

maithili aaj bahut piche ho gaya hai ,hum sab ko iske prayas karna chahiye lekin jis prakaar se aap logo ne ye prayash kiya hai,iske liye aap sabhi ko koti koti naman.