सोमवार, जनवरी 17
अहाँ के शहरि मे
चलै छी सम्हरि-सम्हरि, अहाँ कें शहरि मे।।
लूटपाट आ छीना-झपटी, सौंदर्य अहि नगर कें।
रोज शीलभंग होइए कतेको, अहाँ कें शहरि मे।।
चोर मस्त कोतवाल पस्त, शासन पूरा भ्रष्टï यौ।
जंगल के कानून चलैए, अहाँ कें शहरि मे।।
जे प्रवासी रूप निखारल, ओकरे पर ईल्जाम यौ।
ईनाम मे हाथ कटैए, अहाँ कें शहरि मे।।
किसान के खेत बिकाओल, कंक्रीटक अछि जाल बिछाओल।
यमुना के धार हराओल, अहाँ कें शहरि मे।।
सड़क बनल समर भूमि, शोणित सँ हलकान यौ
ब्लूलाइन सँ सब डेरायल , अहाँ कें शहरि मे।।
मंगलवार, अगस्त 11
गजल
मनोरथ छल बहुत दिन सँ अहाँ भेटि होइतहुँ।
सब कहइए अहाँ आब पैघ भऽ गेलहूँ॥
प्रेम केने रहि पहिनेहो जखन बुझल नहि छल।
एक बेर आब कÓ कऽ देखिलियौ सब बुझि जेबै॥
युवावस्था मे प्रेम कÓ कऽ देखलियौ।
सबटा बात पछिलुका पुरान भऽ जायत॥
जखन मुस्की नञि ऊरुज तकर बात किछु छल।
आब तÓ कारियो ठोरक लालीक बात किछु अछि॥
मÓन बहुत अऊनाइए अहाँके संग आबऽ लेल।
अहाँ छी वैह मुदा सब किछु बदलि गेल॥
एहिबेर हमर निहोरा मानि कऽ देखिलियौ।
सेहन्ता पूर भऽ जायत हमर मन कहइए॥
एकबेर अंत:पुर मे आबि कऽ देखि लियौ।
2
मारै मुस्की नञि एहन गुलबिया।
तोरा देखिते किदन हमरा भऽ जाइए॥
ऐना देखनै भोर, सांझ, दिन आ दुपहरिया।
तोरा देखितै किदन हमरा भऽ जाइए॥
कखनो तÓ दम धरै मन के कम करै।
एना जँ करबए तऽ भऽ जेबए रसिया॥
मारै ने .....
करइ छैं प्रेम नहि माखए तु कनखी।
करबए जँ प्रेम नहि कहि दे नै तु लटकी॥
मुदा-मुदा .....
सजि-धजि कऽ आ ने गुलबिया।
तोरा देखिते किदन हमरा भऽ जाइए॥
—सतीश चन्द्र झा
