बुधवार, फ़रवरी 4

कत जा रहल अछि मैथिल समाज

कोशिश अछि जे समर्पित प्रयास स अपन संस्कृति भाषा आ पहचान के बचा क राखि सकी । उम्मीद अछि जे एहि ब्लाग के माध्यम स बहुतो गोटे सब मिलि एहि हार्दिक मर्म के बिचारक माध्यम स व्यवहारिक रूप द सकी ।
मैथिल सभ आई सभ क्षेत्र में विकास क रहल छथि, मुदा मैथिल के इ उत्थान मिथिला लेल बरदान नही बनी ओकर अस्तित्व के पिछरापन के कारण बनि रहल अछि । जेना बुझा रहल अछि जे इ वर्ग पूर्वे स भाषा आ परम्परा के छोड़बा लेल प्रतिबद्ध रहैत छैथ ।
अपन बुद्धिजीवी पाठक सभ लग इ जतेबक कोनो प्रयोजन नहि जे सांस्कृतिक पहचान के की महत्त्व अछि । एकर अहमियत आओर आवश्यकता त ओहो बुझैत छैथ जे मैथिलक पहचान स शर्मिंदा रहैत छैथ , आ दोसरक भाषा, परम्परा आ रिवाज अपनेवाक लेल दर दर भटैक रहल छथि । सवाल उठानाइ त स्वभाविक अछि जे आख़िर ऐना कियक ?मैथिल अपन भाषा ,क्षेत्र ,संस्कृति स पलायन क रहल छथि । शहर के त बाते छोडू जत मैथिल अपन पहचान ऐना छुपबैत छैथ जेना कोनो कलंक । कमोबेश आब गाँवो के समाज पलायनवादी पथ पर आगा बढी रहल अछि । एहि तरहक वैचारिक छिछलापन स मैथिल संस्कृति आ भाषा पर गम्भीर खतरा देखा रहल अछि । आजुक परिदृश्य में ऐना बुझा रहल अछि जेना कोनो उजाही उठल अछि अपन भाषा आ संस्कृति की छोड़बा के लेल । अपन भाषा, क्षेत्र आ संस्कृति के पोषित करब सभक नैतिक दायित्व होइत अछि, जकर एहि समाज में नितांत कमी देखा रहल अछि । विकासक बुनियादी बात स अनजान लोक सभ भेड़ चाल में आगा बढ़ल जा रहल छथि । नकल हावी भ रहल अछि ,अपन संस्कृति परम्परा में बहरी संस्कार के घुसा अपना आप गौरान्वित महसूस क रहल छी । समय के संगे बदलाव हर समाज अओर संस्कृति के मांग होइत छैक । समयानुरूप ओही में परिवर्तन सेहो जरूरी होइत छैक । नवीनीकरण के सत्कार होयबाक चाही । अन्यथा जड़ता त मृत के निशानी होइत अछि । मुदा संस्कृति स पलायन करब कदापि उचित नहि मानल जा सकैत अछि । इ तंग मानसिकता समाज के पंगु बना देत । एहि पर गहन विचार आवश्यक अछि।

3 टिप्‍पणियां:

kamal ने कहा…

lekhni mjboot karu.

kapil ने कहा…

mudda nik uthayal, muda sabd jena sang nahi delak.. ki vichar....

बेनामी ने कहा…

bahut niik prayas