मंगलवार, फ़रवरी 3

कथा / खस्सी आ चिकबा

एकटा छागर छल, जकरा ’ाुरूए सँ चिकबा पोसि रहल छल। खूब नीक जकां रहैत छल छागर। चिकबा खूब धियान दैत छलै ओहि छागर पर। चिंतित रहैत छलै छागरक प्रति। छागर कतओ इम्हर-ओम्हर नहिं चलि जाय कतओ रस्ता नहिं बिसरि जाय, कतओ भुतला नहिं जाय। हरियर-हरियर घास, कटहरक हरियतर पात, रोटी.... सभ किछु खाय लेल दैत छलै छागर केँ। कहुना स्वस्थ रहय, इएह मं’ा रहैत छलैक। बीतैत समयक संग छागर खस्सीक रूप धारण कय रहल छल। समय बीतैत गेलै। आओर एकदिन एहन अयलै जखना चिकबा खस्सी केँ लय क बाहर गेल। खस्सी अपना कें सभ तरहें सुरक्षित मानि नि’िचंत भ जा रहल छल, चिकबा संगे। कारण, संग मे रखवारक छल। चिकबा। खस्सी के एहि बातक अवगति नहि छलै जे आबय बला पल केहल प्रलंयकारी हएत हमरा लेखे। ओ त सामने चिकबा केँ देखैत छल आ नि’िचंत छल।
चिकबा, जे छागर के पालि पोसि खस्सी बनोलक, खस्सी के अपनापन के एहसास करोलक। बच्चा सँ वयस्क बनय धरि ओकरा सिनेहक एहसास दियौलक, सदिखन ओकरा सुरक्षा देलक। आब खस्सी प्रति चिकबाक एतेह सिनेह कियैक रहय, ई त स्वयं चिकबे जाने।
ओ समय लगीच आबि गेलै जखन चिकबा स्वयं आ खस्सीक मध्य अन्तर स्पस्ट करैत अछि। चिकबा खस्सी कें बाजार मे बेचि दैत छैक। ओ खस्सी के पुचकारैत बड दुलार सँ अपना लग बजाबैत अछि। खस्सी आबि जाइत छैक। कारण ओ चिकबा लग अपना केँ पूर्ण सुरक्षित महसूस करैत छल। लगच अयला पर खस्सी के पकड़ैत छै; खस्सी ’ाांत, बिलकुल निस्तब्ध अछि। एकारा ओ सिनेहक एकटा रूप मानैत अछि। चिकबाक हाथ ओकरा पर धीरे-धीरे कसिया रहल छल। आ .... । कनी काल बाद ओ अपना केँ बान्हल पबैत अछि। एकटा खूँटा मे खँूटेसल। लाचार अछि, बेबस, अचंभित। खस्सी किछुओ नहि बुझि पाबि रहल छै। आखिर कियैक - ओकरा संगे एकहन व्यवहार, सेहो चिकबाक हाथे। कारण सोच सँ परे। एकसरि ठाढ़। असमंजस मे।
किछु पल आओर बीतला पर चिकबा अबैत अछि। हाथ मे कत्ता लेने। धरिगर आ भरिगर कत्ता। खस्सी के आब अनुमान लागि रहल छैक। ओ जोर सँ मिमिया रहल छै । छटपटा रहल छै। ओहिठाम चिकबा ’ाांत। बिलकुल ’ाांत। जेना किछुओ नव घटना होमय बला नहि होइहि। चिकबा कें ज्ञात छैक- आबय बला समय मे कि होमय जा रहल छै। कियैक भ रहल छै ? एकर उत्तरदायी ककरा पर, तइयो ’ाांत अछि। कोनो तिलमिलाहट नहि। आब, खस्सीक पछुलका दुनू पयर खींचल जा रहल छै। धड़ सीधा। कराहि रहल अछि खस्सी। ’ारापि रहल अछि चिकबा केँ। कनैत नहि अछि। कारण ओकर दम घूटि रहल छै। संास लेबा मे तकलीफ भ रहल छै। ऐना मे कानल कोना जेते? चिकबा आब निचैन भ कत्ता उठा कय ओकर गरिदन पर बजारि दैत छैक, गरिदन धड. सँ विलग। एकदम सँ अलग। चहुँदि’ा खूनक छींटा उड़ैत छैक। तइयो चिकबा ’ाांत; एकदम ’ाांत। जेना किछुओ भेलै नहि होइहि।

- अभिजात पंकज

1 टिप्पणी:

विनय ने कहा…

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