बुधवार, जुलाई 29

कविता / देव बचाबू

आई जिम्हरे दृष्टिï उठै,
तिम्हरे कानैत सूरत देखल।
जिम्हेर ई कर्णपटल घूमै,
हाहाकारक स्वर गूंजल।
ई की सुनैत छी आजुक हम,
पर्यावरणक ई करूण कथा।
ई गाछ पात सब सुना रहल,
मानव केर अन्यायक गाथा।
जेहिना ई कटैथ जीवन जंतु,
तहिना हलाल केलनि हमरा।
सब डाढि़ पात कहने घूरथि,
हे दैब बचाबू आई हमरा।
आजुक कृतघ्न ई मानवजन,
उतरल अछि करय विनाश हमर।
जकरा लेल जीवन अपन देल,
सएह आयल छीनय प्राण हमर।
जीवन भरि देलहुँ प्राणवायु,
तहि पर अदभुत देल फलक दान।
आयुर्वेदो त देल हमर,
आब आई लेताह ई हमर प्राण।।


- कंचन

2 टिप्‍पणियां:

मोहिन्दर कुमार ने कहा…

सुन्दर लिखा है.. हां लीक से हट कर होने के कारण कुछ पाठकों को भाषा से कठिनाई हो सकती है

ankur jha ने कहा…

bahoot badhiya