बुधवार, फ़रवरी 11

हम


हम

जे चली गेल रही

अप्पन जरि स दूर

घुरि रहल छि

पुनश्च

जरि दिस

अओर

अवाक् छि

ई देखि के

अहाँ


रूप धय लेने छि हमर

आब,

हम कोना ताकि स्वंय के ?
सुभाष चन्द्र

2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

kavita padi man harshit bhel.....aaga ahina nik nik kavita post karet rahav.....dhanyabad

subhash ने कहा…

sriman,
vichar prakat karbak lel sadhubad. muda appan nam aa parichay ta farchiya kay kahal jay...