बुधवार, फ़रवरी 25

सोच पाथर त नहि भ गेल


- विपिन बादल


चारूकात हल्ला भ रहल अछि जय हो। जय हो। जय हो। आखिर ककर जय ? अप्पन मौलिकता कें आ कि विदे’ाी चाटुकारिता कें ? कें फरिच्छौट करत ? अपना कें निकृ’ट देखा कय पुरस्कार जीतब कि जीत थिक ? निर्णय के करत? जहन लोकतंत्रक मंदिर सेहो थपड़ी पीट रहल अछि, बिना किछु सोचने-बुझने त हमर-अहांक कोन कथा ?

गप्पक केंद्र में अछि स्लमडाॅग मिलेनियर कें आॅस्कर भेटब। एकर जं अप्पन भासा मे अनुवाद कय क कही त अर्थ होइत अछि झोपड़ी मे रहनिहार करोड़पति कुक्कुर। कि ई सुनि मौन हर्’िात भेल ? हमरा जनितबै किन्नो नै। हमरो नहि भेल त अहांकें कोना हएत। मुदा, किछु वि’िास्ट लोक छथि जिनका अपने बगेबानि आ आत्मसम्मान कें कोना सरोकार नहि रहैत छैन्ह। ओहेन लोक लेल कहल गेल अछि , हेहरा ....... जन्मल गाछ आ हेहरा कहलक हम छाहरि मे छी। कमोबे’ा इएह स्थिति भ गेल छै आॅस्कर के लय क।

विचार करी। कि एहि सं पहिने संगीतकार ए आर रहमान कें कोनहुं टा मौलिक संगीत नहि रहैन्ह जे एहि बेर ओ पुरस्कृत भेला? रोजा सं लय क एखनधरि हुनक संगीत सुनल जाए त आन्हरों कहि दैत जे ई गीत कें रहमान संगीत देने छैथ। कि एहि तरहक गप्प किओ बर्मन आ नौ’ााद साहबक संगीत कें संगे कहि सकैत अछि ? पाथेर पांचाली, प्यासा, मदर इंडिया, गांधी, लगान कि एहि सिनेमा सं कमजोर छल! किन्नो नै। त आखिर कियैक नहि भेटलै ओकरा पुरस्कार? विचार करी।

इतिहास कें हिसाब सँ जहन भारत गुलाम छल त कतेको रास जगह पर कहल जाइत छल- इंडियन एण्ड डाॅग्स आर नाॅट एलाउड। आइयो लोकक एहि मानसिकता मे कोनो तरह बदलाव नहि आयल। आॅस्कर मे जाहि सिनेमा के ल क धूम मचल, ओकर कथ्य आ परिवे’ा कि छैक, कहबाक जरूरति नहिं। सिनेमा देखि लिअय, आँखि फूजि जाएत। त किएक खु’ाी मानबी ? किओ हमरा कुक्कुर कहैथ आ हम गौरवान्वित महसूस करी, ई हमर मजबूरी त नहि।


1 टिप्पणी:

prayas ने कहा…

bahoot badhiya......hamaro soch kichhu ehane san achhi...