मनोरथ छल बहुत दिन सँ अहाँ भेटि होइतहुँ।
सब कहइए अहाँ आब पैघ भऽ गेलहूँ॥
प्रेम केने रहि पहिनेहो जखन बुझल नहि छल।
एक बेर आब कÓ कऽ देखिलियौ सब बुझि जेबै॥
युवावस्था मे प्रेम कÓ कऽ देखलियौ।
सबटा बात पछिलुका पुरान भऽ जायत॥
जखन मुस्की नञि ऊरुज तकर बात किछु छल।
आब तÓ कारियो ठोरक लालीक बात किछु अछि॥
मÓन बहुत अऊनाइए अहाँके संग आबऽ लेल।
अहाँ छी वैह मुदा सब किछु बदलि गेल॥
एहिबेर हमर निहोरा मानि कऽ देखिलियौ।
सेहन्ता पूर भऽ जायत हमर मन कहइए॥
एकबेर अंत:पुर मे आबि कऽ देखि लियौ।
2
मारै मुस्की नञि एहन गुलबिया।
तोरा देखिते किदन हमरा भऽ जाइए॥
ऐना देखनै भोर, सांझ, दिन आ दुपहरिया।
तोरा देखितै किदन हमरा भऽ जाइए॥
कखनो तÓ दम धरै मन के कम करै।
एना जँ करबए तऽ भऽ जेबए रसिया॥
मारै ने .....
करइ छैं प्रेम नहि माखए तु कनखी।
करबए जँ प्रेम नहि कहि दे नै तु लटकी॥
मुदा-मुदा .....
सजि-धजि कऽ आ ने गुलबिया।
तोरा देखिते किदन हमरा भऽ जाइए॥
—सतीश चन्द्र झा
