मंगलवार, फ़रवरी 3

मजबूरी

अन्हरिया फेर घेरलक आई
आबि गेल फेर नव प्रभात
एहि चिड़ै केँ किछु नहि बुझल
होएत कोन डारि पर बसेरा आई
चहुँओर घूमैत अछि करिया नाग
ताकू ओ
कतय अछि सपेरा आई
कतेक हरियर-भरल-पूरल
भ गेल अछि वन-झाँखुर
फूलक सुगंध सँ आई
एहि जगह त फूल खिलाइत छल
कोना कए एतय भेलै पतझड़क ठौर
होएत रक्षकक कोनो मजबूरी
जे बनि क आयल लूटेरा आई
सभ केँ छैन्हि तूफानक ख्याल
जाहि मे डूबल अछि ’ारीर आई।


सुभाष चन्द्र,

1 टिप्पणी:

विनय ने कहा…

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